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    घुघुतिया - उत्तरायणी | मकर संक्रांति

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    उत्तराखण्ड अंचल में प्रायः मकर संक्रांति उत्तरायणी के रूप में मनायी जाती है। वहीं पहाड़ो में इसे घुघुतिया त्यौहार के रूप में भी मनाया जाता है। घुघुति पहाड़ो में पाया जाने वाला एक पक्षी (Bird- Dove or Spotted Dove) भी होता हैं। इस दिन हरिद्वार, बागेश्वर आदि संगम स्थलों पर बड़े-बड़े मेले भी आयोजित होते हैं। कुमाऊँ प्रांत में घुघुति त्यौहार खासा मानाया जाता है। घुघुतिया त्यौहार को मकर संक्रांति भी कहा जाता है क्योंकि माघ माह के पहले दिन सूर्य मकर रेखा से कर्क रेखा की तरफ यानि उत्तर दिशा को चला जाता है। यही कारण से मकर संक्रांति को उत्तरायणी भी कहा जाता है। सूर्य जब एक राशि से दूसरी राशि को संक्रमण करता है उसे संक्रांति कहते है। यह संस्कृत का शब्द है।


    असल में मकर संक्रांति और उत्तरेणी एक है और घुघुतिया इनसे पहले पौष के महीने के अंत में मनाया जाता है। हलाकि घुघुतिया कुमाऊँ के कुछ स्थानों में मकरसंक्रांति के दिन मनाया जाता है और कही पौष माह के अंतिम दिन मनाया जाता है इस लिए इसे पुसुड़ि भी कहा जाता है परंतु असल में घुघुतिया को पौष के अंतिम माह में मनाया जाना सही माना जाता है। उत्तरायणी से माघ के पहले तीन दिन तक ब्रत रखा जाता और विष्णु भगवान की पूजा करी जाती है। कुछ लोग पुरे माघ के महीने में तीन बार रात में, दिन में और साम को स्नान करके विष्णु भगवान का पूजन करते है। दिनभर निराहार रह के साम को खिचड़ी खाई जाती है और खिचड़ी दान में दी जाती है।


    कुमाऊँ प्रांत में घुघुतिया त्यौहार खासा मानाया जाता है। इसमें पहले दिन आटें में गुड़ या चीनि मिलाकर गूंदा जाता है, मिठे गूंदे हुए आटे की बत्तिया बना के उनके दोनों किनारो को एक साथ मोड़ के घुघुत बनाया जाता है साम को उनहें घी में तल के इनको एक माला में पिरोया जाता है, माला में संतरे व अन्य फल भी लगाये जाते है। घुघुत की माला को बच्चे उत्तरैणि की सुबह अपने गले में पहन लेते है और “काले कव्वा ! काले कव्वा !!” जोर-जोर पुकारते हुए कौवे को बुलाते है और उन्हे ये पकवान खिलाते है। बच्चे कौवो कों बुलाते समय इन पंक्तियों का भी उच्चारण करते है -


    काले कौवा काले घुघुति माला खाले
    लै कौवा पूरी में कै दे सुनक छूरी
    लै कौवा बौड़ में कै दे सुनौक घ्वड़


    घुघुतिया त्यौहार क्यों मनाया जाता है ? इस सम्बंध में अलग-अलग विचार सुन्ने को मिलते है। एक मत ये है कुमाऊँ में चंद राजा कल्याण चंद की कोई संतान नहीं थी। निःसंतान राजा व रानी इस बात के लिए हमेशा दुखी रहते। वहीं राजा का विश्वास पात्र मंत्री यहीं सोचता कि राजा का कोई उत्तरधिकारी न होने के कारण राज्य का आधिपत्य उसको मिल जाएगा।


    एक रोज राजा व रानी बागेश्वर के बागनाथ मंदिर गये वहाँ उन्होने भगवान शिव से संतान का सुख मांगा। भगवान शिव के आर्शिवाद से कुछ समय बाद राजा के घर बालक के रूप में संतान हुई। राजा-रानी उसे बड़े लाड़ प्यार से पालते थे। रानी प्यार से उसे घुघुति पुकारती थी। रानी ने उसे एक मोति की माला पहनायी हुई थी जो कि बालक को बहुत पसंद थी। वह उस मोति की माला को अपने से कभी अलग नहीं होने देता था।


    बालक जब भी कोई हठ करता या रानी की बात नहीं मानता तो रानी उसे डराने हेतु कहती कि अगर वो कहना नहीं मानेगा तो उसकी माला बाहर कौवो को दे देगी। डराने हेतु रानी कौवो को पुकारती कि - काले कौवा काले घुघुति माला खाले। रानी कुछ खाना बाहर रखे रहती जिससे एक कौवा अक्सर उनके आंगन में आया करते थें। राजकुमार भी कौवे के लिए खाना रखता जिससे उस कौवे से उसकी दोस्ती हो गई।


    एक रोज सत्ता लालच में राजा के उसी मंत्री ने मौका पाकर राजकुमार घुघुति को मारने के मकसद से अपहरण कर सुनसान जंगल की तरफ ले गया। मंत्री का यह कृत्य देखकर कौवा उस मंत्री के पीछे-पीछे उड़ने लगा। कौवे ने अपनी आवाज से बाकी कौवों को भी एकत्र कर लिया। राजकुमार घुघुति के अपने छुड़ाने के प्रयास व मंत्री के जोर जबरदस्ती के बीच राजकुमार के गले की माला टूट कर जमीन पर गिर गई। कौवे ने मौका पाकर माला उठाई और राजमहल ले गया। बाकि कौवों ने मंत्री पर चोंच मारकर आक्रमण कर दिया जिससे मंत्री को वहाँ से भागना पड़ा। उधर मित्र कौवे ने राजमहल में जोर-जोर से अपनी काव काव से लोगो का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया और जंगल की तरफ को उड़कर फिर वापस आकर इशारा करने लगा। राजा रानी सहित सेना और लोग उस कौवे का अनुसरण करते करते जंगल की तरफ भागते-भागते गये। कौवा उन्हे उसी जगह ले गया जहाँ वह राजकुमार घुघुति था। राजकुमार को पाकर राजा रानी की खुशी का ठिकाना न रहा। कहा जाता है फिर घर आकर रानी ने बहुत सारे पकवान बनाए और घुघुति से कहा कि ये पकवान कौवों को खिलाए। यह भी माना गया कि धीरे-धीरे यह बात पूरे कुमाऊँ में फैल गई और राजा के आदेश पर इस दिन यह त्यौहार मनाना जाने लगा जिसमें कौवों को बुलाकर पकवान खिलाए जाने लगे।


    एक दुसरा मत यह है कि बहुत पहले यहा कोई घुघुति नाम का राजा था। उसकी मृत्यु उत्तरायणी के दिन कौवो के द्वारा बताई गई थी। उत्तरायणी के दिन उसकी मृत्यु टालने के लिए ये उपाय किया गया कि उत्तरायणी के दिन सुबह से ही कौवों को धुधुत, पूरी आदि खिलाते हुए उलझाये रखना है। ऐसा करा गया और इस प्रकार राजा की मृत्यु टल गयी। क्योकि उत्तरायणी की सुबह पकवान बनाने में देर न हो इसलिए रात को ही पकवान तैयार कर के कौवो के लिए माला बना पिरो के रखने की परंपरा चल पड़ि।


    उत्तरायणी के दिन काले कौवा मनाने का एक कारण यह भी है कि कौवा विष्णु भगवान को अनन्य भक्त माना जाता है। उत्तरायणी की रात को स्नान करके विष्णुपूजन किया जाता है। सयाने लोग विष्णुपूजन में व्यस्त रहते है, जबकि बच्चे विषणु भक्त कौवे को प्रसन्न करते है क्योकि मकर संक्रांति का अधिपति शनि होता है और शनि काले वर्ण का होता है इसलिये काले वर्ण के पक्षी कौवे का आह्वाहन किया जाता है।


    घुघुती के साथ-साथ कुमाऊँ में उत्तरायणी पर्व को बहुत बड़ा पर्व माना जाता है ये पर्व माघ स्नान का श्री गणेश है क्योंकि माघ माह को सभी महीनों में सर्वश्रेष्ट माना जाता है। जो लोग पूरे माह स्नान करने में असमर्थ रहते है वो लोग माघ माह के पहले तीन दिन जरूर स्नान करते है। माघ माह में तीन दिन स्नान करके उतना पूण्य प्राप्त होता है जितना पुष्कर, गंगा, प्रयाग व अन्य तीर्थ स्थलों में 10 वर्ष स्नान करके मिलता है। पुरे माघ माह में सबसे ज्यादा महत्व स्नान का है जो सूर्य के मकर राशि के तरफ संक्रमण करते वक्त सूर्योदय से पहले किया जाता है। इस समय का स्नान सब प्रकार के पापों को नष्ट करने वाला है। कुमाऊँ में मकर संक्रांति या उत्तरायणी पर्व पर बागेश्वर सरयू में स्नान उतना महत्वपूर्ण है जितना प्रयाग की त्रिवेणी में स्नान करना।
    बागेश्वर के उत्तरयणी मेला का धार्मिक महत्व के साथ-साथ राजनैतिक महत्व भी रहा है। इस पर्व पर 1921 ई० में कुमाऊँ केसरी पं० बद्रीदत्त पांडे और उनके साथी नेताओं ने कुली बेगार प्रथा के विरुद्ध आवाज उठाई थी। इन लोगों ने कुली बेगार से जुड़े दस्तावेज व रजिस्टर सरयू नदी में बहा दिए थे।

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