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    खतडुवा | भैल्‍लो - पशुत्सव

    khatarua

    उत्तराखण्ड के पूर्वी अंचल में, एक बड़े पर्वतीय भूभाग में असोज मास की कन्या संक्रान्ति के शुभअवसर पर, अनेक गांवों में बड़े उल्लास से खतडुवा त्योहार मनाया जाता है। इस त्योहार में रात्रि के समय मशालों या तिल छिल्लों के झर-झर जलते शोलों के प्रकाश में एक विशेष रूप से बनाये पुतले को, केन्द्रीय स्थान में खड़ा कर अन्तत: उसे चिता अग्नि दी जाती है और प्राय: अनेक अपशब्दों के साथ अन्त में परंपरा से चले आ रहे गाथा बोल को समवेत स्वरों में उच्चारित किया जाता है। विद्वान लेखक कृष्णानन्द जोशी के लेख 'कुमाऊँ का लोक साहित्य' से बोलों को उद्धृत कर रहे हैं।


    "भेल्लो जी भेल्लो, भेल्लो खतडुवा,
    गै की जीत, खतडुवे की हार,
    खतुड़ लागो धारै धार
    गै मेरी स्योल, खतड़ पड़ो भ्योल।" (पुस्तक - कुमाऊँ संस्कृति पू. 22)


    किन्तु गै की जीत की जगह बद्रीदत्त पांडे जी ने 'कुमाऊँ का इतिहास' में 'गैड़ा की जीत' लिखा है, यद्यपि यह भी उल्लेख किया है कि कोई 'गै की जीत' भी कहते थे।


    इस जलते हुए खतडुवा के चारों ओर उछलते-कूदते हुए छड़ियों से मारते है और पूरा जल जाने पर लम्बी कूदें लगा कर उसे लांघते है। इसके बाद गांव के सभी जन इस ऋतु विशेष के फल खीरों को बांट कर खाते है। परन्तु पशुचारक वर्ग में इस खीरे को पशुओं को बांधने वाले खूंटे (दौंणी) पर मार कर तोड़े जाते है। अंत में जलते हुए खतडुवा को बुझाने में प्रयुक्त होने वाली छड़ियोंं को जला कर पशुओं को बांधने वाले स्थान पर घुमाया जाता है। ऐसा करने के पीछे यह मान्यता है कि पशु रोग और उन्हें हानी पहुँचाने वाली दुष्ट शक्तियां का नाश हो जाये।


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    किन्हीं क्षेेत्रौं में बच्चों द्वारा तीन-चार दिन पहले घास के मूढ़े को मोड़कर एक बुढा और कांस के फूलों की मानवाकार बूढ़ी बना कर उनके गले में फूलों की माला डालकर घर के पास गोबर के ढेर में आरोपित कर देते हैं। खतडुवा के दिन शाम को बूढ़े को उखाड़ कर और चारों ओर घुमा कर छत पर फेंक दिया जाता है तथा बूढ़ी को खतडुवे के साथ जला दिया जाता है। बूढ़ी की राख को एक दुसरे के माथे पे लगाया जाता है और पशुओं के माथे में भी लगाया जाता हैं। पूर्वी कुमाऊँ में इसे 'गैत्यार' भी कहा जाता है।


    कुमाऊं के शौका जनजातीय क्षेत्र में इसे किचित् भिन्न रूप में मनाया जाता है। इसके लिए वहां के युवक किसी ऊचे टीले पर घास-फूस की झाडियां काट कर एकत्र करते हैं तथा वहां पर ‘पुल्या' नामक घास के दो पुतले बनाते हैं जो बुड्ढा-बुढिया कहे जाते हैं। सायंकाल के समय चीड़ के छिलकों (फाड़ी हुई बत्तियों) की मशालें जला कर वहां पहुंचते है तथा उनसे उसे एकत्रित घास-फूस के पुतले पर आग लगा कर हर्षोल्लास के साथ उसके चारों ओर नाचते कूदते हैं। अन्त में अग्नि के शान्त हो जाने पर उसकी भस्म को लेकर घरों को लौटते हैं तथा उसका घर के सभी सदस्यों के माथे पर टीका लगाया जाता है। इसके सम्बन्ध में वहां के लोगों में ऐसी मान्यता है कि इसे लगाने से भूत-प्रेत आदि दुष्टात्माएं व्यक्ति के निकट नहीं आती हैं। वे इसे देखकर दूर से ही पलायन कर जाती हैं। (देखो, जी.एस. नेगी, 1988:98)। किन्तु शेरसिंह पांगती (1990:98) का कहना है कि जोहार में यह नहीं मनाया जाता है।


    कुछ लोग इस अवसर पर गाये जाने वाले हर्षोल्लास के गीत की शब्दावली- 'गैड़ा कि जीत, खतडवो कि हार। भाजी खतड़वा धारे-धार, या गैड़ा पड़ों श्योव, खतड़वा पड़ो भ्योव' के आधार पर इसे कुमाउंनी सेना का गढ़वाली सेना के ऊपर जीत के प्रतीक के रूप में मानते हैं। इस युद्ध में कुमाउंनी सेना का नेतृत्व गैड़ासिंह या यहां की गैड़ा जाति का कोई क्षत्रिय वीर कर रहा था तथा गढ़वाल की सेना का खतड़ सिंह कर रहा था। इसमें गैडा सिंह ने खतड़ सिंह को पराजित कर गढ़वाली सेना को पीछे हटने के लिए विवश कर दिया था। कहीं-कहीं 'गैंडा की जीत' के स्थान पर 'गाई कि जीत' पद का प्रयोग भी सुना जाता है। तदनुसार इसे इस रूप में व्याख्यायित किया जाता है कि चन्दों के ध्वज में गाय का चिह्न होने से इसमें इस विजय को 'गाई' (गाय) की जीत कहा गया है।'अट्किंसन (जि. 3 भा. 2, पृ0 871-72) के अनुसार गैड़ा द्वारा गढ़वाली सेना के विरुद्ध उसकी इस विजय का यह समाचार राजा को पर्वत शिखरों पर पहले से ही इस उद्देश्य से एकत्रित घासफूस पर आग लगाकर दिया गया था। यद्यपि अभी तक कुमाऊं तथा गढ़वाल के सम्बन्ध में प्राप्त ऐतिहासिक तथ्यों से इस प्रकार के किसी युद्ध की अथवा सेनापतियों के इन नामों की पुष्टि न होने से इसे इतिहास के साथ जोड़ने की मूर्खता किसी विकृत मस्तिष्क की उपज है। उत्तराखण्ड (1992:49) में प्रकाशित एक लेख में कहा गया है कि यह युद्ध चम्पावत के राजा रुद्रचन्द के पुत्र लक्ष्मण चन्द (उर्फ लक्ष्मीचन्द) तथा गढ़वाल के राजा मानशाह के बीच 1565 में हुआ था। मदन चन्द्र भट्ट (1986:8 के अनुसार 1608) किन्तु इतिहास इस विषय में सर्वथा मौन है। इतिहास से जोड़ना मूर्खता है। इस संदर्भ में यह भी उल्लेख्य है कि यह संक्रान्ति पर्व केवल कुमाऊं के पशुचारकों के द्वारा ही नहीं अपितु नेपाल तथा नेपालियों से सम्बद्ध क्षेत्रों दार्जिलिंग, सिक्किम में भी मनाया जाता है।


    नेपाल में तो इस अवसर पर गाये जाने वाले गीत में 'गै पड़ी श्योल खतड़वा पड़ो भ्योल' का स्पष्ट कथन है कि इसके बाद शीतकाल में गाये शीतल स्थान अर्थात् अपने गोठों में जायेंगी और उनके इसकाल में होने वाले रोगों का नाश हो जायेगा। नेपाल में तो बच्चे समवेत स्वर में गाते हैं- 'लुतो लाग्यो, लुतो भाग्यो' अर्थात् वर्षाकाल में जो बाल गिरने का रोग (लूता) लगा था वह नष्ट हो गया तथा यह गाते हुए बिना पीछे मुड़े घरों को दौड़ लगा जाते हैं।


    भैल्‍लो त्योहार पचास साल पहले तक और भिलंग-उत्तरकाशी अंचलों में तो आज भी कहीं कहीं मनाया जाता है। सलाण याने दक्षिणी गढ़वाल अंचल में यह गाय-गोठ त्योहार स्वरूप में होता था और किसी तेज दौड़ने वाले गरीब पुष्ट व्यक्ति को श्रृंगारिक बाघ बनने को प्रभूत अन्न पैसा प्रलोभन देकर तैयार किया जाता था। इसके बाद लम्बे चौड़े सिलसिले वार खेतों याने सार-सारी या सैण क्षेत्र में कुछ दूरी पर उसे घुटने टिकाये बाघ मुद्रा में बिठाते थे। इधर लगभग 50-60 फुट की दूरी से तिल छिल्लों व चीड़ की छयूंनी को भीमल के छिल्लों पर बांध किसी भी क्षण आग लगाकर जलती मशालों को लेकर उस नकली बाघ की तरफ दौड़ पड़ने व उसकी मूंछें झुलसाने हेतु 15-20 किशोर युवा एक पंक्ति में खड़े होकर एक गायक की पंक्ति को दुहारते बाघ की दाढ़ को बन्द रखने के अभिप्राय से कुछ इस प्रकार के बोल दुहराते थे।


    "हमारे गाँव के जंगल की अमुक धार के, अमुक वन क्षेत्र के, अमुक छापर,तप्पड़ के रहने वाले बाघ की दाढ़ों को हम बांध रहे हैं।" उधर उस बाघ बने व्यक्ति को अनिवार्य रूप से तिल चावल मिश्रित अन्न को मुट्ठी भर के मुंह में रख चबाना होता था और जैसे ही एक धार या वन का बोल खत्म होकर भैल्लो की गूंज होती तो, वह चबाया अन्न उसे भूमि में थूकना होता था।


    अन्त में उसकी शामत आ जाती थी। जैसे ही 3-4 वन क्षेत्रों के नाम के साथ भैल्लो बोल समाप्त होते, सामने जल रहे अलाव से मशालें जलाकर युवा व किशोर उसे झुलसाने दौड़ पड़ते थे। उधर वह भी झुलसने से बचने को जंगल की तरफ दौड़ लगाता और प्राय: बच भागने में सफल हो जाता था। भैल्लो त्योहार का समापन अन्त में पत्तलों में खाई जाने वाली खीर के सुस्वादु भोजन से होता था।


    अत: कभी गाय-गोठ वाली यही बात कमाऊं में भी रही हो और आज के वातावरण में धीमान लेखक गै को गाय की जीत मानने का आग्रह इसी कारण करते हों, तो आश्चर्य नहीं होता।


    संदर्भ

    1- पुरवासी - 2015, श्री लक्ष्मी भण्डार (हुक्का क्लब), अल्मोड़ा | लेखक - डॉ० शिवप्रसाद नैैथानी, भगतियाना, तहसील रोड, श्रीनगर (गढ़वाल)
    2- उत्तराखंड के लोकोत्सव एवं पर्वोत्सव | लेखक - प्रो. डी.डी. शर्मा

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