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    समता (1935)

    ‌सन् 1935 से लगातार प्रकाशित होने वाला समता पत्र राष्ट्रीय आन्दोलन के युग में स्थानीय स्तर पर दलित जागृति का पर्याय बन गया। दलितोत्थान के लिए दलितों द्वारा किये गये प्रयास का क्रियान्वित रूप समता के रूप में सामने आया। अल्मोड़ा से प्रकाशित होने वाले अन्य पत्रों से समता भिन्न था, क्योंकि यह दलित पत्रिका का उदार प्रारम्भ होने के बावजूद राष्ट्रवादी पत्र नहीं कहा जा सकता था। इसके सम्पादक हरिप्रसाद टम्टा सक्रिय समाज सुधारक और दलितां के उद्धार मे रत थे। समता में जातिगत और सामाजिक भेदभाव की तीव्र आलोचना करने के साथ दलितों की आर्थिक समानता पर भी लेख प्रकाशित हुए। समता के सम्पादकों ने शिल्पकारें को ब्रिटिश सरकार का समर्थन कर उससे अधिक से अधिक लाभ प्राप्त करने को प्रेरित किया। अतः कांग्रेस के साथ-साथ खुशीराम, बचीराम आर्य, बलदेव आर्य आदि राष्ट्रवादी शिल्पकारों की आलोचना की।

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