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    भोटिया जनजाति

    उत्तराखण्ड़ के उत्तरी भूभाग 29.49° से 31.27° उत्तरी अक्षांश से 81.30° पूर्वी देशान्तर के मध्य स्थित लगभग 5000 वर्गमील का क्षेत्र भोटिया संस्कृति की रंगस्थली है। इस भोटान्तिक प्रदेष के अन्तर्गत कुमायुँ मण्डल में पिथौरागढ़ जिले का जोहार परगना तथा गढ़वाल मण्डल का चमोली जनपद का तल्ला-मल्ला हिमखण्ड पट्टियाँ, नैनीताल, अल्मोड़ा एवं उत्तरकाषी जनपद का उत्तरी सीमान्त क्षेत्र का भटवाड़ी का कुछ भूभाग आता है। इनकी जनसंख्या 38,311 है।


    भोटिया शब्द की व्युत्पत्ति ‘भोट’ या ‘बोद’ शब्द से मानी जाती है। ‘भोट’ का तात्पर्य तिब्बत से है। तिब्बत के लिए भोट पर्याय का प्रयोग मिलता है। तिब्बत के सीमान्त क्षेत्र को भोटान्त कहा जाता है। उसके निवासियों के लिए भोटान्तिक, भोटा, भोट, भोटिया, भोटानी, शौका आदि नाम से सम्बोधित किये जाते हैं। राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है कि "यहाँ से निवासियों की भाषा पर तिब्बतियों का प्रभाव पड़ा और मुखों पर मंगोल मुद्रा की छाप शताब्दियों में चिरस्थायी रूप से पड़ी है। इसीलिए अधिकांश लेखक और जनसाधारण शौका क्षेत्र को भोटू प्रदेश और शौकों को भोटिया कहा करते हैं। वास्तव में भोत एक राज्य सत्ता थी, एक छोटा प्रदेश नहीं। तिब्बत राज्य का नाम भोत है। अंग्रेज लेखकों ने भी भोत को Bhot लिखा बाद में चलकर यह भोट हो गया। अल्मोड़ा में रहने वाले अल्मोड़िया की तरह भोट से भोटिया बना दिया। अलग-अलग नदी घाटियों में रहने के कारण अलग-अलग नामों से जाना जाता है।"


    उत्तराखंड के जटिल हिमालय पर्वत में पिथौरागढ़ में व्यास-चैदांस, दरमा, मुन्सियारी घाटी, चमोली में तल्ला-मल्ला हिमखण्ड पट्टियों एवं उत्तरकाशी जनपद में भटवाड़ी तहसील में एक पतली पेटी में भोटिया जनजाति आवासित है। इसे अलावा बागेश्वर तथा अल्मोड़ा जनपदों की नदी-घाटियों में भी ये लोग निवास कर रहे हैं। पिथौरागढ़ के उत्तरी भाग में, एक त्रिभुजाकार रूप में विस्तृत भू-भाग इनका मूल स्थान है जो भोटिक प्रदेश के रूप में जाना जाता है। जटिल पर्वतीय एवं नदी घाटी तंत्रों में आवासित होने के कारण तिब्बत के अतिरिक्त अन्य किसी से कालान्तर तक सम्पर्क नहीं हो पाया जिस कारण एक पृथक संस्कृति का स्वरूप यहाँ विकसित हुआ है। भारत के उत्तरी सीमान्त प्रदेश में होने, जलवायुविक, भूआकृतिक एवं यातायात की जटिलता के कारण दक्षिणी क्षेत्र की अपेक्षा उत्तरी भाग में तिब्बत से व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित हो गया था। 1962 ई. में भारत-चीन के युद्ध के कारण इनका व्यापारिक सम्बन्ध समाप्त हो गया। अर्थव्यवस्था का मूलाधार गमग्या व्यापार पद्धति की समाप्ति के पश्चात् ये लोग शिक्षा, नौकरी तथा कृषि कार्याेन्मुख हो गये जिस कारण इनकी मौलिक संस्कृति में आधुनिकता की झलक परिलक्षित होती है।


    भाषा एवं प्रजातीय लक्षण


    भाषायी मानव-वैज्ञानिकों ने भोटिया की भाषा को "तिब्बती वर्मी भाषा परिवार" के अन्तर्गत वर्गीकृत किया है। इनका सांस्कृतिक सम्पर्क पड़ोसी समुदायों से होने की वजह से ये हिन्दी, गढ़वाली, नेपाली आसानी से बोलते हैं। इनकी लिपि देवनागरी है। गियर्सन ने शौका की बोली को तिब्बती वर्मी उस उपरिवार की पश्चिमी सर्वनामीय हिमाचलवर्ती समूह में रखा है। राहुल सांकृत्यायन ने अपने जीवन के अन्तिम समय में शौका बोली को भारोपीय भाषा के अन्तर्गत स्वीकार किया था। अर्थात् तिब्बती वर्मी भाषा से सम्बद्ध माना है। प्रजातीय दृष्टि से भोटिया मंगोल प्रजाति के हैं। शारीरिक विशेषताओं यथा कद, नाक की बनावट, बाल खोपड़ी की लम्बाई-चैड़ाई आदि के आधार पर इनको अवश्य ही मंगोलायड प्रजाति में रखा जा सकता है। गुहा के वर्गीकरण से भी स्पष्ट है कि आँखों के भीतरी भागों में एक विशेष प्रकार के मोड़ (एपिकेन्थिक) छोटे कद, चपटी नाक, खड़े व मोटे बाल मंगोलायड की विशेषता है। इस आधार पर भी कुछ सीमा तक भोटिया की मंगोल प्रजाति के अन्तर्गत रखा जा सकता है। वास्तव में भोटिया गौरवर्ण, छोटी आँख, भूरे रंग की नाक चपटी व औसत लम्बाई लिए होती है। मजुमदार ने भी प्रजातीय उत्पत्ति के आधार पर इन्हें मंगोल प्रजाति से सम्बद्ध माना है।


    सामाजिक स्तरीकरण


    यद्यपि यह माना जाता है कि जनजातियों में संस्तरण नहीं पाये जाते हैं, किन्तु स्थानीय हिन्दुओं के सम्पर्क में आने के कारण इनमें भी जाति संस्तरण पाया जाने लगा है। सभी शौका एक ही जाति के हैं जिसे ‘रं’ शौका या हिन्दू राजपूत कहा जा सकता है। उत्तर काषी में भोटियों में यह संस्तरण स्पष्ट पाया गया है। ‘जाड’, ‘खम्पा’ एवं ‘कोली’ भोटान्तिक बौद्ध मतावलम्बी हैं तथा ‘नेत्वाल’ हिन्दू मतावलम्बी। स्थानीय हिन्दू सामाजिक संस्तरण में स्वर्ण भोटियों ने स्थानीय राजपूतों के नाम यथा-नेगी, भण्ड़ारी, बिष्ट, राणा आदि अपना लिए हैं। लामाओं को गुरुओं सा स्थान दिया जाने लगा है। लामा बौद्ध भोटियों के धार्मिक संस्कारों का सम्पादन कराते हैं। स्थानीय देवी-देवताओं के प्रति इनकी श्रद्धा एवं विश्वास बढ़ा है, अब स्थानीय पण्डितों से वे हिन्दू धार्मिक संस्कारों का सम्पादन भी कराने लगे हैं। कोली भोटिया को इनके समाज में ‘हरिजन’ माना जाता है तथा इनके साथ खानपान में रोक लगा हुआ है। ये अन्तर्विवाही समूह हैं। किन्तु ‘जाड’, ‘खम्पा’ एवं ‘नेत्वाली’ में सामान्यतः अन्तर्विवाह प्रचलित नहीं है।


    प्रत्येक भोटिया गाँव या दो तीन गाँवों में एक धर्माचार्य होता है जिसे बाकी या पुछेर कहा जाता है। समस्त धार्मिक क्रियायें इसी पर निर्भर होती हैं। इसके अलावा इस समाज में ओझा की भूमिका भी अत्यन्त महत्तवपूर्ण होती है जिसे डल्या ओल्या कहा जाता है। ये लोग नन्दा देवी, हिमशिखर, कठपुडिया देवी, मणि भद्र यक्ष, चान देवता, गंगा नदी, घंटाकर्ण देवता, सिध्वा-विध्वा देवता, नरसिंह देवता, नाग देवता, भम्याल या क्षेत्रपाल आदि की उपासना करते हैं। यह समाज हिन्दू धार्मिक परम्परा के बहुत निकट है। ये लोग अन्धविश्वासी होते हैं। भूत-प्रेत, आत्मा आदि पर विश्वास करतें हैं और इनसे भयभीत रहते हैं।


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