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    कैलाश-मानसरोवर यात्रा पथ

    उत्तराखण्ड का ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण भारत का मुकुटमणि एवं भगवान शंकर का स्थायी निवास माना जाने वाला कैलास-मानसरोवर कभी इस देवभूमि का ही अभिन्न अंग हुआ करता था तथा अनादि काल से ही यहाँ के ऋषियों-मुनियों त्यागी-तपस्यिों, साधकों एवं धार्मिक भावनाभरित तीर्थ यात्रियों का श्रेष्ठतम देवस्थल माने जाने के कारण बिना किसी मानवीय अवरोध के गम्य हुआ करता था।


    सन् 1962 में चीन के द्वारा तिब्बत को अधिकृत कर लिये जाने से पूर्व भी तिब्बत के शासकों के द्वारा यहाँ की यात्रा पर कभी कोई किसी प्रकार का अवरोध उत्पन्न नहीं किया गया था। उस समय तिब्बत में उत्तराखण्ड के पिथौरागढ़, चमोली एवं उत्तरकाशी जनपदों के सीमान्त क्षेत्रों में स्थित 18 गिरि-द्वारों से प्रवेश किया जाता था।


    इन हिमद्वारों के मार्गों से दोनों देशों के बीच निरविरोध रूप से पारस्परिक व्यापार एवं तीर्थयात्रियों का आवागमन होता रहता था। किन्तु 1962 में चीन के द्वारा तिब्बत को आत्मसात कर लिये जाने से अगले 20 वषों तक आवागमन का यह सिलसिला पूर्णत: अवरूद्ध हो गया। इसके बाद 1981 के एक समझौते के अन्तर्गत कैलास मानसरोवर की यात्रा करने के इच्छुक भारतीय तीर्थ यात्रियों के लिए अनेक औपचारिक प्रतिबन्धों के साथ तिब्बत की सीमा में प्रवेश के लिए एक मात्र गिरिद्वार लिपूलेख का प्रावधान किया गया जो तिब्बती-क्षेत्र ताकलाकोट से माचा, राकसताल, गुमुल, ज्युगुम्पा, दारचिन होते हुए कैलास-मानसरोवर पहुँचता है।


    पुरातन व्यवसायपथ :


    20 वीं शती में अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ जनपदों में मोटर मार्गों के निर्माण से पूर्व गढ़वाल (नीती-माणा) के व्यवसायी तथा कैलास मानसरोवर के तीर्थ यात्री माणा से 40 किमी. की दूरी पर भारत-तिब्बत सीमा पर स्थित होतीधूरा (19402') तथा माणाधूरा के गिरिद्वार डमन्यन (15000') से तिब्बत में प्रवेश करके दापा, शिव चिलम व ज्ञानिमा मंडी पहुँचते थे। उत्तरकाशी के जाड़ लोगों का तिब्बत यात्रापथ नेलंग गिरिद्वार को पार करके जाता था। कुमाऊँ मडल के व्यवसायी ऊँटाधूरा तथा लिपूलेख के हिमद्वारों से ही अवागमन किया करते थे, अर्थात दारमा के शौका व्यापारी लिम्पियालेख (18150'), लावेधूरा (18250') एवं दारमाधूरा (19550') के गिरिद्वारों से पश्चिमी तिब्बत में ताकलाकोट पहुँचते थे। जोहार के ऊंटाधूरा के मार्ग से जाने वाले लोग अल्मोड़ा से बागेश्वर कपकोट, श्यामा, तेजम, गिरगाँव, तिकसैन, बौरी बागुंड्यार, रिलकोट, मिलम, ऊंटाधूरा (17,599), जयंती (17000'), किंगरी-बिंगरी (18000') ज्ञानिमा मंडी-तीर्थपुरी होते हुए कैलास-मानसरोवर की यात्रा करते थे तथा चौदांस, ब्यांस के लोग लिपूलेख के मार्ग से आते-जाते थे। इसमें लिपूलेख से होकर जाने वाले लोग पूर्वी रामगंगा को पार करके हथुवादेवल होते हुए थल पहुँचते थे। फिर वहां से डीडीहाट, अस्कोट, जौलजीवी, बलुवाकोट, धारचूला, तपोवन, खेला, पांगू से निरपनिया की झंडीधार में पहुँचते थे। वहां से मालपा, छिरपती उड्यार होते हुए गर्ब्यांग के अन्तिम गांव बूंदी से चल कर लिपूलेख के पादप्रदेश में स्थित डांग नामक स्थान पर अन्तिम विश्राम करते थे। यहां से आगे लिपूलेख के गिरिद्वार को पार करके तिब्बत क्षेत्र में प्रवेश करने के बाद पहला पड़ाव परांङ जिले के धारेडुँंगा गांव में होता था। वहाँ से फिर मगरूण गाँव, ताकलाकोट आदि स्थानों को पार करते हुए कैलास-मानसरोवर तक जाते थे। जोहार के लोग ऊँटाधूरा के हिमद्वार को पार कर ज्ञानिमा मंडी जाते थे।


    (1) पुराणकालीन तीर्थ यात्रापथ :


    स्कन्द पुराण के मानसखण्ड के कूर्मांचल खण्ड में कैलास मानसरोवर की वामावर्ती तीर्थयात्रा पथ के विषय में जो विवरण दिया गया है उसके अनुसार यात्री कूर्मगिरि के पादप्रदेश क्षेत्र में प्रवाहित होने वाली गण्डकी और लोहावती नदियों के मध्यवर्ती क्षेत्र (सम्प्रति शारदा काली के तटीय क्षेत्र टनकपुर) के निकटवर्ती प्रदेश से सरयू के तटवर्ती क्षेत्र से होते हुए कूर्मपर्वत पर कूर्मशिला का दर्शन कर व पूजन करके हंस तीर्थ के जल में स्नान कर उसके बाद दारूपर्वत पर जम्बुमहादेव के दर्शनों के बाद पाताल भुवनेश्वर पहुंचते थे। वहाँ से आगे रामगंगा (पo) में स्नान करके चम्पावत के बालेश्वर मंदिर में भगवान शंकर की पूजा करके पावन पर्वत पर पावन देव का पूजन करके ध्वज मंदिर जाते थे। वहाँ से काली और गोरी के संगमस्थल जौलजीवी से धारचूला होते हुए चौदांस-व्यास में काली के उद्गम स्थल (कालापानी) के व्यासाश्रम में पहुँचते थे। उसके बाद कैरल नामक पर्वत पर स्थित देवी का दर्शन-पूजन करके पुलोमन पर्वत की ओर जाते थे और वहाँ पर पुलोमा सरोवर (शायद रावणहृद) के मध्य में स्थित पुलामेश का पूजन करके तारेकश पर्वत पर पहुंचते थे। इसके बाद वहाँ के बौद्ध मठों का दर्शन करते हुए गौरीगिरी (कैलासपर्वत) पर पहुंचते थे और वहाँ पर मानसरोवर की परिक्रमा करके उसमें स्नान तर्पण करते थे। (अ. 11, श्लो.14-52)


    इसके बाद वहाँ से प्रत्यावर्तन के मार्ग के विषय में कहा गया है कि ये लोग खेचरतीर्थ (खोजरनाथ) में खेचरनाथ का पूजन करके आगे ब्रह्मकपाल (बद्रीनाथ) पहुँचते थे। वहाँ से छयातीर्थ (शायद मन्दाकिनी घाटी में स्थित छाया चौराड़ी) होते हुए रामसरोवर, ऋणमोचन होते हुए ब्रह्मसरोवर (बानगांव के प्रवेश द्वार पर स्थित ब्रह्मताल) में स्नान करके आगे का मार्ग तै करते हुए नन्द पर्वत (नन्दादेवी के पितृगृह, नौटी) में आकर नन्दा सरोवर में स्नान-तर्पण आदि करके मल्लिका देवी के दर्शनार्थ बैजनाथधाम पहुँचते थे। वहाँ से वृद्धगंगा में स्नान करके पद्मावती के तटीय क्षेत्र में स्थित ज्वालातीर्थ (सम्भवत: ज्वाल्यादेवी) पहुँचने के बाद मानस क्षेत्र की यात्रा पूरी करके आगे का मार्ग पकड़ते थे। (श्लोक 55-68)


    (2) मध्यकालीन :


    काली कुमाऊं में चन्द राजवंश के द्वारा चम्पावत को राज्य की राजधानी बनाये जाने से पूर्व कत्यूरी शासन काल में भारत के पूर्वोत्तरी क्षेत्रों से कैलास-मानसरोवर की यात्रा करने के इच्छुक तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए कत्यूरी शासकों के द्वारा बसाई गयी मंडी, बरमदेव मंडी जो सम्प्रति कालीनदी के पूर्वी तट पर नेपाल की सीमा के अन्तर्गत स्थित है, के सिद्ध मंदिर के आश्रम में जहाँ पर उनके भोजन-आवास की व्यवस्था होती थी, एकत्र होते थे। वहाँ से फिर वे एक यात्रीसमूह के रूप में नदी के किनारे-किनारे पंचेश्वर, देवल (बौतड़ी अंचल में झूलाधार के निकट ) होते हुए अकू (जौलजीवी के समीप) पहुँचते थे। वहाँ से आगे धारचूला के निकटस्थ तपोवन में पहुँचते थे। वहाँ पर कालीनदी के पश्चिमी तट पर स्थित उष्ण जल के स्रोत, तप्तकुंड में स्नान करके आगे की यात्रा करते थे तथा बीच में पड़ने वाले चौदांस एवं ब्यांस के पड़ावों पर विश्राम करते हुए लिपूलेख पहुँचते थे और वहीं से तिब्बत क्षेत्र में पहुँच कर आगे की यात्रा पूरी करते थे।


    किन्तु चन्दकाल (989-1790) में पूर्वी क्षेत्रों से आने वाले तीर्थयात्री टनकपुर मंडी के निकट पुण्यागिरी के पास एकत्र होते थे। यहाँ पर तथा इससे आगे के मार्ग पर उनके लिए राज्य की ओर से सदावर्त की व्यवस्था होती थी।


    इसके बाद ये लोग कानादेवी (क्रान्तेश्वर) की पहाड़ी को पार करके फुंगर गाँव में स्थित झालीमाली देवी के मंदिर में पहुंचते थे। वहां से चम्पावत में स्थित बालेश्वर एवं मानेश्वर के मंदिरों का दर्शन करते हुए सरयू एवं पूर्वी रामगंगा के संगम पर स्थित पवित्र तीर्थधाम रामेश्वर पहुंचते थे। वहाँ से वर्तमान पिथौरागढ़ की सीमा में प्रवेश करके कनालीछीना का मार्ग पकड़ते थे। यह पथ कनालीछीना से अस्कोट (19), जौलजीवी (8), धारचूला (21), खेला (16), पांगु (11), जुपती (22), गर्ब्यांग (24) , कालापानी (18), लिपूलेख (15) किमी. का भारतीय क्षेत्र का पैदल मार्ग तय करके तिब्बत की सीमा में प्रवेश करते थे। जहाँ से आगे ताकलाकोट (24), माचा (18), राकसताल (18), गुमुल (9), जुगुम्पा, मानसरोवर (12) का कुल 281 किमी तक का मार्ग तय करने के उपरान्त कैलास पहुँचते थे। वहाँ पर कैलास मानसरोवर की परिक्रमा, स्नान, पूजन-तर्पण के बाद ये लोग चमोली के अन्तर्गत पड़ने वाले तीर्थस्थलों एवं बैद्यनाथ, न्याला तीर्थ के पास से दर्शन करते हुए मैदानी क्षेत्रों की ओर को लौटते थे।


    किन्तु 1982 के बाद कुमाऊँ विकासमंडल द्वारा आयोजित यात्राओं में काठगोदाम से तवाघाट के मार्गस्थ दिल्ली से नैनीताल, अल्मोड़ा एवं पिथौरागढ़ जनपदों के 3 विश्रामों के बाद यात्रीदल मोटर से धारचूला पहुंच कर वहां से काली नदी के किनारे-किनारे तवाघाट एवं नारायण आश्रम तक का लगभग 250 किमी. का कुमाऊं क्षेत्र का मोटर मार्ग तय करके ब्यांस घाटी के बूंदी क्षेत्र (9070 मी.) एवं छेतूविनायक एवं छियालेख होते हुए गर्ब्यांग (10320') में विश्राम करते हैं। वहाँ से विभिन्न विश्रामों में होते हुए ब्यास घाटी के अन्तिम गाँव कुटी (13000') में पहुँचते हैं। अगला पड़ाव होता है। नाबीढांग (14000')। इसके आगे भारतीय क्षेत्र का अन्तिम पड़ाव होता है लिपूलेख, जो समुद्री सतह से लगभग 1600 मी. पर अवस्थित है। यहाँ से चीन-तिब्बत सीमा व चीनी व्यवस्था लागू हो जाती है। जिसका प्रथम पड़ाव करनाली नदी के तट पर बसा ताकलाकोट का कस्बा है। यहां पर एक दिन रुक कर अभिलेखादि की औपचारिकता को पूरा किया जाता है तथा तिब्बत की यात्रा की सरकारी व्यवस्था की जाती है। इसी पर आगे चलते मार्ग में राक्षसताल, मानसरोवर व गुरला मान्धाता पर्वत श्रेणी, जो 16000 मी. के लगभग ऊँची है, आते हैं। मान्धाता पर्वत के बाईं ओर राक्षस ताल (15000') व मानसरोवर (लगभग 15100') पड़ते हैं। इनके बाद कैलास परिक्रमा का आधार शिविर दारचिन (15000') आता है। यात्री यहीं ठहर कर अगले तीन दिनों में कैलास की परिक्रमा करते हैं। इसकी दक्षिण तलहटी में राक्षसताल है। आगे डोल्मापास (लगभग 18900'), नीचे गौरीकुंड (17000') है। और परिक्रमा का अन्तिम पड़ाव होता है जंटुल। यात्री फिर तीसरे दिन वापस दारचिन आ जाते हैं। मानस का कुल क्षेत्रफल लगभग 200 वर्गमील व परिक्रमा क्षेत्र लगभग 100 किमी. बताया जाता है। दारचिन से यात्री फिर ताकलाकोट आकर करनाली के किनारे-किनारे 25 किमी. पर अवस्थित खोजनाथ जाते हैं। इस मठ में तीन भव्य आदमकद मूर्तियां स्थापित हैं, जिन्हें राम, लक्ष्मण और सीता की माना जाता है। इसके बाद फिर यात्री वापसी पर पिछले मार्ग से चौदांस-ब्यास होते हुए धारचूला के रास्ते वापस काठगोदाम पहुँचते हैं। इस प्रकार कुमाऊँ विकास मडल द्वारा प्रतिवर्ष जून -जुलाई में आयोजित 465 किमी. की यह तीर्थयात्रा पूरी की जाती है।


    हिन्दुस्तान (3 दिसम्बर, 2010) में प्रकाशित एक समाचार के अनुसार मांगती में होने वाले भूस्खलन को देखते हुए विदेश मंत्रालय ने तवाधार-सिर्खा मार्ग की संस्तुति की है। नई व्यवस्था में कालापानी को छोड़ दिया है। अब तीर्थयात्री सीधे सिर्खा, गाला, बूंदी, गुंजी होते हुए पुराने यात्रा मार्ग से नाभिढांग पहुँचेंगे।


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