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    कुमाऊँ के खान नामान्त स्थान रुहेला आधिपत्य के प्रतीक हैं

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    खान नामान्त स्थान आश्चर्य जनक रूप से गढ़वाल में एक भी नहीं और कुमाऊँ में एक दर्जन से भी अधिक ऐसे स्थान नाम आज भी हैं जिनके अन्त में खान शब्द लगा मिलता है जैसे चीनाखान


    1.बाड़ाखाल केन्द्र से अभियान व सम्पर्क स्थान- शफाखान-कोटवाग, धनियाखान, खान व अल्मोड़ा।


    2.हल्द्वानी केन्द्र से- रानीबाग, विजयपुर, कैलाखान, रामगढ़, नथुवाखान, मौना, अल्मोड़ा मार्ग।


    3.हल्द्वानी केन्द्र से- नथुवाखान, खैरना, भुजान, खान मार्ग।


    4.खैरना से - लोधिया खान, मजूरखान, भतरौजखान, स्याल्दे, सरायखेत मार्ग।


    5.खैरना से काकड़ीघाट- देवली खान, वासुलीसेरा, युद्ध स्थल मार्ग।


    6.भतरौंजखान से मंगीखाल- द्वाराहाट, वासुलीसेरा।


    7.पिथौरागढ़ क्षेत्र में- खेतीखान से सरजू पारकर चीनाखान, हरड़ीखान, खान।


    8.रामगढ़ से आरूखान और तब लमगड़ा को।


    9.अल्मोड़ा से सोमेश्वर मार्ग पर - कपड़खान, मनान, सोमेश्वर, कौसानी, वैजनाथ, डंगोली।


    यद्यपि हम प्रत्येक स्थान नाम के स्थान नामों के परस्पर सम्पर्क मार्ग का प्रत्यक्ष भौगोलिक सर्वेक्षण नहीं कर पाये हैं। हम यह कार्य लघु प्रबन्ध प्रस्तुत करने वाले छात्रों पर भविश्य के लिये छोड़ रहे हैं। यहां पर हम उनके मार्ग निर्देशन के लिये कुछ तथ्य दे रहे हैं-


    यह कहना कठिन है कि रुहेला जागेश्वर क्षेत्र में नहीं आए क्योंकि इस क्षेत्र में कफलिखानल तथा सौखान-सुवाखान स्थान नाम सरयूतट मार्ग पर है।


    पुनः अल्मोड़ा से सुवाल नदी पार कर लमगड़ा से आगे खेतीखान मार्ग पर हाथीखान और चायखान स्थान नाम मौजूद हैं। यदि चाय का उत्पादन कम्पनी काल में होने पर चाय खान नाम पड़ा होना माना जाये तो निश्चित रूप से पहले चाय की जगह कोई और स्थान नाम रहा होगा। चूंकि हाथीखान नाम के दो स्थान गढ़वाल में वहां हाथी बांधे जाने के स्थान नाम से है। तब हमें यह मानना होगा कि चन्द राजाओं के हाथी स्थान को हाथीखान (रुहेला हाल्ट) स्थान बनाया गया था।


    अब खान नाम के महत्व का खलासा करना है कि मुस्लिम शासन परम्परा में खान का अर्थ दल नेता हुआ करता था। दस की टोली का नेता अखान और एक हजार का भिंगान तथा दस हजार सैनिकों का नेता तूभान कहलाता था और सबसे बड़ा प्रधान नेता करगान कहलाता था।


    पर ऊपर के खान स्थान नाम में केवल दल नेता के रहने का ठौर- ठिकाना लेना ही उचित होगा। क्योंकि इससे अधिक सटीक तो खान का अर्थ यहां लेना होगा कि सल्तनत काल से ही खुरासानी व्यापारीयों के नक्शेकदम पर एक ऊँट जब 18 मील की दूरी तय कर लेता था तो उसे आराम देने को माल उतार कर पूरा सार्थवाह दलनेता खान सहित वहां विश्राम करता था। रुहेले जब तराई में काबिज हुए तो इसी पैमाने को अपनाया पर वह आश्चर्यजनक रूप से नीचे तो लुप्त हो गया और केवल कुंमू में रुहेला आक्रमण मार्ग के साथ डाक प्रबन्ध व मैदानी मार्ग से व्यापार सम्पर्क स्थान रूप में जीवित रह गया। आज वह सभी स्थान उपेक्षित हैं जबकि प्रत्येक खान नामान्त के स्थान का अध्ययन और इसी जैसे दूसरे स्थान से दूरी तथा आतताइयों के मार्ग व लूटमार अभियानों का अध्ययन किया जा सकता है। हमें स्मरण रखना है कि स्थान नाम एकाएक और एक जैसे यों ही नहीं पड़ जाते। इसके पीछे ऐतिहासिक कारण अवश्य होता है। एक बात हमें स्पष्ट करनी है कि कुमाऊँ में खान नामान्त के स्थान नामों के जीवित रहने का एक बड़ा कारण बाद को रुहेलों से कुमूं राज्य का मधुर और धनिष्ठ सम्बन्ध रहा है। जिससे तराई से अवाध व्यापार सम्पर्क रहा और वनजारों के अलावा मुस्लिम व्यापारी भी ऊँचाई के क्षेत्रों तक आते जाते रहे।


    ज्ञातव्य है कि नजीबाबाद संस्थापक और कुमाऊँ को लूटने वालों में एक सरदार नजीवखां ने जब 1761 ई. अहमद शाह अब्दाली अफगानिस्तान के पठान शासक की मराठों के विरूद्ध पानीपत की तीसरी लड़ाई में मदद करने का निश्चय किया तो कुमाऊँ के चन्द राजा ने सेना द्वारा रुहेला सरदार को सभी तरह से सहायता दी थी। अर्थात जहां कुमाऊँनी फौज पठानों की तरफ से मराठों के विरूद्ध लड़ी थी, वहीं नजीबुद्दोला के हरम की रखवानी हेतु किला पत्थरगढ़ नजीवाबाद में भी कुमाऊँ सैनिक भेजे गए थे। 8000 कुमाऊँनी सेना को तब हरिराम जोशी और बीरबल नेगी के अधीन भेजा गया था।


    रुहेलो के साथ 1750 ई. से घनिष्ठ मैत्री सम्बन्ध होने से कुमूं राज्य को बड़ा लाभ हुआ। एक तो यह कि उसे रुहेलों का सहयोग मिलने से अब अपने तराई क्षेत्र के अधिकार और दोहन का भरपूर अवसर मिला। दूसरे वह मेवाती हेड़ियों और तराई पर हमला करने वाले सिख लुटेरों और मराठों उत्पीड़कों से लड़ने में सक्षम हो गया।


    यद्यपि इस बात कि प्रमाण हैं कि बाजबहादुर चन्द के समय से ही मुस्लिम धर्म के चाकर चन्द दरबार और शासन में पद पान लगे थे। चोपदार, सिपह, सिपाही, काजी, बख्शी, कमरबन्द, नजर-निसार (मुछौली) पदो के साथ चौदहवीं पन्द्रहवीं सदी से काली नदी के उपरी क्षेत्र और गोमती सरयू क्षेत्र में मुस्लिम अभियानों के साथ बलात रूप से लाए चार चाकर व हलाल खारे अपन इच्छा से यहीं कहीं रहने भी लगे थे जिनका आज स्थान नाम रूप में उल्लेख करना बगैर पुष्ट प्रमाणों के उचित नहीं लगता परन्तु अनुमान है।


    एक संकेत उन पुरातत्व लेखों की ओर अवश्य करना है जो कत्यूर घाटी में ग्वालदम के पूर्वी व दक्षिणी पनढाल क्षेत्रों से प्राप्त समाधियों और मृदभाण्डो से सम्बधित हैं। इनमें अनेक मुस्लिम कब्रें हैं। जो मुसलमान तब, संभवतः धर्म परिवर्तन उपरान्त यहां बसना चाहते थे, उन्हे चन्दराजाओं ने इस कालापानी माने जाने वाले क्षेत्र में बसने की अनुमति दी होगी।


    बहुत पहले, संभवतः ऐसी ही अनुमति पिथौरागढ़ क्षेत्र में भी मिली होगी। इस सम्बन्ध में यहां पर एक मत को हूबहू उद्घृत किया जा रहा है- "दारमा चौंदास के निवासी ही अलग हैं, लगता है जैसे हम मंगोल लोगों के बीच में हो। स्त्रियां अफगानी लोगों की भांति प्रत्येक बात पर हंसती हैं, न छिपती हैं न घूंघट निकालती है। पुरूष भेड़ बकरियां चराते, लद्दुओं पर झींकते चले जाते है। यह देश प्रथम दर्शन में ही मंत्र मुग्ध कर देता है।" चार्ल्स शेरिंग वेस्टर्न तिब्बत एण्ड ब्रिटिश बार्डर लैंड-पृ. 56


    स्थान नामों का महत्व- अन्त में बताना है कि स्थान नामों का अध्ययन अत्यन्त महत्वपूर्ण है। स्थान नाम कभी नहीं मरते, परिवर्तित स्वरूप् में आ जाते हैं। प्राचीन तक्षकशिला आज तक्षिला है, भट्टनगर भटनेर बन गया है, मूलस्थानपुर मुलतान है और मध्य एशिया में हिन्दू धर्म का प्रचण्ड केन्द्र मारकण्ड आज समरकन्द है। जो कभी कपिल तीर्थ था आज काबुल है, आकरी आगरा और ढिल्ली, दिल्ली बन गया है।


    कुमाऊँ से ही उदाहरण लीजिए। टेकनपुर - टनकपुर है, हल्दु चौड़ हल्द्वानी है, आलमनगर अल्मोड़ा है, विनेश्वर विंसर, व्याघ्रेश्वर, बागेश्वर और रेमजेनगर रामनगर तथा ग्वल्लधाम ग्वालदम शब्द के रूप में परिवर्तित हो गया है। हम समझते हैं कि जो पहले दिगोली था वह आज डंगोली हैं। एक दिगोली लखनपुर - चौखुटिया क्षेत्र में है।


    अधिक जानकारी के लिए लिंक देखे।


    1. कुमाऊँ लोकगाथा साहित्य में रुहेले
    2. माल तराई याने कटेहर का संक्षिप्त इतिहास
    3. रुहेलों का विशेष परिचय
    4. रुहेलों के कुमाऊँ अभियान में आए ऐतिहासिक स्थान नाम



    लेखक -डॉ. शिवप्रसाद नैथानी
    संदर्भ -
    पुरवासी - 2009, श्री लक्ष्मी भंडार (हुक्का क्लब), अल्मोड़ा, अंक : 30

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