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    जागर - दिव्य शक्तियों की जागृति

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    उत्तराखंड में भी ग्वेल, गंगनाथ, हरू, सैम, भोलानाथ, कलविष्ट आदि देवता लोक विश्वास में ही अवतरित हुए और स्थान-स्थान पर प्रतिष्ठत भी हुए। सुदूर अतीत में ये मनुष्य के रूप में ही थे। इन सभी लोक देवताओं के साथ कोई न कोई दन्त कथा जुड़ी हुई है, जो इनकी असामान्त शक्तियों या अलौकिक गुणों का समर्थन करती है। इन सभी देवी देवताओं की गाथा जब एक धार्मिक कृत्य से रूप में सामने आती है, तो उसे ‘जागर’ कहा जाता है। ‘जागर’ का शाब्दिक अर्थ जगाने से है, जब देव-आख्यानों द्वारा किसी व्यक्ति विशेष पर स्थानीय ईश्वरीय बोल बोलता है। ‘जागर’ गान में महाकाव्य जैसी देवी-देवताओं की गाथाएँ गायी जाती हैं, जो हुड़किया बौल के संगीत और ध्वनि से भिन्न होती हैं। जागर का गान उस व्यक्ति के घर पर किया जाता है, जो किसी विशिष्ट देवी-देवताओं की पूजा के निमित्त ‘जागर’ करवा रहा हो।


    जागर गान का मुख्य पात्र ‘जागरिया’ होता है। ‘जगरिये’ का कार्य, पूजे जाने वाले देवता की कथाओं को लोकाख्यानों द्वारा प्रस्तुत करना होता है। ‘जगरिया’ कथा गायन ढोलक अथवा हुड़का आदि वाद्यों के सहयोग से करता है। ‘जगरिया’ मात्र गायक ही नहीं वरन् देवता द्वारा भी उसे गुरू के प्रतिष्ठित पद पर माना जाता है। चूँकि ‘जगरिया’ ही व्यक्ति विशेष के शरीर में देवता का आहवान करता है। अतः वह गुरू कहलाता है। वस्तुतः ‘जगरिया’ गुरू गोरखनाथ के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता है। ‘जगरिया’ ही जागर का विशेषज्ञ माना जाता है। ‘जागरिया’ जागर गार के मध्य कहीं-कहीं पर अपने क्षणिक विश्राम के लिये दो या इससे अधिक सहायकों को रखता है, जो उसके शब्द और वाक्यों को बीच-बीच में दोहराते हैं। जगरिया अपने इन सहायकों के माध्यम से काँसे की थाली को दो छोटी लकड़ी की डंडियों की सहायता से लय देने का कार्य भी लेता है। ये सहायक ‘भग्यार’ नाम से जाने जाते हैं।


    ‘जागर’ में जिन देवी-देवताओं को आमन्त्रित किया जाता होता है, वे देवता जिन व्यक्यिं के शरीर में आते हैं, उन्हें ‘डँगरिया’ कहा जाता है। ‘डंगरिया’ जागर का केन्द्रीय पात्र होता है। ‘डँगरिया’ स्त्री या पुरूष में से कोई भी हो सकता है। जिस स्त्री-पुरूष पर देवी-देवता का आवेश पहले पहल होता है, उसे ‘नौताड़’ (नव+अवतार) कहा जाता है। ‘जागर’ के आरम्भ में ‘डँगरिए’ को उनके आसन ‘दुलैंच’ पर बैठने को कहा जाता है। उनके द्वारा स्थान ग्रहण कर लेने के पश्चात् उन्हें तिलक कर आरती उतारी जाती है। इन ‘डंगरियों’ के सम्मुख धूनी प्रज्वलित कर, रखी जाती है तथा सम्पूर्ण ‘जागर’ स्थल झाड़ पोंछ कर शुद्ध किया जाता है। ‘जागरिया’ एवं भगयारों के बैठने का स्थान ‘डंगरियों’ से अलग किन्तु निकट ही होता है। परिवार का मुखिया ‘डंगरियों’ के ठीक सामने बैठता है। परिवार के अन्य सदस्य तथा अन्य भक्तगण मुखिया के ठीक पीछे बैठते हैं।


    ‘जागर’ का प्रारम्भ ‘जागरिया’ द्वारा पंच नाम देवों की स्तुति कर उनके आह्वान से की जाती है। सायंकालीन जागरों में इसके पश्चात् संध्यावली के गायन के साथ ही महाभारत का कोई आख्यान प्रस्तुत किया जात है। तदुपरान्त जिन-जिन देवताओं को आमन्त्रित करना है, उनकी गाथा का गायन जगरिया द्वारा वाद्यों के संगीत के साथ प्रस्तुत करना आरम्भ होता है। गाथा में उनके आविर्भाव जीवन की प्रमुख घटनाओं का समावेश रहता है। ‘जगरिए’ के गायन स्वरों एवं वाद्यों की तेज होती लय के बीच ‘डंगरिये’ धीमे-धीमे झूमने लगते हैं, उसके शरीर में धीमी कम्पन उठती दिखाई देती है। इस बीच जगरिए का स्वर और वाद्यों की गति और तीव्र हो जाती है और इसी क्षण ‘डंगरिये’ के शरीर में देव-शक्ति प्रकट हो जाती है। यही क्रम अगले ‘डंगरिए’ के लिए होता है। देखते ही देखते सभी आमन्त्रित स्थानीय देवी-देवता ‘डंगरियों’ के शरीर में प्रकट होते दिखाई देते हैं। इस बीच प्रकट हुए देवी-देवता एक दूसरे का नमन् करते हैं।


    ‘जगरिया’ द्वारा इन देवी-देवताओं पर गंगाजल छिड़क कर पुनः तिलक कर आरती उतारी जाती है। जागर स्थल पर उपस्थित समस्त नर-नारी श्रद्धा से ‘डँगरियों’ को नमन् करते हैं। ‘डँगरिए’ के शरीर की कम्पन बढ़ती जाती है और वह पहले अपने आसन पर नाचते हैं, फिर धूनी की परिक्रम कर अपने आसन पर विराजमान हो जाते हैं। ‘डंगरिए’ द्वारा अपने गुरू ‘जगरिए’ को नमन् किया जाता है। इस बीच अवतरित देवता के आवेश और तेज करने के लिए जगरिए द्वारा देव-गाथा के अंशों को ‘औसांण’ के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। ‘डँगरये’ के शरीर में अवतार लिए देवता द्वारा अपने आसन के समीप थाली में रखे चावल के दानों को हाथ में लेकर उन्हें पुनः थाली में अथवा हाथ में लेकर खोला जाता है जिसे ‘दाणि देखण’ कहते हैं। ‘डँगरिया’ इन्हीं चावल से खेलकर वर्तमान, भूत एवं भविष्य की बातों का बखान अपनी देव वाणी से करता है। डँगरिया इन चावल के दानों को, धूनी से बभूत मिलाकर नौताड़ देवता की ओर फैंकता है। इसे ‘तुक्क मारण’ कहते हैं। इसके प्रभाव से वह व्यक्ति भी खुलकर नाचने लगता हैं। इस बीच डँगरिया एवं जगरिया दोनों उस नव-अवतार हुए देवता से अवतरित हुए देवता का नाम पूछा जाता है। तदुपरान्त विधिवत नौताड़ देवता की पूजा की जाती है।


    देवता ‘डंगरिया’ से प्रश्न पूछने का कार्य उस परिवार विशेष के मुखिया द्वारा किया जाता है, जिसके घर पर ‘जागर’ का आयोजन हो रहा हो। उपस्थित बाहरी व्यक्तियों में से भी कई अपना प्रश्न ‘डंगरिये’ के समक्ष रख् सकता है उन सभी की शंकाओं का निवारण ‘डंगरिया’ द्वारा बताया जाता है। देवता ‘डँगरिया’ रोग-शोक निवारण कष्ट मुक्ति आदि के लिए ‘दाणी खिलाकर’ उस समस्या का विस्तार से वर्णन करता है। उसके निदान के लिए रास्ता सुझाता है।


    जागर-गान के अंतिम क्षणों में अवरित समस्त देवता लोगों को अशीष देते हैं, तत्पश्चात गुरू डँगरियों से कैलाश पर्वत की ओर प्रस्थान करने को कहता है। जगरिया द्वारा पुनः देव-गाथा के अंश गाये जाते हैं। ‘डँगरिये’ के शरीर में एक बार पुनः कम्पन तीव्र हो जाती है और किसी क्षण एकाएक कम्पन रूक जाती है। यही वह क्षण होता है जब डँगरिये के शरीर में आए हुए देवता अदृश्य हो जाते हैं और डँगरिये पुनः सामान्य की स्थिति में आ जाता है।


    ‘जागर के लिए चैत्र, श्रावण, मार्गशीर्ष पवित्र महीने माने जाते हैं। ये जागर एक, तीन, पाँच रात्रि तक चलते हैं, किन्तु सामूहिक रूप से ईष्टदेव की अर्चना के लिए ‘जागर’ बाइस दिन तक चलता है, जिसे बाईसी या बैसी कहा जाता है। कुमाऊँ में प्रचलित देवताओं के जागर गाथाओं में हरू, सैम, ग्वेल, भूमिया, ऐड़ी तथा महाभारत के जागर प्रचलित हैं। यहाँ के जागरों की तीन श्रेणियाँ हैं, जिनमें देवी-देवताओं सम्बन्धी जागर, कुमाउँनी राजाओं के जागर तथा वीर योद्यओं तथा शक्तिशाली अनुचरों की गाथा के जागर सम्मिलित हैं। यहाँ विभिन्न अंचलों में जागर भी भिन्न-भिन्न हैं, काली कुमाऊँ अर्थात लोहाघाट-चम्पावत में, महाभारत, चंदवंशीय राजाओं, ग्वाल देवता, हरू सैम के जागर, उत्तरी कुमाऊँ (जोहार-अस्कोट) में बालचन, कालूसाई, भूसी, नौलू आदि का जागर, सालम पट्टी में नागनाथ, रीठागाड़ में डंगरिरौल, लखनपुर में कलविष्ट का जागर लगाने की परम्परा है।


    कुमाऊँ के सुदूर क्षेत्रों में आज भी जनमानस की आस्था ‘जागर को एक पुनीत धार्मिक कृत्य मानती है। हम यह नहीं कह सकते हैं कि यह सब कुछ अंधविश्वास है, क्योंकि कष्टों के क्षणों में इन्ही लोक देवी-देवताओं के जागर लगाने से कष्टों का हरण होता दिखाई देता है। यहीं नहीं ऐसे बहुत से प्रकरण सुनने को मिलते हैं, जब किसी व्यक्ति द्वारा इन लोक देवी-देवताओं अथवा जागर जैसे पवित्र अनुष्ठान की निन्दा करने पर उसे भयंकर कष्टों का सामना करना पड़ता है, जिससे मुक्ति भी उसके द्वारा की गयी क्षमा याचना के पश्चात मिली है।


    लोक आस्था में पल रहे ‘जागर’ के प्रति हम यही कह सकते हैं कि हमारा विश्वास अपने लोक देवी-देवताओं पर अटूट हैं, इनकी अलौकिक शक्तियों को इनकी कृपादृष्ति को अनदेखा नहीं किया जा सकता है, यही कारण है कि आज भी अंचल के भिन्न-भिन्न स्थलों पर लोक देवी-देवताओं के मंदिर स्थापित हैं और पूजे जाते हैं। यही वह दरबार है जहाँ की गई पुकार कभी व्यर्थ नहीं जाती इसीलिए लोक मानस का विश्वास अपने स्थानीय देवी-देवताओं पर बना है और बना रहेगा। साथ ही ‘जागर’ जैसा धार्मिक कार्य सदैव किया जाता रहेगा।



    लेखक -डॉ० ललित मोहन जोशी
    भोला भवन, चैंपनोला, अल्मोड़ा
    संदर्भ - स्मारिका, कुमाऊँ महोत्सव - 2000

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