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    माल तराई याने कटेहर का संक्षिप्त इतिहास

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    आज की मालतराई तो अत्यंत संकुचित 25-30 कि.मी. नीचे तक के क्षेत्र में थी जिसमें बदायूं-बरेली के ऊपर वाला सारा उत्तरी भाग आता था।


    सच तो यह है कि जहां रामगंगा, गंगा में संगम करती है, वहां के दायें क्षेत्र फरूखाबाद और कायममंज से ही प्रारंभिक रूहेला शक्ति नदियों के किनारे से होकर उत्तरोत्तर उत्तर दिशा को सोलहवीं सत्रहवीं सदी से आगे बड़ी थी और अठारहवीं सदी में तो उनके छापे बागेश्वर और काली के उपरी तट तक हुए थे। उस समय रुहेला शक्ति केन्द्र या जागीरें शाहाबाद, शाहजहांपुर, कांठ, उझानी, बदायूं, आंवला, संभल, पूरणपुर, पीलीभीत, चांदपुर, ठाकुरद्वारा, धामपुर व बिजनौर नजीमाबाद स्थापित हो गई थीं। इन रुहेलों ने अब अवध के नवाब को आंखे दिखाना शुरू कर दिया था जिसके दिल्ली के वजीर होने के नाते, वे गुलाम/ नौकर भी रहे थे और उसी की कृपा से जागीरें ले कर कटेहर में बसे थे। उनकी शक्ति बढ़ने पर इसी क्षेत्र को रूहेलखण्ड भी कहा जाने लगा था और कटेहर नाम छूटने लगा था।


    अलवरूनी के ग्यारहवीं सदी के प्रारम्भ में उत्तरी भारत के दिये विवरण से पता चलता है कि तब इस कटेहर भाग में कोई विशेष आबादी न थी और केवल अमरोहा, सहारनपुर, बदायूं में बस्तियां आबाद थी। मुरादाबाद चौपाला कह लाता था और बांस बरेली से ज्यादा प्रसिद्ध स्थान निकट का रामनगर था। तब यह सारा उत्तरी दोआबा क्षेत्र घने जंगलों से आवृत था और यहां के बांस सारे उत्तरी भारत में जाते थे। वन सम्पत्ति में यदि किसी चीज की कदर होती थी तो केवल बांस थे जो झोपड़ी, चप्पू, लाठी, शामियाना, में बड़े स्तर पर प्रयोग होते थे। भू नाप में भी "बा- तनाव-इ-बांस" का प्रयोग होता था। अब यह रोचक प्रमाण भी देखिए कि अंग्रेज व्यापारी ईस्ट इंडिया कम्पनी ने बाकी भारत में तो नमक, पान सुपारी का व्यापार पर एकाधिकार कर लिया था पर उसका एक एजेण्ड 1808 में श्रीनगर के निर्वासित राजा से चण्डी परगना केवल इसलिए खरीद रहा था कि बांस के व्यापार से पर्याप्त लाभ कमा सके।


    कटेहर पर अधिकाधिक विवरण हमें तेरहवीं सदी के प्रारंभिक काल में दिल्ली में गलाम वंश की सल्तनत स्थापित होने के बाद से मिलने लगते हैं। इल्तुतमिश (1211-36 ई.) ने दोआबे के विद्रोही हिन्दू राजाओं को ठिकाने लगाने के लिये बदायूं और कटेहर बरेली इलाके में फौजें भेजी जहां हिन्दुओं ने सुदृंढ़ दुर्ग स्थापित किये थे। उसका एक पुत्र नासिरूद्दीन अवध का सूबेदार था। वहां से कटेहर को फौजें रवाना की जाती थीं। एक अवसर पर उसने दुखी होकर कहा- "हिन्दुओं के विरूद्ध इन युद्धों में हमें एक लाख बीस हजार मुसलमानों का खून बहाना पड़ा है।"


    इसके बाद नासिरूद्दीन महमूद (1246-65 ई.) का जमाना आया जब सारी शक्ति प्रधान वजीर नाइब बलवन के हाथ में थी। उसका बदायूं के इक्तादार (सूबेदार) से झगड़ा हो गया क्योंकि कटेहर के आजाद वातावरण में वह अफगान पठान आयुघजीवियों के बल पर दिल्ली के सुलतान को अपने प्रभाव में लाने को व्यग्र होने लगा था।


    असल में उस इक्तेदार पर कटेहर में रहने वाले, बसने वाले हिन्दू विद्रोहियों के स्वतंत्र स्वभाव का गहरा असर पड़ने लगा था। अब जैसे ही बलवन गद्दी पर बैठा उसने 1267 ई. से दोआबा के कटेहरी भाग के जंगलों को कटवाना और आग लगवाने का काम शूरू किया। बस्तियां जलाई जाने लगीं। हुक्म था कि दस वर्ष से ऊपर का एक पुरूष भी जिन्दा न छोड़ा जाये। परिणाम यह रहा कि जान बचाने को हिन्दू और ऊपर घने जंगल में बढ़ते रहे।


    ऊपर बढ़ने और बसने वालों के प्रति वही कठोर व्यवहार अलाउद्दीन खिलजी (1296-1316) और मुहम्मद तुगलक (1335-1351 ई.) ने भी जारी रखा। उलाउद्दीन का भानजा बदायूं का सूबेदार बनाया गया था पर उसे भी स्वतंत्र आबोहवा और उपजाऊ भूमि ने आजाद रहने का सपना दिखा दिया। वह पड़ोसी राजपूत सरदारों के स्वतंत्र्य प्रेम से प्रभावित हो गया। खिलजी को इतना गुस्सा आया कि उसे मरवा दिया। चाचा और श्वसुर को वह पहले ही मरवा चुका था। उसने दोआबे पर इतना कर बढ़ाया कि लोग कंगाल हो गए। उसे अकबरूनी का यह विवरण याद था कि- "हिन्दुस्तान के क्षत्रियों के सम्मुख सब सर झुकाते हैं जबकि वे किसी के सामने सर नहीं झुकाते।" उसने सर न झुकाने वालों के सर कटवाने शुरू कर दिये। अब जब अध पगले या सनकी मुहम्मद तुगलक का शासन आया तो उसने दोआबे - कटहेर पर कई गुना भूमि कर बढ़ा दिया और जब किसान खेतों को छोड़ कर भागने लगे तो उन्हें न भागने देने के लिए घेर कर मारने का हुक्म दिया। अब इनकी छोड़ी जमीन पर मुसलमान कब्जा करने लगे और कटेहर में मुस्लिम आबादी बढ़ने का सिलसिला शुरू हुआ। परन्तु याद रखना है कि अकबर (1605 ई. तक) के समय तक कोई भी रूहेला तराई क्षेत्र में न सरदार था न कि जागीदार बनाया गया था क्योंकि रूहेलों के दुष्ट स्वभाव पर भरोसा नहीं किया जा सकता था। यों राजपूत सरदारों पर भी मुगल वंश का भरोसा नहीं होता था। शांहजहां और औरंगजेब के समय अपने रिश्तेदार राजपूत राजाओं पर तो वे हुक्म की तामील कराने की ताब नहीं ला पाये परन्तु जाटों की उदडंता से परेशान हो कर हुक्म निकाला गया-


    "जाट लोग घोड़े पर सवार न हों, न बन्दूक रखें, न अपने लिये गढ़ी बनायें" तब दिल्ली, पंजाब व चौरासी खापों के हजारों जाट अपने सम्मान के खातिर कटेहर तराई में बसने आ पहुंचे।


    कटेहर में बसने वाले थोड़ा बहुत जाति परिवर्तन तो कर सकते थे, परन्तु पहले के हिन्दुस्तानी अत्यधिक धार्मिक और रूढ़िवादी प्रवृत्ति के कारण परम्पराओं में रहना श्रेयस्कर समझते थे। अतः उस समय की तराई में बसने वालों के जाति नाम इस प्रकार मिलते हैं-


    "भदौरिया, चौहान, गौड़, जाट, तगा, गुंसाई, चौधरी, बनिया, कटेहरी राजपूत, झांगर, बछिल, बिसेन, वैस, कहनात, बंजारा, पेरिया (पीलीभीत के बांसुरी बनाने वाले), कोलिया, थारू, बोगसा- भुकसा, मघेसी। नैपाल से आने वाली उपजातियां हिन्दू स्वरूप वाली वसीं।


    आज तो ऊपरी तराई में सिख और बंगाली भी इतने बसा दिए गए है कि रूद्रपुर, उधमसिंह नगर कहलाने लगा है और पुरानी कुमैंया माल की पहचान लगातार खत्म होती जा रही है। अब मुसलमानों में कौन बसे? जाहिर है रूहेलखण्ड नाम दिलाने वाले रुहेले तो बसे ही, परन्तु इन से पहले और इनके साथ भी जो बसे, उसकी एक झलक देखनी जरूरी है।


    (1) सल्तनत काल से लेकर मुगल शासक काल तक यह उत्तरी दोआबा क्षेत्र अहेर अर्थात शिकार खेलने के लिए सर्वोत्तम स्थान माना जाता था। रज्म अर्थात युद्ध और वज्म अर्थात आनन्द सेक्स के अलावा तीसरा बड़ा शौक अमीरों वाले कबीलों में इसकी सर्वाधिक प्रियता थी। शिकार के लिए जाते समय अंगरक्षक, फौज, प्यादे और हांका करने वाले लोग हजारों की संख्या में जाते थे। अलाउद्दीन खिलजी ने तो नरगा याने वृताकार घेरा डालकर सामूहिक पशु संहार प्रथा का प्रचलन कराया था। इस प्रथा को हाथी की सवारी के साथ मुगल वंश ने 'कमरधा' नाम दिया।


    इलियट डाउसन ने मुहम्मद तुगलक के नरगा साथियों का जो विवरण दिया है, वह आश्चर्य चकित करता है। उसके साथ दस हजार बाज रखने वाले घुड़सवार, तीन हजार हांकेवाले व तीन हजार व्यापारी और माल असबाब वाले चलते थे। अकबर जहांगीर के भी शिकार प्रियता के अनेकों विवरण प्राप्त हैं। संक्षेप में इस प्रक्रिया में तराई की सफाई और तब आबादी की वसासत होती थी। यह वसासत मुस्लिम गुलामों, नौकरों की ही होती थी, जो सेवा निवृत्त होते थे, जिन्हे हटा दिया या पुरस्कृत किया जाता था। इन्हें तब "एज्जा" (सम्मानीय) के उलट कमतर माना जाता था और हिन्दू वनवासियों तथा डोमों के इलाके में बसने योग्य माना जाता था।


    (2) तराई होकर जितने अभियान पहाड़ी क्षेत्र में हुए वह बड़े कठिन, आपदापूर्ण, आत्मघाती होने से प्रायः असफल होते थे। तब सुल्तानों के कोप से बचने को सिपाही भगोड़े बन छुपते व बसते थे। इनमें चपरखट (चारपाई) ले जाने वाले, डेरे, बांस वाले तथा हलाल खोर धोबी कुम्हार भी होते थे।


    (3) मुसलमानों में यह तीसरे क्रम वाला वर्ग अफगानों का था जो स्वभाव से लुटेरे, लालची और रात्री चोर तथा अविश्वसनीय माने जाते थे। यह लोग अफगानिस्तान के हिलमण्ड क्षेत्र वाले खलज से कोहिस्तान, काफिरिस्तान से वजीरिस्तान आदि क्षेत्रों से बहलोली, लोदी, वजीरी, अफरीदी आदि कबीलाई नामों से पहचाने जाते थे पर भारतीय इन्हें पठान एक सामूहिक नाम देते थे।


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    1. कुमाऊँ लोकगाथा साहित्य में रुहेले
    2. रुहेलों का विशेष परिचय
    3. रुहेलों के कुमाऊँ अभियान में आए ऐतिहासिक स्थान नाम
    4. कुमाऊँ के खान नामान्त स्थान रुहेला आधिपत्य के प्रतीक हैं



    लेखक -डॉ. शिवप्रसाद नैथानी
    संदर्भ -
    पुरवासी - 2009, श्री लक्ष्मी भंडार (हुक्का क्लब), अल्मोड़ा, अंक : 30

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