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    गणतंत्र दिवस - कुमाउँनी सांस्कृतिक दल की प्रथम प्रस्तुति

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    1954 की गणतंत्र दिवस परेड में कुमांउनी संस्कृति की झांकी जब प्रस्तुत की गई तो कुमाऊं की पहाड़ियों में कुछ ही लोगों के पास रेडियो थे। टेलीविजन का तो जमाना ही नहीं था। उस समय अल्मोड़ा नगर अपने बौद्धिक शैक्षिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए ख्याति प्राप्त था, लेकिन पूरे नगर में मुट्ठी भर लोगों के पास रेडियो थे। जहां भी रेडियों थे वहां गणतंत्र दिवस परेड का आंखो देखा हाल सुनने के लिए लोग एकत्रित हो जाते। 1954 में सुनने वालों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक थी।


    प्रसंगवश जिक्र किया जा रहा है कि 1954 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के पद पर भारत रत्न गोविन्द बल्लभ पन्त आसीन थे। पन्त जी उदयशंकर कल्चरल सैन्टर की सांस्कृतिक गतिविधियों से परिचित थे और इससे प्रभावित तत्कालिन कतिपय संस्कृति प्रेमियों को भी वे जानते थे। बतौर मुख्यमंत्री उन्होने अल्मोड़ा के जिलाधिकारी से कहा कि गणतंत्र दिवस परेड पर उत्तर प्रदेश की ओर से अल्मोड़ा का सांस्कृतिक दल भेजा जाय। उस समय पिथौरागढ़, चम्पावत और बागेश्वर अल्मोड़ा जिले के अन्तर्गत थे।


    मुख्यमंत्री का आदेश मिलते ही तत्कालीन जिला प्रशासन के हाथ पांव फूल गये। जनवरी का एक सप्ताह गुजर चुका था। कड़ाके की ठण्ड पड़ रही थी। कपकोट, मुंस्यारी जैसे ऊंचाई वाले गांवों में बर्फ की चादर बिछी हुई थी। न इतनी सड़के थी न आज की तरह संचार साधन। कई गांव सड़कों से कोसो दूर थे जहां पहुंचने के लिए पैदल चलना पड़ता था।


    जिलाधिकारी ने तत्कालीन नियोजन अधिकारी विद्याधर बहुखण्डी को दल भेजने के लिए निर्देशित किया। उस समय प्रसिद्ध रंगकर्मी स्व. ब्रजेन्द्र लाल शाह सहायक नियोजन अधिकारी कपकोट के पद पर कार्यरत थे। बहुखण्डी जी ने स्व. ब्रजेन्द्र लाल शाह को किसी तरह सन्देश पहुंचाकर सांस्कृतिक टोली बनाने को कहा। ब्रजेन्द्र लाल शाह उस समय कुछ कार्यक्रमों में मार्फत अपनी सांस्कृतिक छाप छोड़ चुके थे। मुख्यमंत्री पन्त इससे अवगत थे।


    बजेन्द्र लाल शाह ने रिहर्सल और टोली के परिधान की चिन्ता किए बिना जोहार तथा पिण्डारी के अंचल से दो दर्जन से अधिक ग्रामीणों को बागेश्वर बुलाया। इसमें बारह महिलायें थी। ये लोग लगातार चार दिन बर्फ में पैदल चलकर बागेश्वर पहुंचे। ज्यादातर ग्रामीणों को हिन्दी बोलना भी नहीं आता था। दिल्ली तो दूर की बात थी आधे से अधिक लोगों ने बागेश्वर भी नहीं देखा था। कुछ लोग इसलिए खुश थे कि उन्हे मोटर देखने और उसमें बैठने का अवसर मिलेगा।


    उत्तरायणी मेले के बाद यह दल दिल्ली रवाना हुआ। बागेश्वर से दिल्ली पहुंचने में दो दिन लगे। लम्बे सफर से थके हुए दल के लोग 17 जनवरी को राजधानी दिल्ली पहुंचे। बहुखण्डी और स्व. शाह को परेड में दल का नेतृत्व करना था। दिल्ली में अजीबोगरीब वस्त्र पहने इन लोगों को दिल्लीवासी देखते रह जाते। दूसरी तरफ दल के लोग बहुमंजिली इमारतों और सड़को में दौड़ती कारों को देखकर हतप्रभ थे। रक्षा मंत्रालय ने तालकटोरा स्टेडियम में दल के ठहरने की व्यवस्था की थी।


    18 जनवरी को उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधि कर रहे अल्मोड़ा के दल ने रिहर्सल प्रारम्भ की। सभी ग्रामीण अपने मूल पोशाकों में ही थे। इतना समय नहीं था कि सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए कोई ड्रेस तैयार की जाय। महिलायें परम्परागत घाघरे- आंगड़े पहने हुई थी जबकि पुरूष पायजामा, कोट और काली टोपी पहने हुए थे। परम्परागत कुमाउंनी वाद्ययंत्र भी टोली के साथ थे। इस दल ने चांचरी और जागर की रिहर्सल की। 25 जनवरी तक 7-8 बार रिहर्सल की गई। रिहर्सल नेशनल स्टेडियम में की गई। दोनों कार्यक्रमों के लिए पांच पांच मिनट का समय निर्धारित था।


    गणतंत्र दिवस को तड़के यह दल पार्लियामेन्ट भवन पहुंचा। बहुखण्डी और ब्रजेन्द्र शाह दोनों ने दल के पुरूषों की भांति अपनी ड्रेस पहन ली। मार्च पास का नेतृत्व बहुखण्डी ने किया। इस दल ने ‘भारत माता की जय‘ का नारा लगाकर राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद को सलामी दी। उस समय सांस्कृतिक प्रदर्शन मार्च पास्ट के साथ नहीं होता था।


    उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व कर रहे अल्मोड़ा के इस दल को सांस्कृतिक प्रर्दशन का अवसर 27 जनवरी को नेशनल स्टेडियम में दिया गया। विभिन्न प्रदेशों की संस्कृति मूलक कार्यक्रम देखने के लिए स्टेडियम खचा खच भरा था जिसमें केन्द्र सरकार के कुछ मंत्री भी शामिल थे। उत्तर प्रदेश की बारी आते ही अल्मोड़ा के दल ने चांचरी प्रस्तुत की। चांचरी की धुन इतनी आकर्षक थी कि पूरे स्टेडियम में शान्ति छा गई। चांचरी शिव की अर्धांगिनी पार्वती को केन्द्रित करते हुये प्रस्तुत की गई जिसके बोल इस प्रकार थे-
    “इजू मेरी भगवती मैं सेवा करूंलो सेवा” ---- अर्थात मां! मैं तेरी सेवा करूंगी। तू विश्व के सभी लोगों को सुख प्रदान कर। सभी स्थानों में सुख व शान्ति हो। हमारी गायें अधिक दूध दें---। इसमें विश्व शान्ति की झलक प्रसतुत की गई। चांचरी समाप्त होते ही पूरा स्टेडियम तालियों से गूंज उठा।


    इस दल को 28 जनवरी को ‘जागर’ का प्रदर्शन करने का मौका मिला। जिसमें ‘राजूला- मालूशाही’ का प्रसंग लेकर प्रस्तुतीकरण किया गया। निर्धारित पांच मिनट के अन्दर यह जागर पूरा नहीं हो सका लेकिन इसे देखकर दर्शक ठगे रह गए।


    31 जनवरी को राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद और प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने विभिन्न प्रदेशों की टोलियों को जलपान कराया। इसी दिन ‘मुगल गार्डन’ के शानदार लॉन में अल्मोड़ा के इस दल के सदस्यों को “लोक नृत्य प्रतियोगिता 1954” अंकित किया हुआ पदक प्रदान किया गया।


    उत्तर प्रदेश के इस दल के कार्यक्रमों को दिल्ली से छपने वाले कुछ अखबारों ने विशेष महत्व देकर प्रकाशित किया। उस समय अल्मोड़ा में दिल्ली के कुछ ही दैनिक पहुंचते थे। समाचार पढ़कर यहां लोग फूले नहीं समाये।


    1954 में यह समाचार शक्ति में विस्तार से प्रकाशित किया गया। इन पंक्तियों के लेखक ने जब स्व. ब्रजेन्द्र लाल शाह को यह समाचार पढ़ाया तो उनकी पुरानी स्मृतियां जाग उठी। वे कहते दो-तीन फिट बर्फ को फांदकर नंगे पांव जिस तरह पुरूष और महिलायें बागेश्वर पहुंची वह अब कल्पनातीत लगता है। कुमाउंनी लोक संस्कृति और लोक धुनों की जो बात इन बर्फानी गांवों में मौजूद थी वैसी कहीं नहीं हैं। दुःखी ब्रजेन्द्र लाल शाह कहते इन गांवों में सैकड़ो लोक धुनें उन्होनें सुनी है जो धीरे-धीरे काल कलवित होने के कगार पर हैं। उन्होने बताया कि इस सफल प्रदर्शन के लिए कुछ समय बाद गोविन्द बल्लभ पन्त ने बधाई दी। स्व. शाह की लोकसंस्कृति को मंच में पहुंचाने का हौसला ऐसा जागा जो निरन्तर चलते रहा।
    आजादी के कुछ सालों बाद बिना किसी तैयारी के कुमाऊं के दूरस्थ गांवों के संस्कृति मूलक कार्यक्रमों को राष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शित करना एक चुनौती थी। वह ऐसा समय था जब ग्रामीण कलाकारों की कला का कोई पारखी नहीं था। दिल्ली गए दल के लोगों को उस समय लोक कलाकार न कहकर सम्बन्धित गांव का व्यक्ति कहा गया। सरल सहज प्रकृति के दल के कलाकारों को भी पहली बार अहसास हुआ कि लोक संस्कृति की विरासत दूरस्थ गांवों में रची बसी है। वे इस बात पर आश्चर्य चकित थे कि तीज त्योहारों मेलों में जो चीजें वे प्रस्तुत करते रहे उनका इतना अधिक सांस्कृतिक महत्व है। मौखिक परम्परा का यह लोक साहित्य जब छपेली/जागर के लोक धुनों में प्र्रस्तुत हुआ तो अल्मोड़ा के तत्कालीन सांसद देवीदत्त पन्त भी स्टेडियम में झूम उठे। देवीदत्त पन्त खुद भी कला प्रेमी थे। मेलों में नाचना गाना उन्हे खूब भाता था।


    दल में गए कलाकारों को पहली बार कप प्लेट की चीनी मिली चाय की चुसकियां लगाने का मौका मिला। वे मिश्री अथवा गुड़ के साथ चाय पीने के आदी थे। गांव के संकरे और ऊंचे चट्टानों में चढ़ने वाले ग्रामीणों को दिल्ली की चौड़ी सड़कें विशालकाय लगतीं। ब्रजेन्द्र लाल शाह के शब्दों में, “दिल्ली की सड़कों में गुजरते समय वे कलाकार अपने को स्वर्ग में समझने लगे,” जिस समय उन्हे पदक प्रदान किया गया वे इतने खुश हुए कि मानों अमूल्य निधि मिल गई हो।


    इस राष्ट्रीय समारोह में भाग लेने के बाद बहुखण्डी और शाह अल्मोड़ा लौटे तो बधाई देने वालों का तांता लग गया। राष्ट्रीय स्तर पर कुमाउंनी सांस्कृति कार्यक्रमों को सराहने से एक नया अध्याय शुरू हो गया। कालान्तर में ब्रजेन्द्र लाल शाह और मोहन उप्रेती की जोड़ी कुमाऊ की माटी के सांस्कृतिक मूलक कार्यक्रमों को अन्तर्राष्ट्रीय मंचो में मंचित करने में सफल रही। शाह और उप्रेती दोनों ही संसार में नहीं रहे। माटी की संस्कृति से सम्मोहित होकर वे जो कुछ कर गए वह इतिहास बन चुका है । दूसरी तरफ बढ़ते पलायन, गरीबी और साधनहीनता ने ग्रामों में बसने वाली ‘सांस्कृतिक थात’ को लीलना शुरू कर दिया है। चार दिन तक बर्फ को फांदकर पैदल चलने वाला लोक कलाकार कहीं खोकर रह गया है। लोक संस्कृति के नाम पर निहायत घटिया और बाजारू सी.डी. अलग से सांस्कृतिक प्रदूषण फैला रहे हैं। 1954 के गणतंत्र दिवस के कुमाउनी कार्यक्रमों से बहुत बड़ी सीख ली जा सकती है। इसके लिए आधुनिकता और भोगवादी अपसंस्कृति के लबादे को उतारकर फैंकना होगा, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो रहा है।



    लेखक -शिरीष पाण्डेय “शक्ति” हिन्दी साप्ताहिक, अल्मोड़ा
    संदर्भ -
    पुरवासी - 2009, श्री लक्ष्मी भंडार (हुक्का क्लब), अल्मोड़ा, अंक : 30

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