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    एक हथिया नौला - स्थापत्य कला का प्रतिनिधि

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    ekhatiyanaula

    यश एवं धर्म की वृद्धि के लिए देवालय निर्माण के साथ-साथ जलाशयों का निर्माण प्राचीन भारतीय परम्परा का अभिन्न अंग रहा है। सिरोली-नरवर्मा के शिलालेखों में छठी-सातवीं सदी में नरवर्मा द्वारा जलवापी का निर्माण, भूदेव के बागेश्वर शिलालेख में व्याघ्रेश्वर देव के सम्मान में जलवाणी का निर्माण, अभयचन्द का शाके 1282 का मानेसर अभिलेख, ग्यान चंद वे सोनपाल के शाके 1391 का नाग नौला लेख, भारतीचन्द का शाके 1391 का नाग नौला अभिलेख, बालेश्वर नौला अभिलेख आदि अभिलेखीय साक्ष्य पूर्वोक्त कथन की पुष्टि करते हैं। ऋग्वेद, वैदिक ग्रन्थ, पुराण एवं महाकाव्यों में जल की पवित्रता व महत्ता का उल्लेख करते हुए इसे दैवीय स्वरूप प्रदान किया गया है। महाभारत में विष्णु को नार (जल) में निवास करने के कारण नारायण उल्लेखित किया गया है।


    आपा नारा इति पुरा संबा कर्मकृत मया।
    तेन नारयणोऽप्युक्तो म मतत त्वयन सदा।।


    “प्राचीन काल में जल का नाम नार मैंने ही रखा था। इस नार में अयन होने के कारण मेरा नाम नारायण हुआ।”


    नौला/नौल मूलतः कुमाउनी शब्द ‘नौव’ का ही रूप है जिसका अभिप्राय जल प्राप्ति हेतु निर्मित बावड़ी व जलकुण्ड है, जहाँ भू-गर्भ से प्रस्फुटित जल मानव निर्मित जलकुण्ड में सचित होता रहता है। नौलों का निर्माण इस तरह किया गया है कि ये भूगर्भ स्रोत से निकलने वाले पानी का संग्रह करते रहें तथा पानी का बहाव भी न रूके। मानव जीवन में जल की महत्ता के कारण जल को दैवीय स्वरूप प्रदान कर इसे धार्मिक महत्व प्रदान किया गया। परिणामस्वरूप देवालयों के समान ही जलस्रोत के ऊपर गर्भगृह, मण्डप आदि का निर्माण कर उन्हें अंलकृत करने की प्रथा प्रारंभ हुई। पौराणिक साहित्य में विष्णु को प्रमुखता से स्थान दिया गया। विष्णु के दसावतारों के अंकन युक्त प्रतिमाएं भी स्थापित की गई हैं।


    समुद्र तल से 1615 मीटर की ऊँचाई पर स्थित चंपावत प्रारम्भिक चंद वंशों की ऐतिहासिक राजधानी के रूप में प्रतिष्ठित रहा है। मान्यताओं के अनुसार चंपावत का नाम राजा अर्जुन देव की बेटी चंपावती के नाम पर रखा गया था। बालेश्वर मंदिर परिसर में चंपावति मंदिर स्थित है। ऐसी मान्यता है कि भगवान विष्णु का कूर्म अवतार यहीं हुआ था। इस स्थान में चंद राजाओं द्वारा निर्मित देवालयों, नौले, कोट, विरखम, धर्मशाला आदि के अवशेष दृष्टिगोचर होत हैं। जो चंद राजाओं के स्थापत्य के प्रति प्रेम को अभिव्यक्ति करते हैं। जिनमें एकहतिया नौला अपनी स्थापत्य कला के लिए विख्यात है। एक हतिया नौला चंपावत के समीपवर्ती ढकना गाँव से 3 किमा. की दूरी पर स्थित है। देवदार और बांज के वृक्षों के घने व वीरान जंगल के मध्य में प्राचीन कुमाऊँ की स्थापत्य के एक अत्यन्त उत्कृष्ट उदाहरण के रूप में “एक हतिया नौला” निर्मित है। एक हतिया नौला तक पहुँचने वाले पैदल मार्ग में गढ़े विरखमों से यह परिलक्षित होता है कि यह मार्ग तत्कालीन समय में एक महत्वपूर्ण मार्ग के रूप में प्रयुक्त रहा होगा।


    पत्थर को तराश कर बनाई गई यह कलाकृति एक पौराणिक कथा के कारण भी प्रसिद्ध है। ऐसी मान्यता है कि इस पूरी आकृति को किसी एक हाथ वाले शिल्पकार ने एक रात में तराश कर बनाया था। एक अन्य स्थानीय मान्यता के अनुसार यह माना जाता है कि नौले का निर्माण करने वाले शिल्पी का एक हाथ राजा ने कटवा दिया था ताकि वह अन्यत्र ऐसी कलासृष्टि न कर सके। प्रचलित मान्यताओं में विरोधाभास के चलते हम स्पष्ट नहीं कह सकते कि इसका नाम एक हतिया नौला क्यों प्रयुक्त किया गया। इस नौले के रचनाकार एवं निर्माण अवधि के विषय में कोई अभिलेखीय साक्ष्य प्राप्त नहीं हुए हैं। डॉ. रामसिंह ने ‘राग-भाग काली कुमाऊँ’ में एक हतिया नौले को बालेश्वर नौले से पूर्ववर्ती निर्मित माना है।


    स्थापत्य कला के दृष्टिकोण से नौले के तलछन्द विन्यास में गर्भ गृह व अर्द्धमण्डप का प्रावधान किया गया है। गर्भ गृह आठ सोपानों के तलछन्द विन्यास में गर्भ गृह व अर्द्धमण्डप का प्रावधान किया गया है। गर्भ गृह आठ सोपानों अर्थात् पाट् से युक्त जल कुण्ड है। जल कुण्ड के ऊपर जाड्य कुम्भ, कर्णिका, कुम्भ, कलश युक्त पट्टियों से निर्मित वेदी बंद हैं। वेदी बंद के ऊपर अलंकृत जंघा भाग में तीनों ओर से प्रत्येक दीवार में दो-दो उद्गत युक्त रथिका बनी हैं। रथिकाओं के शीर्ष देवालयों के समान त्रिरथर रेखा शिखर युक्त बनाये गये हैं जिनके स्तक में आमलक विद्यमान है। रथिकाओं व इनके पार्श्व में चतुर्भुजी शिव, द्विभुजी सूर्य, गणेश, लक्ष्मी, विष्णु, पार्वती, पुरुष व स्त्री अनुचर आकृतियाँ आदि का अंकन किया गया है। मंदिरनुमा शिखर के निचले भद्र प्रक्षेप में बनी रथिकाओं में देव आकृतियाँ, न्त्यरत मानवाकृति, हाथ जोड़े मानव, कीर्तिमुख एवं बांसुरी वादक कृष्ण का चित्रण है। गर्भ गृह का वितान प्रारम्भ में एक पट्टि के स्तर तक पंक्ति वितान वाला है। उसके बाद चार वृत्तों युक्त नाभि छंद वितान है। अलंकृत वितान में विभिन्न देव आकृतियाँ उकेरी गयी हैं।


    गर्भ गृह से सटे प्रवेश द्वार द्विशाखा युक्त है जिसका ललाट विम्ब प्रतिमा विहीन है। प्रवेश द्वार के पार्श्व में उद्गम युक्त रथिकाएँ बनी हैं। प्रवेश द्वार के शीर्ष में रेखा शिखर युक्त देवालय प्रतिबिम्ब कृति है जिसके स्तक पर आमलक विद्यमान है। प्रवेश द्वार के दांयी ओर की रथिका में गणेश व बांयी ओर की रथिका में नृसिंह अंकन किया गया है। बाहरी दीवार के भद्र प्रक्षेप में खण्डित दैवीय आकृति बनी है। प्रवेश द्वार के सम्मुख सम्भवतः दो स्तम्भ पर आधारित अर्द्धमण्डप जो वर्तमान में एक स्तम्भ पर अवस्थित है। स्तम्भ का आधार वर्गाकार, मध्यवर्ती भाग अष्टास्र व षोडास्र एवं शीर्ष वृत्ताकार है जिसके ऊपर अलंकृत मेहराब निर्मित है जो कि अर्द्धमण्डप के वितान को आधार दिये हुए है। अर्द्धमण्डप के दोनों पार्श्व की दीवार में उद्गम युक्त रथिकाएं प्रतिमा विहीन निर्मित की गयी है। अर्द्धमण्डप की बांयी ओर देवालयनुमा रथिका में विष्णु की खण्डित मत्स्य अवतार प्रतिमा विद्यमान है। रथिका के शिखर के भद्र प्रक्षेप के मध्य में अस्पष्ट चतुर्भजी विष्णु शोभायमान हैं। अर्द्धमण्डप का वितान अलंकृत तीन पाट् में विभक्त है जिसमें विभिन्न मानव और वासुकी नाग कृष्ण की आकृति का सहज चित्रण किया गया है। प्रवेश द्वार के निचले स्तर के दोनों पार्श्व में बैठने के ताखे या चबूतरे निर्मित हैं। गर्भ गृह की बाह्य दीवारों में अलंकरण का प्रयोग मिलता है। एक हतिया नौले की छत स्थानीय पटलों से निर्मित पंक्ति वितान युक्त ढलवा निर्मित की गयी है।


    एक हतिया नौले की गर्भ गृह की भित्तीय व बाह्य दीवारों पर उत्कीर्ण अनुकृति लौकिक जीवन के विविध रूपों के दृश्य जैसे नृतक, वादक, गायक, फल या पानी का घड़ा ले जाती स्त्री, राजा, उपासक, योद्धा आदि महत्वपूर्ण अवसरों से सम्बन्धित व्यक्तियों की आकृतियों का चित्रण रोचक व प्रभावपूर्ण तरीके से किया गया है। प्रतिमाओं में विष्णु के दसावतारों के अतिरिक्त गणेश, सूर्य एवं अन्य देव आकृतियों का अंकन किया गया है। नौला स्थापत्य एवं प्रतिमाओं के आधार पर प्रतीत होता है कि यह नौला सम्भवतः तेरहवीं-चौंदहवीं शताब्दी में निर्मित किया गया होगा।


    कला की दृष्टि से यह कुमाऊँ की ही नहीं वरन् समूच्य उत्तराखण्ड की बेजोड़ स्थापत्य कलाकृतियाँ में सर्वोच्च है। चंदकाल में निर्मित यह नौला जहाँ एक और शासकों के सामाजिक सरोकारों को अभिव्यक्त करता है वहीं दुसरी ओर समृद्ध सांस्कृतिक परम्परा के प्रतीक उनके झुकाव को भी प्रदर्शित करता है। वर्तमान में संरक्षण के अभाव में यह नौला जीर्ण-क्षीर्ण होने के कगार पर पहुँच गया है। यदि समय रहते संरक्षण पर ध्यान न दिया गया तो हमारा गौरवशाली अतीत शनैः-शनैः अस्त हो जाएगा।



    लेखक -शालिनी पाठक, शोध छात्रा (एस.एस.जे. परिसर, अल्मोड़ा)
    सर्वाधिकार -
    पुरवासी - 2016, श्री लक्ष्मी भंडार (हुक्का क्लब), अल्मोड़ा, अंक : 37

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