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    देवस्थल महादेव - हवालबाग, अल्मोड़ा

    भारत के इतिहास में धार्मिक दृष्टि से उत्तराखण्ड का महत्वपूर्ण स्थान है। हिमालय के मनोरम दृश्य औी इसकी मन्त्र मुग्ध करने वाली प्राकृतिक छटा समूचे विश्व के पयर्टकों को अपनी ओर आकर्षित करती है। देव भूमि उत्तराखण्ड में विद्यमान विश्व विख्यात चार धामों के अलावा सैकड़ों मठ, मन्दिर और शक्ति पीठ श्रद्धालुओं की तमाम मनोकामनाएँ पूर्ण करने वाले हैं। पुरुषोत्तम भगवान श्री राम, रावण बध के बाद ब्रह्म हत्या के, पाप से मुक्त होने के लिये गुरू वशिष्ट की आज्ञा से उत्तराखण्ड की यात्रा पर आये थे। यहाँ के प्राकृतिक सौन्दर्य ने इस भू-प्रदेश को अलौकिक, आध्यात्मिक शान्ति प्रदान की है। उत्तराखण्ड की देव भूमि कही जाने वाली कुमाऊँ की पहाड़ी वादियां प्राचीनकाल से ही अनेक ऋषि-मुनियों व सन्त महात्माओं की तपो स्थली रही हैं। भौगोलिक दृष्टि से हिमालय का यह पर्वतीय भाग कठोर पाषाण खण्ड़ों और कन्दराओं से शोभायमान है। इन्हीं कन्दराओं में धर्मरक्षार्थ अनेक सन्त महात्माओं का प्रादुर्भाव हुआ। इन सन्त महात्माओं के चरण जहाँ भी पड़े, वह स्थान कालान्तर में मन्दिरों व तीर्थ स्थानों में परिवर्तित हो गये।


    इन्हीं धार्मिक स्थानों में देवस्थल महादेव मन्दिर महत गांव (हवालबाग) का विशेष महत्वपूर्ण स्थान है। यह मन्दिर अल्मोड़ा से कौसानी जाने वाले मोटर मार्ग पर अल्मोड़ा से 15 किमी. दूर कौशल्या (कोसी) नदी के तट पर स्थित है। स्थानीय मान्यता के अनुसार यह मन्दिर आज से लगभग दो हजार वर्ष पुराना है।


    शिव पुराण में भी उक्त मन्दिर का उल्लेख मिलता है। कसार देवी की तलहटी पर कोसी नदी की सुरम्य घाटी में स्थित यह मन्दिर जनता की श्रद्धा का प्रमुख केन्द्र है। यहाँ आ कर अद्भुत आध्यात्मिक शांन्ति मिलती है। मोटर मार्ग के निकट होने के कारण पयर्टकों व श्रद्धालुओं का यहाँ मेला लगा रहता है। जिसमें देशी-विदेशी सभी प्रकार के पर्यटक शामिल हैं। मन्दिर की व्यवस्था व अनुशासन अद्वतीय है।


    अनेक शुभ अवसरों पर यहाँ संगीत, धार्मिक कार्य, भजन-कीर्तन, बैठी होली, पुराण कथा, सतसंग आदि के आयोजन यदा-कदा होते रहते हैं जिसमें स्थानीय जनता बड़-चड़ के भाग लेती है। क्षेत्र के लोगों की मन्दिर के प्रति पूर्ण श्रद्धा व अटूट निष्ठा है। वे तन-मन-धन से मन्दिर के हर धार्मिक अनुष्ठान में भाग लेते हैं। मन्दिर के चारों ओर स्थित गावों की जनता यहाँ नियमित रूप से पूजा पाठ हेतु आते रहते हैं जिनमें पाखुड़ा, ज्योली, ज्योशाड़ा, हवालबाग, धनेली, उदेली, मैणी, पछगांव, मनाऊ, कुलाऊँ, स्यूरा, शैलाखान, पैस्यारी, उछकुना, नारकोटा, कनालबुंगा, गुणकाड़े, इटोला, मेहल, पिलखा, आदि गांव प्रमुख हैं।


    इस मन्दिर के निकट ही कोसी नदी में नारद कुण्ड स्थित है। कहा जाता है कि इस कुण्ड का निर्माण देवर्षि नारद द्वारा माता पार्वती के स्नानार्थ किया गया। कुण्ड की तलहटी में प्राकृतिक रूप से निर्मित देवी मन्दिर व मूर्ति स्थित है। किवदन्ती के अनुसार एक व्यक्ति एक बार कुण्ड में डूब गया और 6 महीने बाद बाहर आया। देवी ने उससे कहा था कि अगर वह इस राज को किसी को बतलाऐगा तो उसकी तत्काल मृत्यु हो जायेगी। परन्तु उस व्यक्ति ने इस रहस्य को जब अपनी पत्नि को बतलाया तो उसकी तत्काल मृत्यु हो गयी। इस प्रकार यह प्राचीन व प्रतिष्ठित शिव मन्दिर से सम्बन्धित रोचक घटनाऐं प्रचलित हैं जिससे इसकी महत्ता प्रकट होती है। यही एक मात्र ऐसा शिव मन्दिर है जहाँ शमशान घाट नहीं है अन्यथा प्रत्येक शिव मन्दिर के समीप शमशान घाट अवश्य होता है क्योंकि शमशान घाट में ही शिव का निवास स्थान माना गया है। इसी लिऐ उन्हें भूत नाथ कहा जाता है। प्रत्येक शिव रात्रि को यहाँ विशाल मेला लगता है। शिव रात्रि की पूर्व सन्ध्या पर यहाँ रात भर भजन होते है। तथा बैठकी होली का भी आयोजन किया जाता है। जिसमें स्थानीय व बाहर से आये मेहमान कलाकार अपनी गायकी से श्रोताओं को मन्त्र मुग्ध कर देते हैं। मेले में अनेक आकर्षक दुकानें सजी होती हैं। जहाँ से स्थानीय जनता अपनी दैनिक आवश्यकताओं की खरीदारी कते हैं।


    भोले नाथ को समर्पित यह मेला स्थानीय जनता की अटूट श्रद्धा का प्रमुख केन्द्र रहता है। मेले में अपार भीड़ रहती है। रगं बिरंगे पारम्परिक परिधान में महिलाऐं व बच्चे बरबस मन अपनी ओर आकर्षित कर लेते है।


    त्रिलोकाधिपति बाबा भोले नाथ अकारण करुणा जल की एक बूंद मात्र से ही प्रसन्न हो जाते हैं। शंकर तो अपने भक्तों के वशीभूत हैं। फागुन माह कृष्ण पक्ष चतुर्दशी महाशिवरात्रि और शिवलिंग का प्रकाट्य दिवस भी है। शिव भक्त इस दिन रात्रि में पूजा कर भगवान को प्रसन्न कर आर्शीवाद प्राप्त करते हैं। शंकर जितने सरल हैं उतने ही रहस्य से भी परिपूर्ण है। त्रिनेत्री शिव जब तब ताण्डव में मग्न हो जाते हैं। उन्हें पाना सबसे आसान है। भगवान शंकर हम सब को यही प्रेरणा देते हैं कि संसार में पदार्थों के बीच अवश्य रहे परन्तु पदार्थ आपको बांधने में शक्त न हो। जो मिले उससे सन्तुष्ट रहें। अधिक मिले तो उसके बांटते रहें। शास्त्रों में कहा गया हैं किः-


    आत्मानं रथिनं सिद्धि शरीरं रथमेव तु।
    बुद्धिं तुसारथि विधि येन श्रयोऽहमाप्नयीम।।


    अर्थात आत्मा को रथी समझो, शरीर को रथ और बुद्धि को सारथी मानो। इनके सन्तुलित व्यवहार से ही श्रेय अर्थात श्रेष्ठत्व की प्राप्ति होती है। इनमें इन्द्रियों का अश्व और मन का लगाम होना भी अन्तनिर्हित है।


    कोसी (कौशल्या) नदी के सुरम्य तट पर स्थित यह मंदिर मनोरम पयर्टक स्थल के साथ ही धार्मिक आस्था का प्रमुख केन्द्र है। सावन माह में यहाँ की जाने वाली शिव पूजा का विशेष महत्व है। शिव पूजन के लिये यहाँ काफी मात्रा में श्रद्धालु पहुँचते हैं। यहाँ यज्ञोपवीत संस्कार भी किये जाते हैं। मान्यता है कि देवस्थल धाम के दर्शन मात्र से ही श्रद्धालुओं की मनोकामनाऐं पूरी हो जाती हैं। मन्दिर में तीन ऊंचे गुम्बद हैं तथा निकट ही आश्रम की विशाल धर्मशाला है। जहाँ भक्त गण विश्राम कर सकते हैं। आश्रम में चारों ओर खूब हरियाली है। मन्दिर में पार्थिव पूजन करने का विशेष महत्व है। मनोकामना सिद्धि के लिए श्रद्धालु मिट्टी, चावल के आटे, गोबर, मक्खन आदि से पार्थिव बनाते हैं और उनकी पूजा अर्चना कर जलाभिषेक करते हैं।


    अनके सन्त महात्माओं ने यहाँ निवास कर इस स्थान की शोभा बड़ाई है। वर्तमान समय में बृहस्पति गिरी महाराज ने तो इस मन्दिर का कायाकल्प ही कर दिया है। अनेक अथक प्रयासों से यह मन्दिर आज अपनी पूर्ण भव्यता को प्राप्त कर रहा है। यदि स्थानीय जन प्रतिनिधि व सरकार इस ओर उचित ध्यान दे तो इस मन्दिर का और जीर्णोद्धार हो सकता है। जिससे पयर्टन को भी विशेष प्रोत्साहन मिलेगा।



    लेखक - श्री एल .पी .ढौंडिया,ल ढौंडियाल, नैनिताल
    संदर्भ -
    पुरवासी - 2009, श्री लक्ष्मी भंडार (हुक्का क्लब), अल्मोड़ा, अंक : 30


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