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    नीलू कठायत | नीलू कठैत

    narendrashah

    ‌नीलू कठैत (1431-1476): कयरोली, चम्पावत, जिला चम्पावत। अपूर्व शौर्यवान, राजभक्त, देशप्रेमी, कुमाऊँ नरेश ज्ञानचन्द के सेनापति। 1410 का साल। भारत में तुगलक साम्राज्य उत्कर्ष की चरम सीमा में पहुंचकर पतनोन्मुख हो चुका था। फिरोजशाह तुगलक की मृत्यु हो चुकी थी। विश्व विजेता तैमूरलंग की तुर्की सेना ने देहली लूट ली थी। एक लाख से भी अधिक कैदियों की नृशंस हत्या हो चुकी थी। समस्त उत्तरी भारत में अव्यवस्था, अराजकता, अकाल, महामारी का प्रकोप था। संभल के सूबेदार ने तराई-भाबर पर अधिकार कर कुमाऊँ का उपजाऊ क्षेत्र 'मधुवा की माल' हथिया लिया था। 'मधुवा की माल' तराई का प्रान्त था। उस समय गरुड़ ज्ञान चन्द चम्पावत के राजसिंहासन पर विराजमान थे। उत्तरायणी की संक्रांति के दूसरे दिन राजबुंग में दरबार लगा। कार्की, तड़ागी, महर, कठ, कठायत, ढेक, बरायत, महर, फड़त्याल दलों के सभी बूढ़े, सयाने, थोकदार, पधान और प्रमुख चौथानी ब्राह्मणों के मुखिया राज दरबार में बुलाए गए। पर्वतीय जनता के लिए जीवन-मरण का प्रश्न था। दरबार में बैकुण्ठ चतुर्वेदी ने राजा को मध्य माल में कृषकों के ऊपर हुए अत्याचारों का पूरा विवरण दिया। नवाब के सैनिकों ने बड़ी निर्दयता से स्त्रियों को, बच्चों, बूढ़ों और अपाहिजों को तलवार से मौत के घाट उतार दिया था। राजा ज्ञानचन्द ने उपस्थित दरबारियों और सामन्तों की ओर दृष्टि फेरी। पूछा कि राज्य में है कोई ऐसा वीर, साहसी पुरुष जो माल से यवन सेना को भगा सके। राजा के मुंह लगे एक दरबारी कमलेख के जस्सा ने कहा- “नीलू कठैत ही ऐसा वीर और शक्तिशाली है जो इस कठिन कार्य को कर सकता है।" नीलू कठैत को उसके गांव कयरोली से बुलाकर दरबार में पेश किया गया। राजा ने नीलू का स्वागत किया और दूसरे दिन उसे सेना के साथ तल्ला देश यवन सेना का मुकाबला करने रवाना कर दिया।


    ‌तल्ला देश में कूर्माचली सेना ने चारों दिशाओं से यवन सेना पर आक्रमण कर दिया। दोनों सेनाओं के मध्य भयंकर युद्ध हुआ। प्रतिशोध के लिए बावले कुम्मैयों ने भीषण मार काट की। धनुष बाण, खाड़ा, कटार, खुकरी, तलवार, पेशकब्ज, रामचंगी का खुलकर प्रयोग किया। यवन सेना पराजित हुई और मैदान छोड़कर संभल की ओर भागी। विजय प्राप्त कर नीलू चम्पावत लौटे। सारी प्रजा ने विजेता का हार्दिक स्वागत किया। राज दरबार में राजा ज्ञानचन्द ने उन्हें कुम्मैया सरोपा से विभूषित किया। पाग, दुशाला, तलवार उपहार में दिए। यह खिदमत असाध्य रण वीरों को ही राज दरबार से दी जाती थी। तीन गाँव माल में और बारह ज्यूला भूमि ध्यानिरो में रौत में दी। नीलू को राज दरबार में बख्शी का पद मिला। वह सेनापति बनाए गए।


    ‌नीलू के इस असाधारण सम्मान से जस्सा कमलेखी जल भुन गया। वह नीलू को नीचा दिखाने के लिए हर सम्भव उपाय सोचने लगा। राजा ज्ञानचन्द चाहते थे कि 'माल' की स्थिति सुधरे; इसके लिए वहां एक योग्य अधिकारी को भेजना चाहते थे। जस्सा कमलेखी ने नीलू कठैत के नाम का सुझाव दिया, और राजा मान गए। राजा का यह आदेश पाकर नीलू सिंह कठैत क्रोध से जल भुन गया। उसे आदेश था कि वह बारहों महीने 'माल' में ही रहेगा। जस्सा कमलेखी जानता था कि नीलू ‘माल' नहीं जाएगा। और ऐसी स्थिति में तब राजा उससे रुष्ट हो जायेगा। और यदि वह 'माल' चला ही गया तो वहां ज्वर (मलेरिया) से मर जाएगा। गुस्से में तमतमाया नीलू साधारण पोशाक में ही राजदरबार में पहुंचा। नीलू के दरबारी पोशाक पहिने बिना राजा के सामने पहुंचने पर राजा नाराज हो गए और उसकी ढोक (अभिवादन) स्वीकार नहीं की। माल के विजेता का यह घोर अपमान था। निराश नीलू कयरोली लौट आया। बुरा समय नीलू का इन्तजार कर रहा था। एक दिन नीलू के दो अवयस्क पुत्र सजू और बीरों अपने मामा के घर चम्पावत आ रहे थे। दुर्भाग्यवश दोनों बालक जस्सा के हाथ लग गए। उन्हें बन्दी बना दिया गया। अगले दिन बात फैला दी कि नीलू महरों से मिलकर राजा के खिलाफ षड़यंत्र रच रहा है। राजा नीलू से अप्रसन्न तो थे ही; षड़यंत्र की बात ने आहुति में घी का काम किया। राजा ने तुरन्त आदेश दिया कि दोनों बालकों को अन्धा कर उन्हें आजन्म कारावास की सजा दे दी जाय।


    ‌दुष्टता, कुटिलता, मक्कारी और क्रूरता भरे राजा के इस निर्णय से नीलू कठैत भयंकर प्रतिशोध की ज्वाला से आग बबूला हो गया। महरों और अपने इष्ट मित्रों की एक विशाल सेना लेकर उसने चम्पावत पर चढ़ाई कर दी। जस्सा और उसके गांव के सभी लोग गाजर मूली की तरह काट दिए गए। राजा को प्राण दान दे दिया नीलू ने। राजा ने नीलू को उसके सारे अधिकार लौटा दिए और उसे पुनः बख्शी का पद दे दिया। यह सब ऊपरी दिखावा था। भीतर ही भीतर उसे मारने का षड़यंत्र चल रहा था। कहते हैं- “पुरुष बली नहीं होत है, समय होत बलवान।" एक दिन रात्रि के समय राजबुंग से अपने घर जाते भाड़े के हत्यारों ने उसे घेर लिया और तलवार से मौत के घाट उतार दिया। राजभक्त नीलू कठैत, माल का विजेता, अप्रतिम योद्धा का ऐसा करुण अन्त- कुमाऊँ के इतिहास में अपने शौर्य की गाथा कहता रहेगा (कूर्मान्चल गौरव गाथा- ले. श्री नित्यानन्द मिश्र)।

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