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    गंगा दशहरा - द्वार-पत्र

    गंगा दशहरा एक राष्ट्रव्यापी पर्व हैं। यह ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को मनाया जाता है। तीर्थस्थलीय पर्वोत्सवों में गंगादशहरा का पर्व विशेषरूप से उल्लेखनीय है। ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को मनाये जाने वाले इस पर्व के सम्बन्ध में माना जाता है कि इसी दिन पतित पावनी गंगा को स्वर्ग से भूलोक पर अवतरण हुआ था। स्कन्दपुराण में इस तिथि का महत्त्व बड़े विस्तार के साथ दिया गया है। इसे महान् पुण्यदायक माना गया है। कहा गया है कि इस दिन विशेषत: गंगा में अथवा किसी भी पुण्यसलिला सरिता में स्नान, दान व तर्पण करने से पापों का नाश होता है और व्यक्ति सभी पापों से मुक्त होकर विष्णु-लोक का अधिकारी बन जाता है-

    ज्येष्ठस्थ, शुक्ला दशमी संवत्सरमुखा स्मृता।
    तस्यां स्नानं प्रकुर्वीत दानं चैव विशेषतः।
    यां काञ्चित् सरितं प्राप्य प्रदद्याच्च तिलोदकम्।
    मुच्यते दशभिः पापैः विष्णुलोकं स गच्छति।।


    कुमाऊं में इसे गंगादशहरा न कह कर केवल 'दशहरा' कहा जाता है। यद्यपि इसे एक पुण्य पर्व समझ कर पवित्र मानी जाने वाली नदियों एवं सरोवरों में स्नान तो किया जाता है पर लोग इससे सम्बद्ध गंगावतरण की कथा से परिचित नहीं होते और न इसे 'गंगावतरण' के दिन के रूप में जानते हैं। उनके लिए तो 'दशहरे' का अर्थ पुरोहितों द्वारा निर्मित वह 'द्वारपत्र' है जो कि वज़ निवारक मंत्रों के साथ दरवाजों के ऊपर लगाया जाता है।


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    ब्राह्मण लोग एक वर्गाकार सफेद कागज में विभिन्न रंगों का अन्दर शिव, गणेश, दुर्गा, सरस्वती, गंगा आदि का रंगीन चित्र बना कर उसके चारों ओर एक वृतीय या बहुवृत्तीय कमलदलों का अंकन किया जाता है जिसमें लाल, पीले, हरे रंग भरे जाते हैं और इसके बाहर वज्रनिवारक पांच ऋषियों के नाम के साथ निम्नलिखित श्लोक लिखे जाते हैं -


    अगस्त्यश्च पुलस्त्यश्च वैशम्पायन एव च। जैमिनिश्च सुमन्तुश्च पञ्चैते वज्र वारकाः।।1।।
    मुने कल्याण मित्रस्य जैमिनेश्चानु कीर्तनात। विद्युदग्निभयंनास्ति लिखिते च गृहोदरे।।2।।
    यत्रानुपायी भगवान् हृदयास्ते हरिरीश्वरः। भंगो भवति वज्रस्य तत्र शूलस्य का कथा।।3।।


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    ब्राह्मणा द्वारा यजमानों के घर जाकर दरवाजे के ऊपर चिपका जाते हैं। इस अवसर पर ब्राह्मणों को चावल, अन्न और दक्षिणा भी दी जाती है। इस दशहरा द्वार-पत्र लगाने के पीछे प्राचीन समय से यह किवन्दती चली आ रही है कि इससे भवन पर वज्रपात, बिजली आदि प्राकृतिक प्रकोपों का विनाशकारी प्रभाव नहीं पड़ता है। वैसे वर्षाकाल में, जबकि पर्वतीय क्षेत्रों में बज्रपात की अनेक घटनाएं होती हैं इस प्रकार के बज्रनिवारक टोटके का आयोजन साभिप्राय तथा यहां की सांस्कृतिक परम्परा का महत्त्वपूर्ण अंग माना जा सकता है। इस रूप में इस पर्व का आयोजन कुमाऊं के अतिरिक्त अन्यत्र कहीं नहीं किया जाता है।


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    लगभग 85 से 90 वर्ष पहले गंगादशहरा (द्वार पत्र) बनाने की विधि इस प्रकार थी एक साफ सुथरे पत्थर (स्लेट) में चित्र (उल्टी आकृति) बनाकर मन्त्र लिख कर मशीन में लगाया जाता था। फिर पत्थर के चित्र में खाली जगह पर पानी लगाया जाता था। इसके बाद चित्र पर काली स्याही लगाई जाती थी। इसके बाद पत्थर की स्लेट पर कागज रखा जाता था। ऊपर भारी चीज से दबाव दिया जाता था। जिससे पत्थर में बने चित्र कागज में छप जाते थे। सफेद कागज में चित्र छप कर उसमें रंग भरे जाते थे।

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