KnowledgeBase

    कुमाऊँ में राजस्व बंदोबस्त

    Read This Article in Hindi/ English/ Kumauni/ Garwali

    badobast

    सन् 1815 में कुमाऊँ में अंग्रेजी साम्राज्य की स्थापना से पूर्व सन् 1790 से 1814 तक कुमाऊँ में गोरखा शासन था और सन् 1990 से पूर्व चंद राजाओं का शासन था। चंद राजाओं के शासनकाल में शासन की इकाई ग्राम थी। प्रत्येक ग्राम की अपनी सीमा निर्धारित थी। इन सीमाओं की मान्यता राजा पर निर्भर करती थी। सामाओं की रक्षा का उत्तरदायित्व राजा का होता था। उनका प्रशासनिक ढाँचा भी साधारण एवं सीमित हुआ करता था। चंद राजाओं के प्रश्चात सन् 1790 में कुमाऊँ में गोरखों का आधिपत्य हुआ। गोरखा शासन मूल रूप में सैनिक शासन था। उनके काई लिखित कानून नहीं थे। न्याय करने एवं दंड देने के तरीके भी भयानक थे। प्राणदंड एक साधारण बात थी। कर वसूलने का उत्तरदायित्व फौजी अफसरों का था। वे मनमाने तरीके से कर वसूल किया करते थे। गोरखा शासन के बाद 27 अप्रैल 1815 को अंग्रेजों ने अल्मोड़ा पर अधिकार कर लिया तथा 3 मई, 1815 को ई.गार्डनर कुमाऊँ में अपना राज्य स्थापित कर लेने के बाद इस क्षेत्र में ग्यारह बंदोबस्त करवाये गये।

    प्रथम बंदोबस्त सन् 1815-1816


    अंग्रेजों के द्वारा पहला बंदोबस्त सन् 1815-16 के मध्य ई.गार्डनर की अध्यक्षता में किया गया। यह बंदोबस्त गोरखा बंदोबस्त के ही आँकड़ो पर आधारित था। इस बंदोबस्त में राजस्व की धनराशि पचासी हजार एक सौ इक्यानबे रूपए निर्धारित की गई। राजस्व की वसूली फर्रूखाबादी रूपयों में की जाने लगी। इस बंदोबस्त के आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं। इस बंदोबस्त के दौरान जिल अल्मोड़ा तथा गढ़वाल के ग्रामों में बदलाव का महत्पूर्ण कार्य किया गया।


    द्वितीय बंदोबस्त सन् 1817


    कुमाऊँ में दूसरा बंदोबस्त ट्रेल के द्वारा करवाया गया। इस बंदोबस्त में राजस्व की राशि नवासी हजार पाँच सौ सैतीस रूपए निर्धारित की गई। इसी बंदोबस्त के दौरान मालगुजारों तथा थोकदारों की नियुक्ति की गई एवं उनके अधिकार तथा कर्तव्य निर्धारित किए गए। इस बंदोबस्त के समय कुमाऊँ में एक सौ पच्चीस पट्टियों तथा चौदह परगने थे। उल्लेखनीय है कि कुमाऊँ में पहला बंदोबस्त केवल परगनों के लिए किया गया था; किंतु इस बंदोबस्त में प्रत्येक ग्राम का क्षेत्रफल आँकना आवश्यक समझा गया था। इस बंदोबस्त में कानूनगो द्वारा प्रत्येक पट्टी के अंतर्गत भूमि के आँकड़े आँके गए थे। यह बंदोबस्त सिर्फ एक साल के लिए किया गया था। कुमाऊँ के राजस्व फौजदारी प्रशासन की दृष्टि से यह बंदोबस्त अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस बंदोबस्त की बढ़ी हुई आय को दृष्टिगत रखते हुए ही ट्रेल के द्वारा पटवारियों के पदों के स्जन का प्रस्ताव किया गया था।

    badobast1

    तीसरा बंदोबस्त सन् 1818


    कुमाऊँ का तीसरा बंदोबस्त सन् 1818 में श्री ट्रेल के द्वारा तीन साल की अवधि के लिए किया गया था। यह बंदोबस्त भोटिया इलाकों को छोड़कर सभी स्थानों पर करवाया गया। इस बंदोबस्त में प्रत्येक ग्राम के लिए मालगुजारी नियत की गई तथा पट्टी के रकम के प्रपत्रों में पट्टियों के प्रतिनिधियों के हस्ताक्षर करवाए गए। इस बंदोबस्त के बाद राजस्व की राशि बढ़कर अट्ठानबे हजार नौ सौ इक्यानबे रूपए हो गई थी।


    चौथा बंदोबस्त सन् 1820


    कुमाऊँ का चौथा बंदोबस्त श्री ट्रेल के द्वारा तीन साल की अवधि के लिए किया गया था। इस बंदोबस्त के बाद राजस्व की राशि पहले से बढ़कर एक लाख आठ हजार तीन सौ सताईस रूपए हो गई। इस बंदोबस्त में कृषि भूमि की पैमाइश नहीं की गई, बल्कि बोए जाने वाले बीज के आधार पर आँकड़े निर्धारित किए गए। बीस नाली बीज जिस भूमि पर बोया जा सकता था, उसको बीसी कहा गया। ग्राम की सीमाओं को थोकदारों एवं मालगुजारों की सूचना के आधार पर लिपिबद्ध करवाया गया। चूँकि यह कार्य संवत् 1880 में संपन्न हुआ, इसी कारण इस बंदोबस्त को पर्वतीय क्षेत्र में ‘साल अस्सी बंदोबस्त’ के नाम से भी जाना जाता है।


    पाँचवाँ बंदोबस्त सन् 1823


    इस बंदोबस्त में भूमि को लिपिबद्ध करने का प्रयास किया गया। ग्राम के मालगुजारों तथा थोकदारों को बुलाया गया तथा उनसे जोत के आँकडे मालूम किए गए। इन आँकड़ो को ग्रामवार एक पुस्तक के रूप में लिखा गया कि अमुक जोत में कितनी भूमि है। किंतु काश्तकारों की जोत के पृथक्-पृथक् आँकड़े नहीं लिखे गए। पूरे ग्राम के लिए रकम निश्चित की गई। रकम निर्धारित हो जाने के बाद उसे एक निश्चित अनुपात से काश्ताकारों में बाँट दिया गया। इस बंदोबस्त के बाद राजस्व की राशि बढ़कर एक लाख उन्नीस हजार चार सौ तीस रूपए हो गई।


    छठा बंदोबस्त सन् 1829


    इस बंदोबस्त को एक तरमीम बंदोबस्त के रूप में जाना जाता है। इसमें राजस्व भूमि में किए गए सुधारों के कारण राजस्व आय बढकर एक लाख बाईस हजार चार सौ चौरानबे रूपए हो गई।


    सातवाँ बंदोबस्त सन् 1832


    कुमाऊँ में अतिवृष्टि के कारण जगह-जगह पर भूमि का कटाव हो गया, फलस्वरूप काश्तकारों के द्वारा बंदोबस्त की माँग की गई और तदनुरूप काश्तकारों की माँग को ध्यान में रखते हुए यह बंदोबस्त किया गया। इस बंदोबस्त में किसानों द्वारा विस्तार की गई भूमि पर राजस्व निर्धारित किया गया। फलस्वरूप राजस्व की राशि बढ़कर एक लाख चौबीस हजार सात सौ उनतीस रूपए हो गई। यह बंदोबस्त एक साल की अवधि तक चला।


    आठवाँ बंदोबस्त सन् 1834


    ट्रेल के बाद कर्नल गाउन कुमाऊँ के कमिश्नर बने। शासन के द्वारा उन्हें निर्देश दिए गए कि वे बंदोबस्त करें और जनता को इस बात के लिए राजी करें कि अब बीस वर्षों के बाद बंदोबस्त हुआ करेंगे, किंतु कुमाऊँ में जनता के द्वारा इसका विरोध किया गया, फलस्वरूप बंदोबस्त का कार्य स्थगित कर दिया गया।


    नवाँ बंदोबस्त सन् 1842 से 1846


    कुमाऊँ का नवाँ बंदोबस्त बेटन के द्वारा किया गया। इस बंदोबस्त की अवधि बीस वर्ष के लिए निर्धारित की गई। इसमें आसामीवार फॉट बनी तथा फॉओं में हिस्सेदारों तथा खायकरों के हिस्सों का उल्लेख किया गया और इनपर रकम भी निर्धारित की गई। इस बंदोबस्त में जिले के लिए राजस्व की राशि एक लाख उनतीस हजार सात सौ पैंसठ रूपए प्रति साल निर्धारित कर दी गई। बेटन ने इस बंदोबस्त में प्रत्येक हिस्सेदार, खायकर, सिरतान के लिए नियमों का निर्धारण किया तथा जंगलों में हक कायम किए। सयानाचरी, थोकदारी तथा हिस्सेदारी के दस्तूर कायम किए। इस बंदोबस्त के बाद ग्राम की सीमाओं के निर्धारण का यह दूसरा प्रयास था। बाद में ग्रामों की सीमाओं संबंधी विवादों के निस्तारण में चकनामे महत्वपूर्ण अभिलेख के रूप में काम आने लगे।

    badobast2


    दसवाँ बंदोबस्त सन् 1863 से 1873


    कुमाऊँ का दसवाँ बंदोबस्त विकेट द्वारा सन् 1863 से 1873 के मध्य किया गया। इसी कारण इस बंदोबस्त को ‘विकेट बंदोबस्त’ के नाम से जाना जाता है। इस बंदोबस्त को कुमाऊँ के प्रथम वैज्ञानिक बंदोबस्त में प्रत्येक ग्राम की कृषि भूमि को बीस गज की डोरी से नापा गया तथा प्रत्येक ग्राम के नक्शे, खसरे, परचे बनाए गए। इस बंदोबस्त में कर निर्धारण के लिए क्षेत्र में ही भूमि को चार वर्गों-तलाऊँ, उपराऊँ, अव्वल उपराऊँ, दोयम तथा इजरान या कटील में विभाजित किया गया तथा इनकी जरब नालियाँ बनाई गईं। जरब नाली बनाने के लिए बीस नाली दोयम भूमि की एक जरब बीसी, बीस नाली अव्वल को डेढ़ जरब बीसी, बीस नाली तलाऊँ को तीन जरब बीसी तथा बीसी तथा बीस नाली इजरान या कटील को आधा जरब बीसी निर्धारण किया गया। इस प्रकार भूमि की यूनिट का निर्धारण कर दिया गया। ग्राम की कुल भूमि, जिस पर रकम लगाई जानी थी, को उपराऊँ दोयम की इकाई में परिवर्तित किया गया और उस पर मालगुजारी निर्धारित कर दी गई। मालगुजारी की औसत दर एक रूपए प्रति जरब बीसी में तय की गई। इस प्रकार गाँव की कुल मालगुजारी तय हो गई।


    विकेट के द्वारा गाँव की काश्त भूमि के अलावा उस भूमि को भी नपवाया गया, जो दोयम बंदोबस्त काश्त में नहीं पाई गई थी; किंतु निकट भविष्य में जिसके काश्त में आने की संभावना थी। इस प्रकार की भूमि को काश्त में सम्मिलित कर दिया गया, किंतु उस पर रकम निर्धारित नहीं की गई। इस भमि को बेपड़त भूमि कहा गया। इस बंदोबस्त में प्रत्येक ग्राम की आर्थिक एवं अन्य परिस्थितियों को देखते हुए ग्राम की दरें निर्धारित की गईं। उपर्युक्त के अतिरिक्त खातेदारों पर मालगुजार को रकम वसूल करने का कार्य सौंपा गया। मालगुजारी वसूल करने के लिए उसे दस्तूर मिलता था। ‘सेस’ को सार्वजनिक कार्यों में लगाया जाता था। इस बंदोबस्त को करने में तीन लाख रूपए व्यय हुए तथा सरकार को राजस्व के रूप में दो लाख पचास हजार दो सौ चौंसठ रूपए की आय हुई।


    ग्यारहवाँ बंदोबस्त सन् 1899 से 1902


    कुमाऊँ का ग्यारहवाँ बंदोबस्त सन् 1899 से 1902 तक श्री गूज के द्वारा करवाया गया था, इसलिए इसे ‘गूज बंदोबस्त’ के नाम से भी जाना जाता है। इस बंदोबस्त में सिर्फ उसी रकबे को नापा गया, जिसे विकेट बंदोबस्त में काश्त करने के बाद नापा नहीं जा सका था। उल्लेखनीय है कि विकेट बंदोबस्त में बढे़ हुए खेतों को लाल स्याही से अंकित कर दिया गया था तथा इस बढ़ी हुई काश्त पर विकेट बंदोबस्त में प्रति जरब बीसी की दर से ही मालगुजारी निकाली गई। इसके बाद गाँव की कृषि योग्य भूमि में सुधार तथा जमीन की कीमत की वृद्धि पर गौर किया गया। प्रत्येक ग्राम की मालगुजारी में वृद्धि की गई तथा इसे सुधार के लिए की गई वृद्धि कहा गया। इसका प्रतिशत हर ग्राम की परिस्थिति के अनुसार रखा गया। गूज बंदोबस्त के बाद मालगुजारी में 22.47 प्रतिशत की वृद्धि हो गई। गूँज बंदोबस्त के पश्चात मालगुजारी दो लाख सड़सठ हजार पाँच सौ उनसठ हो गई। गूज बंदोबस्त में नापे गए रकबे का अलग खसरा व मुंतखीब तैयार की गई; विकेट बंदोबस्त में तैयार की गई फॉट को दुरूस्त किया गया और इसमें गूंज बंदोबस्त का नया रकबा भी जोड़ दिया गया।



    लेखक -प्रफुल्ल चंद्र पंत

    सर्वाधिकार - स्मारिका, कुमाऊँ महोत्सव - 2000

    Leave A Comment ?