KnowledgeBase

    हिलजात्रा - लोकोत्‍सव

    Read This Article in Hindi/ English/ Kumauni/ Garwali

    maletha nahar

    'हिलजात्रा' शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है- हिल और जात्रा। कुमाउनी में 'हिल' का अर्थ है-कीचड़ और जात्रा का अर्थ है-यात्रा। इस प्रकार 'हिलजात्रा' का शाब्दिक अर्थ हुआ-कीचड़ में की जाने वाली यात्रा। 'हिल' शब्द 'अपार जन समूह' के अर्थ में भी प्रयुक्त होता है। कीचड़ में यानी वर्षात के दिनों कुमाऊँ के पिथौरागढ़ जनपद के कुमौड़ गांव में यह लोकनाट्य आयोजित होता है। कुमौड़ के अतिरिक्त पहले सेरा, बजेटी और आसपास के अन्य गांवों में भी इसका आयोजन होता था। आठूं पर्व के दिनों गौरा-महेश्वर की विदाई के दिन यह लोकनाट्य आयोजित होता है। इसमें वर्षाकाल के कृषि संबंधी दैनंदिन क्रिया कलापों- जुताई, रोपाई आदि का विभिन्न पात्रों के माध्यम से अभिनय किया जाता है। इसमें पुतारियों (पौध रोपने वाली स्त्रियों) तथा भजन मंडली के सदस्यों को छोड़ कर सभी पात्रों द्वारा मुखौटे धारण किए जाते हैं। बैल और हिरन भी इसमें पात्र रूप में अवतीर्ण होते हैं।


    हिलजात्रा में अभिनय करने वाले प्रमुख पात्र इस प्रकार हैं- 1. घोड़िया चौकीदार, 2. झाडूवाला, 3. जालिया (मछेरा), 4. दही वाला, 5. ग्वाला, 6. हलवाहा, 7. छोटे बैलों की जोड़ी, 8. नैपाली बैलों की जोड़ी, 9. बड़े बैलों की जोड़ी, 10. पुतारियां (धान के पौध रोपने वाली स्त्रियां), 11. हिरन चित्तल 12. लखिया भूत 13. नाई, 14. भालू और 15. भजन मंडली। ये सभी पात्र अपने-अपने क्रम में आते हुए अपने नाम और गुण के अनुरूप अभिनय करते हैं। सर्वप्रथम घोड़िया चौकीदार घोड़े का मुखौटा पहन कर घोडे का अभिनय करता नाट्यारंभ की सूचना देता है। झाडूवाला झाडू-बुहारा करता आगे बढ़ता है। जालिया जाल फेंकता मछली पकड़ने का अभिनय करता है। दही वाला लकड़ी के बर्तन में दही ले कर सबको बांटता है। ग्वाला बैलों को चराता आगे आता है। हलवाहा बैलों को जोतने का अभिनय करता है, गलिया बैल की पूंछ पकड़ कर उठाता है, नेपाली बिगडैल बैल को साधता है। बैलों के मुखौटे पहने व्यक्तियों के कंधे रस्सी से बंधे होते हैं, उनके गले में घंटी बंधी रहती है। ये कूदते-फांदते-उछलतेमुंह मारते आगे बढ़ते हैं। कभी रस्सी तुड़ाकर भागने का अभिनय करते हैं। स्त्रीवेशधारी (पुरूष) पुतारियां मिट्टी के ढेले तोड़ने, बच्चों को सुलाने, स्तनपान कराने, रोपाई का खेत तैयार करने, पौध रोपने आदि का अभिनय करते हैं। हलिया खेत जोतने, हुक्का पीने, छाया में बैठकर सुस्ताने आदि का अभिनय करते है। हलिया ... इन सबके बीच में ढोलक, मजीरा, चिम्टा, हारमोनियम आदि वाद्यों को बजाती और गाती भजन मंडली नाचती-गाती फिरती रहती है। इनके आगे पांच स्त्रियां नृत्य करती हुई आती हैं। यह नाच-गान शिवविवाह की खुशी को व्यक्त करने के लिए होता है। हिरन-चित्तल हिरन का मुखौटा पहन कर कुलांचे भरता है। इस भजन मंडली से पहले रस्सियों से बंधा लखिया भूत कूदता-फांदता आता है। लखिया भूत के आगमन की सब दर्शक उत्सुकता से प्रतीक्षा करते हैं। यह भयंकर मुखौटा पहने रहता है। इसका पूरा शरीर काला और बलिष्ठ होता है। इसके पीठ पर त्रिशूल का निशान बना होता है। रस्सी से बंधे लखिया भूत को आठ आदमी अलग-अलग दिशाओं से नियंत्रित करते आगे बढ़ते हैं। वह पूरे मैदान में घूमघूम कर लोगों को आशीर्वाद देता है। यह शिवगण साक्षात शिव का अवतार माना जाता है। गौरा-महेश्वर की विदाई के साथ यह लोकनाट्य समाप्त होता है। पृष्ठभूमि में नगाड़े एवं दमामे बजते रहते हैं। नेपाल में यह लोकनाट्य ‘इंद्रजात्रा' के रूप में मनाया जाता है। यह लोकनाट्य ग्यारह सदी से प्रारंभ हुआ माना जाता है, जो तद्युगीन कृषि उत्सव की याद ताजा कर देता है।


    हिलजात्रा का रंगमंच खुला रंगमंच है। कुमौड़ गांव का मैदान ही इसका रंगमंच है। वेश सज्जा कुमौड़ के पुराने महल के कक्ष में की जाती है। वहीं से विभिन्न पात्र मुखौटे पहन कर आते हैं। लगभग 25-30 पात्रों के घूमने-फिरने के स्थान को छोड़कर गोल घेरे में स्वयमेव दर्शक दीर्घा भी निर्मित हो जाती है। घरों की छतें दर्शक दीर्घाएं बन जाती हैं। अब यह लोकनाट्य अत्याधुनिक साज-सज्जा के के साथ आकर्षक ढंग से आयोजित किया जाने लगा है। इसे देखने लगभग पचास हजार से अधिक दर्शक उमड़ पड़ते हैं। इसने अब पिथौरागढ़ ही नहीं उत्तराखण्ड के प्रमुख लोकनाट्य का रूप के ग्रहण कर लिया है।


    सोर-पिथौरागढ़ में प्रचलित इस उत्‍सव के ऐतिहासिक अतीत के विषय में माना जाता है कि इस का उत्‍सव के आधार हैं नेपाल में प्रचलित जातें (यात्राएं), यथा महेन्‍द्रनाथ रथजात्रा, गायजात्रा, इन्‍द्रजात्रा, पंचाली भैरवजात्रा, गुजेश्‍वरी जात्रा, चकनदेवजात्रा, घोड़ाजात्रा, बालजूजात्रा आदि। जनश्रुति के अनुसार पिथौरागढ़ में इस यात्रा जात्रा उत्सव का प्रारम्भ राजा पिथौराशाही के समय में नेपाल की इन्द्रजात्रा (पुरातन इन्द्रध्वज यात्रा) के अनुरूप पर वहां से आने वाले चार महर भाइयों के द्वारा कुमौड़ ग्राम में किया गया था जो कि अभी भी इसका प्रमुख केन्द्र है। इसे प्रारम्भ करने वाले महर भाइयों के सम्बन्ध में कहा जाता है कि वे बड़े वीर थे। जब वे यहां आये थे तो उस समय यहां पर एक नरभक्षी शेर का आंतक छाया हुआ था। राजा की ओर से इस हिंसक शेर को मारने वाले को मुंहमांगा पुरस्कार दिये जाने की घोषणा से प्रेरित होकर उन्होंने इसे मार डाला। इस पर अपनी घोषणा के अनुसार राजा ने इन्हें चण्डाक में बुलाके उनका भव्य सम्मान किया तथा उन्हें मनचाहा पुरस्कार मांगने को कहा। कहा जाता है इनमें से सबसे बड़े भाई कुंवरसिंह कुरमौर ने चण्डाक की चोटी पर खड़ा होकर चारों ओर देखकर कहा कि यहां से जितनी भूमि मुझे दृष्टिगोचर हो रही है वह मुझे दे दी जाय। अपने वचनानुसार राजा ने वहा सारा क्षेत्र उसे दे दिया। माना जाता है कि कुमौड़ का यह नाम महर कुरमौर के नाम पर ही पड़ा है। अन्य भाइयों में से चहज सिंह ने चेंसर का, जाखन सिंह ने जाखनी का तथा बिणसिंह ने बिण का क्षेत्र मांग लिया था। अतः इस क्षेत्रों के नामों का आधार भी यही व्यक्तिनाम माने जाते हैं।


    इस संदर्भ में एक अन्य जनश्रुति भी प्रचलित है जिसके अनुसार एक बार जब ये महरबन्धु इन्द्रजात्रा के उत्सव के अवसर पर नेपाल गये हुए थे तो वहां पर उस समय बलि के लिए नियत भैंसे के सम्बन्ध में जो एक कठिन समस्या उपस्थित हो गयी थी वह यह है कि उस भैंसे के सींग पीछे गर्दन तक लम्बे होने के कारण उसकी गर्दन को खुखरी के एक आघात से काटना असम्भव होने के कारण लोग असमंजस में थे। राजा स्वयं बड़े पशोपेश में था क्योंकि राजा के द्वारा ही इसे काटा जाना था। राजा को इस असमंजस की स्थिति में देखकर महर बन्धुओं ने कहा यदि उन्हें अनुमति दी जाय तो वे इसे एक झटके में ही काट सकते हैं। इस पर राजा की अनुमति मिलने एक महर भाई ने भैंसे के समक्ष एक ऊंचे स्थान पर चढ़ कर उसे हरी धास का एक मुट्ठा दिखाया उसे खाने के लिए उसने ज्यों ही गर्दन ऊपर को उठाई त्यों ही एक भाई ने नीचे से पूरे जोर के साथ खुखरी से आघात करके उसकी गर्दन को उड़ा दिया। प्रसन्न होकर जब राजा ने उनसे पुरस्कार मांगने को कहा तो उन्होंने कहा कि हमें अपने क्षेत्र में इस उत्सव को मानाने की स्वीकृति के साथ इसमें प्रयुक्त किये जोने वाले मुखौटे भी प्रदान किये जांय। राजा ने खुश होकर उनके अनुरोध को स्वीकार कर लिया। वे उन मुखोटों को लेकर कुमौड़ में आये और वहां पर आठूं पर्व के अगले दिन उन्होंने इस उत्सव को मनाया। तब से यहाँ तथा आस-पास के क्षेत्रों में इसे इस अवसर पर मनाया जाने लगा।

    Leave A Comment ?