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    कर्णावती रानी

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    Karnavati

    ‌कर्णावती- रानी (निधनः सत्रहवीं शताब्दी का मध्य): गढ़वाल के राजा महीपति शाह (निधनः जुलाई, 1631) की रानी। गढ़वाल में इतिहास प्रसिद्ध वीरांगना-शिरोमणि, अदम्य साहसी और नीति कुशल रानी। राजा महीपति शाह की मृत्यु के समय उनके पुत्र युवराज पृथ्वीपति शाह की आयु मात्र 7 वर्ष थी। युवराज के बालिग होने तक रानी कर्णावती ने सम्पूर्ण राज-काज चलाया। उन दिनों दिल्ली के तख्त पर मुगल बादशाह शाहजहां विराजमान था। गढ़वाली रानी को अनुभवहीन और कमजोर शासक समझकर, गढ़वाल क्षेत्र को हथियाने की नीयत से मुगल सेना ने सरदार नजावत खाँ की अगुवाई में गढ़वाल राज्य पर आक्रमण करने का निश्चय किया। शुरू में मुगल सेना ने दूनघाटी के शेरगढ़, सन्तूरगढ़ और ननोरगढ़ के किले अपने अधिकार में कर लिए। कालसी और वैराटगढ़ को भी मुगल सेना ने हथिया कर सिरमौर (हि.प्र.) के राजा को सौंप दिए। मुगलों के आक्रमण की खबर सुनते ही रानी ने अपने सेनानायकों से परामर्श किया। तब तक मुगल सेना दून घाटी को रौंदती हुई हरिद्वार में गंगा पार के इलाके चीला, गोहरी, कुनाऊ, लक्ष्मणझूला, मोहनचट्टी के रास्ते राजधानी श्रीनगर की ओर कूच करने की तैयारियां कर चुकी थी।


    ‌ऐसी परिस्थिति में रानी कर्णावती ने बड़ी सूझबूझ और कूटनीति से काम लिया। उसने मुगल सरदार नजावत खों के पास सन्देश भिजवाया कि मैं मुगल बादशाह की अधीनता स्वीकार करती हैं। यदि दो सप्ताह की अवधि दी जाय, तो मैं दस लाख रुपया भेंट स्वरूप दे सकती हूं। इस प्रस्ताव पर खाँ ने अपनी सेना पीछे हटा ली और रुपयों की इन्तजार करने लगा। डेढ़ माह बीत जाने के बाद रानी ने केवल एक लाख रुपया भिजवाया। इस अवधि में मुगल सेना की सारी रसद समाप्त हो गयी। जहाँ कहीं भी मुगल सेना के सिपाही रसद लेने जाते, स्थानीय लोगों द्वारा लूट लिये जाते या मार दिये जाते। सारी सेना में ज्वर फैल गया। भूख और बीमारी से घिरे मुगलों को गढ़वाली सेना ने घेर लिया। युद्ध में शाही सेना के अधिकांश सैनिक मारे गये। उनके घोड़े, युद्ध सामग्री और अन्य सारा साजो सामान गढवाली सेना ने कब्जा लिया। रानी के आदेश पर बचे खुचे मुगल सिपाहियों के नाक–कान काट कर उन्हें भागने को छोड़ दिया। नजावत खाँ जान बचाकर भाग गया। दुश्मन की सेना के नाक-कान काटकर तहस-नहस कर देने की विश्व इतिहास में यह अनहोनी घटना है। रानी कणावती इतिहास में तभी से 'नाक कट्टी राणी' के नाम से विख्यात हो गई। इस अभियान की सफलता में सेनापति माधोसिंह भण्डारी और दोस्त बेग मुगल की प्रमुख भूमिका रही। जिला गढ़वाल में फतेहपुर (दुगड्डा-लैंसडौन मार्ग पर) में ही मुगल सेना का संहार हुआ था। मुगलों पर फतह के उपलक्ष्य में इस जगह का नाम फतेहपुर रखा गया। ऐसे वीर–वीरांगनाओं के हिमालयी शौर्य और साहस के कारण गढ़वाल में कभी किसी यवन के पैर नहीं पड़ सके और अनादिकाल से इसकी पवित्रता बनी रही।


    ‌महारानी कर्णावती ने करणपुर (वर्तमान देहरादून का एक क्षेत्र) गाँव बसाया था। इसके अतिरिक्त राजपुर और देहरादून के मध्य जल श्रोत निकलवा कर सिंचाई की सुविधा मुहैय्या करवाई। गढ़वाल के वीरतापूर्ण इतिहास की ध्रुव नक्षत्र हैं रानी कर्णावती।

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