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    कत्यूरीयों में द्वैत शासन की परम्परा

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    पिथौरागढ़ के अस्कोट क्षेत्र में पाल वंश के रजवारों की शासन की ऐतिहासिक परम्परा सन् 1947 ई. तक इस क्षेत्र में विद्यमान थी। इसी परिपेक्ष में इनके पूर्ववर्ती कत्यूरी शासकों का उल्लेख ई.टी. अटीकंसन राहुल एवं बद्री दत्त पाण्डेय ने अपनी पुस्तकों में किया है। इसके साथ ही अस्कोट के पाल रजवारों का मूल उद्भव तथा पालों को कत्यूरियों की एक शाखा के रूप में स्वीकार किया गया है।
    अस्कोट क्षेत्र के ऐतिहासिक सर्वेक्षण से सन् 1238 ई. से लेकर सन् 1623 ई. तक शिलालेख एवं ताम्र पत्र प्राप्त हुये हैं। इनके अघ्ययन से समय समय पर द्वैत शासनधिकारियों के नामों का पता चलता है। कत्यूर में बहुप्रचलित लोक परम्परा "जागर"’ एवं कत्यूरी वंशावली में एक ही समय पर दो राजाओं द्वारा द्वैत शासन की परम्पराओं का उल्लेख मिलता है। विविध सामग्री के अघ्ययन से यह प्रमाण मिलते है कि कत्यूरी राज में द्वैत शासन की परम्परा विद्यमान थी, जैसे-


    1. भारथी पाल के घुसेरा ताम्रपत्र में नाग पाल विक्रम पाल द्वारा सम्मिलित व्यवस्था का उल्लेख। (शाके 1316 सन् 1394 ई.)
    2. कल्याण पाल के छोटा ताम्रपत्र में कल्याण पाल के महेन्द्र पाल द्वारा सामूहिक रूप् से भूमिदान का उल्लेख। (शाके 1525 सन् 1603 ई.)
    3. महेन्द्र पाल के सिंगाली ताम्रपत्र में कल्याण पाल एवं राईपाल द्वारा दी गई भूमि व्यवस्था का उल्लेख। (शाके 1544 सन् 1622 ई.)
    4. कत्यूर की लोक परम्परा "जागर" में श्री धामदेव बह्मदेव के नाम, सामूहिक रूप से लिये जाने की परम्परा है।
    5. वंशावली में वर्णित आसंतिदेव-वासंतिदेव के नाम का उल्लेख।


    भारथी पाल के घुंसेरा ताम्रपत्र के अनुसार पिथौरागढ़ नगर पर अकु के शासक भारथी पाल रजवार ने अपना अधिकार कर लिया था। भारथी पाल के द्वारा प्रदत्त ताम्र पत्र में वर्णित निम्नलिखित पंक्तियों के आधार पर -


    "रौला पाघ, भाख पशा किई भट् भाट
    पाई जै, रित नागपाल विक्रम पाल
    भार्द्र पशा किई थि-तै रित रजवार भाख
    पशा किई जै रिव अभिनन्दन राज इन्हि ले
    र्न्विहयों रे रित भद भाट ले निर्वहणु।"


    उक्त ताम्रपत्र की पंक्तियों का अध्ययन करने से यह स्पष्ट होता है कि, भारथी वात के पूर्ववर्ती राजा नागपाल और विक्रमपाल ने भूमि का अधिकार, सामुहिक रूप से भद भाट को दिया था। कत्यूरी वंशजों के रजवारं द्वारा सामुहिक रूप से दिया गया यह अधिकार उस समय में प्रचलित द्वैत शासन की ओर इंगित करता है। दूसरा तथ्य यह भी सामने आता है कि अकू राज्य की गद्दी से नागपाल ने राजकीय आदेश पारित किया, अस्कोट राज्य से विक्रम पाल ने दिये गये अधिकारों की पुष्टि की। अस्कोट एवं अकू की ऐताहासिक परम्पराओं में भी इस प्रकार के प्रकरण दिखलाई देते हैं।


    "कल्याण पाल" के भेटा ताम्रपत्र शाके 1525 सन् 1603 ई. में दो राजाओं का एक साथ, भूमि दान के समय उल्लेख किया गया है। जैसे-


    "श्री कल्याण पाल रजवार,
    महेन्द्र पाल कुंवर सपरिवार चिरंजयन्तु" (1)


    स्पष्ट है कि कल्याण पाल के साथ महेन्द्रपाल के नाम का आना इस समय के द्वैत शासन की परम्परा का उल्लेख करता है। कल्याण पाल के साथ महेन्द्र पाल पर भी शासन सम्बन्धी दायित्वों का भार था। सम्भवतः किसी भी प्रकार के दान जिनमें प्रमुख भूमि दान था, उस पर दोनों वैध राजाओं की स्वीकारोक्ति आवश्यक थी। संकल्प करते समय द्वय राजाओं के नाम का उल्लेख द्वैत शासन की ओर इंगित करता है।


    "महेन्द्र पाल" के सिंगाली ताम्र पत्र शाके 1544 सन् 1622 में राय पाल और कल्याण पाल के नाम का उल्लेख द्वय रूप से उनके द्वारा प्रदत्त भूमिदान के सम्बन्ध में किया गया है। रायपाल-कल्याण पाल ने सम्मिलित रूप् से नरी-वझा की तराई वाली सिंचित भूमि दान में दी थी।


    कत्यूर में प्रचलित लोक परम्परा "जागर" में श्री कत्यूरी राजा धाम देव- बिरम देव का नाम सम्मिलित रूप से लिया जाता है। इसी प्रथा के अनुसार "जागर" पद्धति में दो "आल" (पंक्तियां) बैठाई जाती है। इन पंक्तियों के मध्य घी का दीपक जलाया जाता है और गाथा गायी जाती है-


    "गढ़ रे कत्यूरी दियाड़ो जलाय।"


    धाम देव के प्रशस्ति गीतों के उल्लेख के साथ राजा बिरम देव के शौर्य गीतों का उल्लेख किया जाता है। इसी "जागर" के अनुसार- लखनपुर बेराठ के राजा धामदेव तथा कत्यूर में स्थित "रणचुली - हाट" के राजा बिरम देव- कत्यूर राज्य को बाह्य आक्रमणों से सुरक्षित रखने का प्रयास करते थे।


    अस्कोट से प्राप्त वंशावली में आसंतिदेव-बासन्ति देव के नाम का उल्लेख भी एक साथ हो आता है। विभिन्न स्थानों से प्राप्त कत्यूरी वंशावली में इस प्रकार के उदाहरण मिलते हैं।
    शिलालेख ताम्रपत्र के अध्ययन के अतिरिक्त कत्यूरी लोक परम्परा "जागर" भी कत्यूरियों के द्वैत शासन को स्पष्ट करती है। वंशावली का क्रम भी द्वैत शासन की परम्परा को दर्शाता है। देखा जाए तो वर्तमान समय में भी शासन की इकाईयों को व्यवस्थित स्वरूप् प्रदान करने हेतु द्वि सदन या इससे भी अधिक इकाइयों की स्थापना की जाती है। अवश्यमेव ही आज से 500-600 वर्ष पूर्व इस प्रकार की व्यवस्था होगी कि एक ही परिवार के लोग जनता में अपना पूर्ण प्रभुत्व बनाये रखने हेतु शासन की परम्परा को सर्वमान्य मानते थे। कत्यूरी राजाओं को द्वैत शासन की परम्परा से दो तरह की सुविधा रहती थीं। प्रथम राज्य की मुख्य गद्दी पर राजा बराबर उपस्थित रहता था तथा राज्य की प्रत्येक कठिनाइयों को समझने का, प्रयास किया करता था। आन्तरिक एवं बाह्य संकट की स्थिति से राज्य को उबारने के लिए द्वैत शासनाधिकारी सम्मिलित रूप से प्रयास किया करते थे।


    उपर्युक्त विवेचनों से यह स्पष्ट होता है कि कत्यूरी राज्य में, द्वैत शासन की परम्परा विद्यमान थी। शिलालेख ताम्र पत्र, विविध सामग्री की समालोचना के साथ पर्वतीय क्षेत्र की लोक परम्परा "जागर" एवं वंशावली की अघ्ययन भी कत्यूर के द्वैत शासन को दर्शाता है।



    लेखक -डॉ. दीपचन्द्र चौधरी
    संदर्भ -
    पुरवासी - 2009, श्री लक्ष्मी भंडार (हुक्का क्लब), अल्मोड़ा, अंक : 30

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