KnowledgeBase

    चन्द्रकुँवर बर्त्वाल

    Read This Article in Hindi/ English/ Kumauni/ Garwali

     चन्द्रकुँवरबर्त्वाल

    चन्द्रकुँवर बर्त्वाल

     जन्म: अगस्त 20, 1919 
     जन्म स्थान:  मालकोटी, जिला चमोली 
     पिता:  स्व० भूपाल सिंह बर्त्वाल 
     माता:  स्व० श्रीमती जानकी देवी 
     काल:  आधुनिक काल 
     प्रमुख कृति:  गीत- माधवी कविता संग्रह 
     मृत्यु:  1947 

    सरस्वती के वरद पुत्र ‘काफल पाक्कू’ के अमर गायक, चन्द्रकुँवर बर्त्वाल, ने अपनी कालजयी कविताओं में हिमालय का ज्वलन्त जीवन रूप साकार किया है। हिमपण्डित शैल-शिखर, सदानीरा कल-कल करती नदियाँ, लम्बे-चौड़े लहलहाते चरागाह, दूर-दूर तक फैले चीड़, बाँज, बुराँश, देवदार के घने-घने जंगल, रंग-बिरंगे फूलों से लदालद भरी घाटियाँ, झर-झर झरते झरने, जन-जीवन की संघर्षमयी झलकियाँ, यहाँ के दिव्य सौन्दर्य, लावण्य और माधुर्य की मन-मोहिनी छवियाँ, पशु-पक्षी, ऋतुओं का पट-परिवर्तन घन-गर्जन सभी का चमत्कारिक चित्रण किया है।


    प्रकृति के परम पुजारी, विलक्षण प्रतिभा के धनी, अनूठी सूझ-बूझ और दिगदिगन्त व्यापिनी दृष्टि वाले, भारतीय संस्कृति और साहित्य के उद्गाता, विविधता के धुरन्धर व्याख्याता, छायावादी युग में प्रगतिवाद तथा प्रकृतिवाद के प्रस्तोता, चन्द्रकुँवर बर्त्वाल का रचना-संसार, तीन लोक से न्यारा है। अद्भुत और विस्मित करने वाला। अपने मात्र अठ्ठाईस साल के जीवन में लिखने के बारह-तेरह वर्षों में, सात सौ से भी ऊपर कविताएँ, गीत, मुक्तक, निबंध आदि लिखकर कवि ने एक नया इतिहास रचा है। इतने सारे सन्दर्भो पर इनते सारे विषयों पर कवि ने अपनी कलम चलाई कि दाँतों तले अँगुलि दबाने पड़ती है।


    20 अगस्त 1919 को ग्राम मालकोटी, पट्टी तल्ला नागपुर, जिला चमोली में जन्मे चन्द्र कुँवर बर्त्वाल की शिक्षा पौड़ी, देहरादून और प्रयाग में हुई। इनके पिता का नाम श्री भूपाल सिंह बर्त्वाल और माता का नाम श्रीमती जानकी देवी था। सन् 1939 में इन्होंने इलाहाबाद से बी.ए. की परिक्षा उत्तीर्ण की। सन् 1941 में एम.ए. कक्षा में लखनऊ वि.वि. में प्रवेश लिया। वहीं श्री सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ जी के सम्पर्क में आए। क्षय रोग के कारण घर वापस - पंवालिया आ गए। आठ साल पंवालिया और अगस्तमुनि में बीते। अगस्तमुनि मे हेडमास्टर बने लेकिन फिर छोड़ दिया। अपनी 28 वर्षीय जीवन-यात्रा में हिन्दी साहित्य की अपूर्व सेवा कर अनन्त यात्रा पर प्रस्थान कर गए।


    चन्द्रकुँवर बर्त्वाल की रचनाओं को पाठकों तक पहुँचाने में भी शंभु प्रसाद बहुगुणा का महत्पूर्ण योगदान रहा। नन्दिनी ‘जीतू’, ‘पयास्विनी’, ‘गीत माधवी’ आदि-आदि छोटी-पुस्तिकाओं को प्रकाशित कर बहुगुणा जी ने शानदार काम किया इस दिशा में। डा. उमाशंकर ‘सतीश’ ने (I) चन्द्रकुँवर बर्तवाल की कविताएँ (II) चन्द्रकुँवर का कविता संसार और (III) साहित्य के निर्माता चन्द्रकुँवर वर्त्वाल, तीन पुस्तकों का संपादन कर ठोस कार्य किया है। श्री बुद्धिबल्लभ थपलियाल ने चन्द्रकुँवर - काव्य प्रसंग और काव्य संहिता का प्रकाशन कर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।


    मेरे गृह से सुन पड़ती, गिरी वन से आती,
    हँसी स्वच्छ नदियों की, सुन पड़ती विपिनों की,
    मर्मर ध्वनियाँ, सदा दीख पड़ते द्वारों से,
    खुली खिड़कियों से, हिमगिरि के शिखर मनोहर,
    उड़-उड़ आतीं क्षण-क्षण शीत तुषार खाएँ,
    मेरे आँगन छू, बादल हँसते गर्जन कर,
    मेरा गृह है, जहाँ बच्चियों सी हँस-हँस कर,
    नाच-नाच बहती है, छोटी-छोटी नदियाँ।


    आँखे खुलते ही, बचपन से ही, हिमालय कवि के प्राणों में रस-बस गया।


    तुम से पावन और उच्च कुछ भी पृथ्वी के,
    पास नहीं था, इसीलिए पूजन करने की,
    अभिलाषा जब हुई उसे, प्रभु के चरणों की,
    तुम्हें उठा हाथों में, कमलों की माला-सी।।


    हिन्दी साहित्य में, लम्बी-लम्बी, सौ-सौ पदों से भी ऊपर, कविताएँ और गीत लिखने में, कविवर चन्द्रकुँवर बर्त्वाल का अपना एक बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। इन लम्बी कविताओं और गीतों में भावों और अनुभूतियों का जैसा तानाबाना कवि ने बुना वह अनुपम है, आश्चर्यजनक है।


    नदी चली जाएगी, यह न कभी ठहरेगी,
    उड़ जाएगी शोभा, रोके यह न रूकेगी,
    झर जाएँगें फूल, हरे पल्लव जीवन के,
    पड़ जाएँगे पीत, एक दिन शीत मरण से!
    रो-रो कर भी, फिर न हरी यह शोभा होगी,
    नदी चली जाएगी, यह न कभी ठहरेगी।।
    फैला सबके ऊपर वही सुनील गगन है,
    छूती सबको सदा वही मृदु मन्द पवन है!
    चारों ओर वही नदियाँ हैं, वही सरोवर,
    वही वृक्ष हैं, पर भाग्यों में कितना अन्तर!
    हँसता है कोई करता क्रन्दन है,
    फैला यद्यपि सबके ऊपर वही गगन है।।


    ऐसे-ऐसे एक सौ पन्द्रह पद हैं इस लम्बी कविता में! और उनसे जो प्रतिध्वनियाँ निकलती हैं वे तन-मन-मानस को छू जाती है। ‘माधवी के गीत छन्द’ में भी एक सौ बीस पर हैः-


    अब छाया में गुँजन होगा, बन में फूल खिलेंगें,
    दिशा-दिशा से अब सौरभ के, धुमिल मेघ उढ़ेगें।
    अब रसाल की मंजरियों पर, पिक के गीत झरेंगे,
    अब नवीन किसलय मारूत में, मर्मर मधुप करेंगे।


    आश्चर्य होता है कि कवि ने इतनी सारी पंक्तियों में अपनी भावधारा और रसानुभूतियों का कैसा अनोखा तालमेल बिठाया? कलम का जादूगर ही ऐसा कमाल दिखा सकता है।


    चन्द्रकुँवर वर्त्वाल के सम्पूर्ण कृतित्व पर, उनके मौलिक चिन्तन-मनन, गहन अध्ययन, विलक्षण विवेचन-विश्लेषण आरे विस्तृत विवरण-निरूपण तथा उनकी सरलता, सहृदयता और बुद्धिमता की गहरी छवि रही है।


    कवि ने भारतीय साहित्य-वेद, पुराण, उपनिषद, शांकर भाष्य ज्योतिष आदि का अच्छा अध्ययन किया। चित्रकला और संगीत में भी रूचि रही और इन सभी का उन पर गहरा प्रभाव पड़ा।


    सुख बन कर आते है सदा, सुक्त ही अपने,
    दुख बन कर पीड़ित करते, दुष्कृत ही अपने।।


    ‘जैसी करनी, वैसी भरणी,’ दृष्टिकोण की परिपुष्टि एक प्रकार से सुख-दुख के बारे में, वैसे कवि की अपनी अलम मान्यता भी है-


    सुख ने मुझको लहरों के बीच ही झुलाया,
    सुख ने मुझको हलाका सा ही राग सुनाया,
    दुख ले गया मुझे गहरे सागर के जल में,
    हँसते उज्जवल मोती जहाँ तिमिर के तल में,
    दुख ने ही मुझको प्रकाश का देख दिखलाया,
    सुख ने मुझको हलका-सा ही राग सुनाया।।


    ऐसी ही जीवन के सम्बन्ध में कवि का अपना शाश्वत प्रशन है-


    क्षण भर हँसा-रूला, फिर मिटता जो सपना बन,
    कहलाता क्या इस जग में, वह ही जीवन?


    प्रेम के बारे में भी कवि अपनी बात इस प्रकार कहता है-


    है आँखो में आँसु, छाती में तेज जलन,
    कहते है क्या प्रेम इसी को, हे मेरे मन?


    वैसे, कवि की कई पंक्तियों से यह आभास मिलता है कि उनके जीवन में भी किसी ने काफी हलचल मचाई है-


    प्यार मूझे कोई, गीली आँखों से करती,
    मेरे ही चिन्तन में, कोई डुबी रहती,
    आती आँगन में, बैठी रहती द्वारों पर,
    पीली पड़ली ज्योत्सना-सी सूनी आहें भर!
    छाँह किसी की सदा दृगों में मेरे फिरती,
    प्यार मुझे कोई, गीली आँखों से करती।


    और देखिए


    मिला स्नेह मुझको, जब मधुर तुम्हारे मुख से,
    बैठे रहे, हरे वृक्षों के नीचे, हम सुख से!
    बाहों पर बाहें धर, मेरे उर से लग कर,
    हँसती रही चाँदनी-सी निर्मल तुम दिन भर,
    छूट गया जैसे मैं, जन्म-जन्म के दुख से,
    मिला स्नेह मुझको, जब मधुर तुम्हारे मुख से।।
    अपने जीवन-लक्ष्य के बारे में कवि की अपनी अलग धारणा है-
    मेरी नदी स्वयम् अपने पथ को खोजेगी,
    वह सूखे पथ को भी फूलों से भर देगी।


    स्वंतन्त्रता आन्दोलन के दौरान, कलम का सिपाही चन्द्रकुँवर अपना सर्वस्व भारत माता के चरणों में समर्पित करने के लिए एकदम तत्पर है-


    बलि दूँगा जननी मैं, जीवन की बलि दूँगा,
    तुम्हे मुक्त करने को माँ, सौ बार मरूँगा।
    मेरी शरीर को वह चाहे,
    टुकड़े-टुकड़े कर खा डाले,
    पर मैं अपना सिर जालिम के,
    पैरों पर नहीं झुकाऊँगा।
    यह जान चली जाए तो है,
    मुझको इसकी परवाह नहीं,
    मैं या तो विजयी होऊँगा,
    या लड़ता मारा जाऊँगा।।


    इसी संदर्भ में ‘जनयुग’ कविता में कवि घोषण करता है-


    उठ गया अब आदमी, उठ कर खड़ा है हो गया,
    धमनियों में दौड़ता है जोश उसका अब नया।
    आजादी की अलख लगाते हुए कवि हुँकारता है-
    सदियों के बाद जगा भारत,
    गाओ, गाओ, गाओ, जयगान,
    मंथन कर विष पीने वाले,
    विष पी जीवित रहने वाले,
    दीर्घ हिमालय बाँहों वाल,
    शिव-सुन्दर हिन्दुस्तान।।


    सम-सामयिक समस्याओं से सरोकार रखने वाले, कविवर चन्द्रकुँवर वर्त्वाल, दुसरे विश्वयुद्ध के दौरान, जब हीरोसीमा-नागासकी पर अमेरिका ने बम-वर्षा की और लाखों लोग मारे गए, भला वह कहाँ चुप रहते वाले-


    एक दिन न्यूयार्क भी, मेरी तहर हो जाएगा,
    जिसने गिराया है मुझे, वह भी गिराया जाएगा,
    आज ढाई लाख में, कोई नहीं जीवित रहा,
    न्यूयार्क में भी एक दिन, कोई नहीं रह पाएगा।


    वैसे, चन्द्रकुँवर वर्त्वाल का कोमल हृदय, हर घड़ी, गीत ही गुनगुनाता रहा। कवि की धड़कनें मर्मस्पर्शी गीतों की गंगा में हर दर गद्गद् रहती।


    मेरे उर में उमड़ रही गीतों की धारा,
    बन कर गान बिखरता है, यह जीवन सारा!
    प्यारे गीत, बहुत दिन रहे साथ हम जग में,
    रोते-गाते हुए बढ़े हम जीवन पथ में।।


    अपने मधुर गीतों के बल पर ही, कवि जब-तब, अपनी मस्ती में गुनगुनाता रहा-


    मेरे पास आज इतना धन है देने को,
    नये फूल हैं पाँवों के नीचे बिछने को!
    नये मेघ हैं, नयी चाँदनी है, नव यौवन,
    निर्मल मन है, और स्नेह से छल-छल लोचन!
    कौन जानता है, कल ही क्या है होने को,
    मेरे पास आज इतना धन है देने को!


    जन-जन के मन को झंकृत करने वाली कविवर चन्द्रकुँवर की प्यारी कविता ‘काफल पाक्कू’ तो जन-जन की कंठहार बन गई और जहाँ-तहाँ कवि-गोष्ठियों में श्रोता इस कविता को सुनाने के लिए कवि से विशेष आग्रह करते-


    हे मेरे प्रदेश के वासी,
    छा जाती वसन्त जाने से जब सर्वत्र उदासी,
    झरते झर-झर कुसुम तभी, धरती बनती विधवा सी,
    गंध-अंध अलि होकर म्लान, गाते प्रिय समाधि पर गान।।
    एक अंधेरी रात, बरसते थे जब मेघ गरजते,
    जाग उठा था मैं शय्या पर दुख से रोते-रोते,
    करता निज जननी का चिन्तन, निज मातृभूमि का प्रेम-स्मरण,
    उसी समय तम के भीतर से मेरे उर के भीतर,
    आकर लगा गूँजने धीरे एक मधुर परिचित स्वर,
    काफल पाक्कू, काफल पाक्कू, काफल पाक्कू, काफल पाक्कू।।


    बहुत लम्बी कविता है और इसमें पहाड़ से बिछुड़ने की पीड़ा है। कविता पढ़ते-पढ़ते आँसुओं की धारा फूट पड़ती है। ऐसी हृदयस्पर्शी मार्मिक कविता है यह।
    कविविर चन्द्रकुँवर की कई विशेषताओं में एक महत्वपूर्ण बात यह भी रही कि वह जहाँ भी रहे, वहाँ के कण-कण, वहाँ की प्राकृतिक सुषमा उनकी कविताओं में गूँजती रही-


    मेरे गृह को छूकर, निशि-दिन बहने वाली,
    हे अमरो के नन्दन-वन से आने वाली,
    मन्दाकिनी, शिला पर बैठ तुम्हारी छवि को,
    निश्छल पीने की इच्छुक आँखों के आगे,

    नागनाथ में-
    गौशाला के द्वारा खोल कर, गौओं को बाहर कर,
    चले मधुर गीत गाते तुम, हिमजल से भीगे पथ पर,

    पौड़ी में-
    आते रंग-बिरंगे खग, गिरि के शिखरों पर,
    देश-देश से देश-देश के गीत सीख कर,

    देहरादून में-
    हे शालमेखले, किस गिरि से तुम इतना रूप लिए उतरी,
    आँखों में आधा स्वर्ण खुला, अंगों में उन्मद सुरा भरी।।



    लेखक - डा. हरिदत्त भट्ट “शैलेश”
    सर्वाधिकार -
    पुरवासी, श्री लक्ष्मी भंडार (हुक्का क्लब), अल्मोड़ा

    Leave A Comment ?