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    बुक्सा जनजाति

    बुक्सा (भोक्सा) उत्तराखण्ड़ की 5 अनुसूचित जनजातियों में से एक है। यह चार उत्तरी जिलों (तराई क्षेत्रों) देहरादून, नैनीताल, पौढ़ी गढ़वाल तथा बिजनौर की लघु बस्तियों के रूप में पाये जाते हैं। इनकी जनसंख्या 2001 के जनगणनानुसार 57225 थी। इनमें से 60 प्रतिशत बुक्सा नैनीताल के विभिन्न क्षेत्रों में निवास करते हैं। इनके आवासीय क्षेत्र को 'बुक्सार' कहा जाता है, जो कीलपुरी एवं रूद्रपुर परगना के नाम से जाना जाता है। प्रारम्भ में बुक्सा शारदा नदी के किनारे 'बनक्सा' नामक स्थान में जो कि कीलपुरी परगने में पड़ता है आकर बसे। बुक्सार में बसने के कारण इन्हें बुक्सा कहा जाने लगा।


    हिमालय की नदी घाटियों से लेकर भाबर एवं तराई क्षेत्रों में इनकी उपलब्धता इनकी सांस्कृतिक गतिविधियों में न्यूनाधिक भिन्नता उत्पन्न कर दिया है। इसी के आधार पर इनको तीन क्षेत्रीय वितरणों में विभाजित किया जा सकता है-


    1. पर्वतीय घाटी क्षेत्र- हिमालय के नदी घाटियों में अपरदन एवं निक्षेपात्मक क्रियाओं के फलस्वरूप उर्वर मिट्टी के जमाव से युक्त तथा निचले भाग में वन की पेटी से घिरे क्षेत्र इसके अन्तर्गत आते हैं। गंगा-यमुना की सहायक नदियाँ- आसन, सुसदा, स्वांग, त्रिवेणी आदि इस भू-भाग में प्रवाहित होती हैं।


    2. भाबर क्षेत्र- गंगा एवं रामगंगा नदियों के क्षेत्र जो इस जनजाति से युक्त है उसे भाबर क्षेत्र की संज्ञा दी जाती है जिसमें नदियों द्वारा काली या रेगर मिट्टी का जमाव किया गया है। प्राकृतिक संसाधनों एवं मानवीय सुविधाओं से युक्त इस जनजाति को इस क्षेत्र द्वारा असीम सुविधा प्रदान की गयी है।


    3. तराई क्षेत्र- लम्बी घाटी, झाडियों एवं दलदलों से युक्त हिमालय की बाह्य पेटी जो मैदान, के रूप में है वह तराई क्षेत्र कहलाता है। वर्षाधिक्य के कारण जल की सुविधा, उर्वर भूमि एवं यातायात के साधनों के कारण यह क्षेत्र पर्वतीय घाटी एवं भाबर से पूर्णतः भिन्न है।


    छोटा एवं मध्यम कद, चौड़ी मुखाकृति, समतल एवं चपटी नाक, श्याम वर्ण आदि प्रजातीय लक्षणों से ये अपनी पहिचान पृथक् सृजित किये हैं। इनके शारिरिक लक्षणों से यह तथ्य भी स्पष्ट होता है कि इनमें प्रजातीय मिश्रण वृहत् स्तर पर हुआ है। कुक, रिजले तथा मजूमदार ने इन्हें मंगोल प्रजाति से सम्बन्धित माना है परन्तु यदि इनके शारिरिक लक्षणों का सूक्ष्मता से निरीक्षण किया जाय तो स्पष्ट होता है कि इनके शारिरिक लक्षण मंगोलों के शारिरिक लक्षणों से साम्य नहीं रखते हैं। स्टीवर्ड ने इस प्रजाति को मंगोल एवं कृषक अनार्यां का सम्मिश्रण स्वीकार किया है।


    बुक्सा शब्द की व्युत्पत्ति के सम्बन्ध में विभिन्न लोगों ने भिन्न-भिन्न बातें कही हैं। अमीर हसन के अनुसार बुक्सार में ऐसे लोग थे जो भक्ष्या-भक्ष्य का ध्यान न रखकर सभी जानवरों का मांस खाते थे जिससे उन्हें 'भक्सी' कहा गया। यही भक्सी कालान्तर में भक्सा, भोक्सा तथा बुक्सा हुआ। बिजनौर के बुक्सों के सम्बन्ध में इन्होंने कहा है कि वे बकरी का व्यापार करते थे जिससे इन्हें बुक्सा कहा गया है। देहरादून के बुक्सां के सम्बन्ध में इन्होंने कहा कि ये एक प्रकार की वनस्पति की जड़ जिसे बुकरा कहते हैं का प्रयोग अपने भोजन में करते थे। कालान्तर में बुकरा लाने वाले को बुक्सा कहा जाने लगा। देहरादून के बुक्सों को 'महरा' कहा जाता है। हसन ने 'महरा' शब्द की व्युत्पत्ति फारसी के मेहराम या 'महरामकार' शब्द से माना जिसका अर्थ होता है जानकार व्यक्ति। बुक्शे जंगलों में रहते थे और भूले-भटकों को रास्ता बतलाते थे, इससे इन्हें महरा कहा जाने लगा।


    बुक्शे हिमालय की तराई में पूरब से पश्चिम की तरफ एक पट्टी में बसे हुए हैं। पूरब में नैनीताल जिले के बाजपुर विकास क्षेत्र से पश्चिम में देहरादून जिले के सहसपुर विकास क्षेत्र तक इनकी संख्या बिखरी हुई है। क्रुक (1896) के वर्गीकरण से स्पष्ट होता है कि जो शारदा एवं रामगंगा नदियों मध्य आते हैं, पूर्वी बुक्सा कहा जाता है तथा दूसरे भाग में पश्चिमी बुक्शे आते हैं जो रामगंगा और गंगा नदी के बीच में बसे हुए हैं तथा तीसरे भाग में देहरादून के महरा बुक्सा आते हैं जो यमुना एवं गंगा नदी के बीच में बसे हुए हैं।


    ऐतिहासिक एवं प्रजातीय स्थिति


    शुक्ला के अध्ययन से स्पष्ट है कि बुक्शे सम्वत् 302 में बुक्सार क्षेत्र में राजा जगदेव के साथ तराई में आये। राजा जगदेव का उनके सौतेले भाई राजा रणचौर से विवाद हो गया। रणचौर ने जगदेव को मारने का षड़यन्त्र रचा। वे देवी के पुजारी थे जिससे उन्हें षड़यंत्र का पता चल गया और वे अपने कुछ साथियों के साथ नैनीताल में स्थित शारदा नदी के किनारे 'बनक्सा' नामक स्थान पर भाग गये। जगदेव को बुक्शे राजा विक्रमादित्य का वंशज मानते हैं। कुछ बुक्शे राजा रणचौर एवं राजा गोपी चन्द्र के यवनों से लड़ाई में हार जाने के कारण वारा नगरी से भाग कर यहाँ आकर बस गये। राजा रणचौर की सन्तान थारू जनजाति है तथा राजा गोपी चन्द की सन्तान बुक्से हैं। ये लोग जब यहाँ आये तो इनकी लड़ाई यहाँ के प्राचीन निवासी मांझी से हुई और मांझी परास्त हुए तथा इनकी आधीनता स्वीकार की। यही कारण है कि आज भी बुक्सों में मांझी गोत्र के अधिकांश परिवार हैं। शारीरिक लक्षणों से प्रतीत होता है कि इनमें प्रजातीय मिश्रण विद्यमान है। मजूमदार एवं हसन ने इन्हें मंगोल प्रजाति का माना है। परन्तु देखने में ये मंगोल प्रजाति एवं द्रविण का मिश्रण लगते हैं क्योंकि ये अन्य पहाड़ियों के समान नहीं हैं। मंगोल के होठ मोटे न होकर पतले होते हैं किन्तु इनके होंठ मोटे हैं एवं बाल घुघराले मिलते हैं। अधिकांश का रंग साँवला है, इनकी लम्बाई भी अपेक्षाकृत मंगोल प्रजाति के लोगों से अधिक है। अतः इन्हें किसी एक प्रजाति का मानना उचित नहीं प्रतीत होता।


    बुक्सा जनजाति की भाषा हिन्दी एवं कुमायूँनी का मिश्रण है। किन्तु लिखने की भाषा में ये देवनागरी लिपि का ही प्रयोग करते हैं।

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