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    चाँदपुर गढ़

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    Chandpur Gadi

    ‌चांदपुर गढ़ उत्तराखंड के सबसे प्रमुख गढ़ों में से एक है। चमोली जिले के चांदपुर क्षेत्र में आदिबद्री के प्रसिद्ध मंदिर समूह से महज तीन किलोमीटर दूर एक ऊँची टेकड़ी पर स्थित है। यह चांदपुर गढ़ी वर्तमान में कर्णप्रयाग रानीखेत राजमार्ग पर आदिबद्री से थोड़ा आगे एक छोटी सी बस्ती है चांदपुर। इसी बस्ती से लगभग 200 मीटर ऊपर चढ़कर चादपुर गढ़ी तक पहुंचा जा सकता है।


    ‌चांदपुर गढ़ी में आज भी अतीत के सुनहरे दिनों के अनेक अवशेष मौजूद हैं। गढ़ी पहाड़ी की चोटी पर करीब डेढ़ एकड़ क्षेत्र में फैली हुई है। सबसे ऊंचे स्थल पर पत्थरों का बना एक विशाल चबूतरा है। जिसकी बाहरी दीवारें तीन-चार फिट ऊँची हैं। सम्भवत: अपने मूल स्वरूप में ये उससे भी काफी ऊँची रही होंगी और इनका आकार तथा उपयोग सुरक्षा दीवार के तौर पर किया जाता होगा। चबूतरे के बीच में कुछ कमरों के अवशेष हैं और एक मंदिर भी। यह मंदिर मूल आकार में अवश्य ही किसी अन्य स्वरूप में रहा होगा। गढ़ी का वैभव और जीवन्तता खत्म होने के बाद स्थानीय जनमानस में एक धार्मिक स्थल के रूप में इस स्थान की मान्यता बढ़ते जाने क कारण मदिर का स्वरूप बदला होगा। लेकिन मूल स्वरूप चाहे जैसा भी हो इस मंदिर में पुराने युग की शानदार झलक आज भी मिल जाती है। मुख्य भवन की बाहरी दीवार के एक कोने में एक पुराना वृक्ष भी है जिसके तने पर लाल सफेद वस्त्र की पताकाएं बंधी दिखती हैं और कुछ घंटियां भी । सम्भवत: इस स्थान को भी किसी ग्राम देवता के स्थान के तौर पर पूज्य माना जाता है। गढ़ी से आसपास का विहंगम दृश्य दिखाई देता है। एक और आदिबद्री से आती सर्पिल मोटर रोड और दूसरी ओर गढ़वाल और कुमाऊँ के बीच जल विभाजक का काम करने वाला दिवालीखाल का डाण्डा। ऊपर सामने उत्तर दिशा में नौटी की पहाड़ियां और नीचे लगभग 400 मीटर दूर आटागाड़ की मुख्य जलधारा दिखाई देती है। आटागाड़ में चांदपुर गढ़ के नीचे ही जगथन गाड़ का संगम हो जाता है और आगे ढुंग गाड़, लटगाड़, कसुवागाड़ आदि से मिलकर यह भरारीगाड़ के नाम से पिण्डर नदी में मिल जाती है। आटागाड़ चांदपुर गढ़ वाली पहाड़ी को लगभग 180 अंश से घेरकर बहती है और नदी के इस घर के बीच उभरी हुई अंतरीप नुमा पहाड़ी पर ही चांदपुर गढ़ अवस्थित है। हालांकि आज भी ऊपर किले में एक बड़े कुए के अवशेष दिखाई देते हैं लेकिन मान्यता यह है कि अपने सुनहरे दिनों किले से नीचे नदी तक एक सुरंग थी और उस सुरंग के जरिये ही नदी का पानी किले तक पहुंचाया जाता था। हालांकि महल के ध्वसांवशेषों में इसका कोई चिन्ह नहीं मिलता। लेकिन महल के निचले प्रस्तर में जो कमरे हैं उनमें से कुछ को रानियों का स्नानागार बताया जाता है। इससे स्पष्ट होता है कि उन दिनों गढ़ी में पानी यह की बड़ी समस्या नहीं रही होगी। गढ़ी की दीवारों के पत्थरों पर अनेक प्रकार के चित्र देवी देवताओं के स्वरूप उकेरे गए हैं। गढ़ी के अवशेषों में पत्थरों पर काटकर बनाई गयी नालियों के टुकड़े यह भी बताते हैं कि उन दिनों भी उत्तराखंड वासियों के पास जल प्रबंधन का बेहतर ज्ञान उपलब्ध था। किले के अवशेषों में मोटी मोटी पत्थरों की दीवारों के बीच बने छेद या रोशनदान भी दुर्गसंरचना का बेहतरीन नमूना प्रस्तुत करते हैं। यह रोशनदान इस तरह बने हैं कि दीवार का भीतरी सतह पर इनका आकार लगभग तीन वर्ग फुट है जबकि बाहर से यह आधे वर्ग फुट से भी कम आकार के दिखाई देते हैं। इस आकार के कारण बाहर से कोई भी व्यक्ति इन रोशनदानों से होकर अन्दर प्रवेश नहीं कर सकता था जबकि भीतर वाले को इनसे बाहर का सब कुछ दिखाई देता था। युद्ध की स्थिति में भी इनकी महत्वपूर्ण उपयोगिता होती होगी। अपने सुनहरे दिनों में इस गढ़ ने अनेक युद्धों का सामना किया और अनेक बार इसका पुर्ननिर्माण भी होता रहा। वर्तमान में यह गढ़ पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है और हाल में हुए उत्खनन में यहां तथा निकटवर्ती क्षेत्रों से अनेक ऐतिहासिक महत्व की चीजें मिली हैं। वर्तमान में चांदपुर गढ़ के आकार को देखते हुए यह सोचना भी कठिन लगता है कि कभी यहां से इतिहास अनेक महत्वपूर्ण घटनाओं का संचालन हुआ होगा और हमारे अतीत के पन्नों में अनेक अध्याय चांदपुर गढ़ के बाशिंदों ने और यहां की मिट्टी ने लिखवाए होंगे।


    ‌इतिहास के पृष्ठों पर नजर डालें तो आठवी-नवीं शताब्दी में उत्तराखंड में जबर्दस्त राजनीतिक उथल -पुथल मची हुई थी। जोशीमठ का कत्यूरी राज्य अपना प्रभाव खो रहा था। गढ़वाल में अनेक छोटे छोटे राज्य बनने लगे थे। चांदपुर गढ़ की स्थापना और विकास का काल भी यही था। चांदपुर गढ़ी में भानुप्रताप नामक शासक के काल में धारानगर से आए कनकपाल नाम के एक राजकुमार भानुप्रताप की छोटी पुत्री का से जब विवाह हुआ तो चांदपुर गढ़ के दिन भी बदलने लगे। विवाह के बाद जल्द ही कनकपाल को चांदपुर का राज्य भी मिल गया। कनकपाल को ही गढ़वाल के पंवार राजवश का मूल पुरुष माना जाता है। हरिकृष्ण रतूड़ी ने 'गढ़वाल का इतिहास' में कनकपाल के राजा बनने का वर्ष सन् 888 ई. माना है। कनकपाल का सेंतीसवां वंशज अजयपाल थे। अजय पाल एक शक्तिशाली शासक था। उसने उस वक्त गढ़वाल के सभी छोटे-छोटे गढ़ों को जीतकर गढ़वाल राज्य की स्थापना की और देवलगढ़ के स्थान पर सन् 1517 ई. में श्रीनगर में अपनी राजधानी की स्थापना की। चांदपुर गढ़ से देवलगढ़ जाने की सही तारीख के बारे में कोई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं है लेकिन इतना निश्चित है चांदपर गढ़ को कई शताब्दियों तक उत्तराखंड के इतिहास में एक विशिष्ट स्थान मिलता रहा था और आज भी यह स्थान उत्तराखंड के गौरवशाली अतीत का प्रतीक बनकर गैरसैंण जैसे अंदरूनी इलाके में राजधानी की स्थापना का विरोध करने वालों को एक आइना भी दिखाता है।

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