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    जिया रानी - कुमाऊं की लक्ष्मीबाई

    jiyarani

    उत्तराखण्ड के इतिहास में जियारानी को परम सम्मान मिला है। कत्यूरी राजवंश के अवसान के दौर में आम जनता के हितों एवं मानवीय मूल्यों की रक्षा के लिए महारानी जिया की जीवटता जग-जाहिर है। कत्यूरी शासकों के आपसी कुचक्रों के बीच महारानी जिया की दूरदर्शिता ने इतिहास को रक्तरंजित होने से बचाया था। अपने पुत्र धामदेव तथा आम जनता के लिए उसके संघर्ष और साहस की वीरकथा जियारानी के जागरों में आज भी उत्तराखण्ड के ग्रामीण जनजीवन में गूंजती है। जिया रानी उत्तराखण्ड के जनजीवन में इस कदर लोकप्रिय हुयी कि किन्हीं इलाकों एवं जातियों में आज भी 'मां' के लिए जिया' शब्द का उच्चारण किया जाता है। जिया की प्रतिष्ठा महारानी से कहीं बढ़कर जन्मदायिनी मां के रूप में आम जनता में होना एक अतिविशिष्ट परम्परा है।


    संसाधनहीनता के कारण उत्तराखण्ड के नायक-नायिकाओं को वो स्थान नहीं मिल पाया जिसके वे पात्र थे। इसमें इतिहासकारों की कंजूसी भी शामिल है जिस प्रकार झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का नाम स्वतंत्रता संग्राम के पृष्ठों पर सुर्खियों में अंकित है, उसी प्रकार एक उत्तराखण्ड की रानी भी है। उसका नाम जिया रानी है। वह खैरागढ़ के कत्यूरी सम्राट पिथौराशाही (प्रीतमदेव या पृथ्वीपाल (1380-1400) की महारानी जिया थी। उसका नाम प्यौंला या पिंगला भी बताया जाता है। यह बात गौण है। कथनानुसार वो धामदेव ब्रह्मदेव (1400 1424) की माँ थी और प्रख्यात लोककथा नायक मालू शाही (1424-1440) की दादी।


    लिखित इतिहास न होने के कारण इतिहासकारों और अन्वेषकों ने अलग-अलग टुकड़ों को जोड़कर कुछ गाथाए तैयार की हैं। फिर भी रिक्त स्थान बहुत हैं। कोई जिया को मालव देश के राजा की पुत्री कहते हैं। मालव मध्यप्रदेश और पंजाब में दो स्थान हैं। हो सकता है कोई तब छोटा पहाड़ी राज्य मालवा रहा हो, जिसकी कन्या जिया हो। जिया को अधिकतर खाती (राजपूत) वंश की बेटी माना जाता है। वे कुमाऊँ के बड़े जुझारू राजपूत थे।


    इतिहासकारों के अनुसार सातवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में उत्तराखण्ड में कत्यूरी राज स्थापित हुआ। राहुल सांकृत्यायन तो पहले से कहते जब आदिशंकराचार्य जोशीमठ पहुंचे तो उन्होंने मठाधीश से शास्त्रार्थ का अवसर चाहा। उसमें शर्त थी, जो जीतेगा, उसकी बात दूसरे पक्ष को माननी होगी। सात दिन के घमासान शास्त्रार्थ के बाद मठाधीश हार गए। शर्त के अनुसार शंकराचार्य जी ने अयोध्या के राजा के अनुज को आमंत्रित किया उसका राज्याभिषेक किया। यह भी कहा गया है कि कत्यूर काबुल के कछोर वंशी थे। अंग्रेज पावेल प्राइस कत्यूरों को 'कुविन्द' मानता है। कार्तिकेय पर राजधानी होने के कारण वे कत्‍यूर कहलाए। कुछ कत्यूरों व शकों को कुषाणों के वंशज मानते हैं। बागेश्वर बैजनाथ की घाटी को भी वो कत्यूर घाटी कहते हैं।


    रानी मौला देई, जो इतिहास में जिया राणी के नाम से प्रसिद्ध है, का जन्म सन 1370 में राजा झहबराज पुण्डीर के घर सबसे छोटी पुत्री के रूप में हुआ था। राजा झहबराज मालवा के (खत्री) राजवंश से सम्बन्धित थे। किन्हीं कारणों से मालवा के कई राजवंशी यहां पहाड़ों में आकर बस गए। कालान्तर में झहबराज का मायापुर (हरिद्वार) क्षेत्र पर अधिकार हो गया और वे यहां के राजा कहलाए।


    इन्हीं दिनों कत्यूरी राजा प्रीतमदेव गंगा स्नान को हरिद्वार गए और वहां राजा झहबराज पुण्डीर के अतिथि बनकर ठहरे। राजा प्रीतमदेव की कई रानियां थीं, किन्तु सन्तान न होने के कारण वे दुःखी थे। किन्हीं राजनैतिक कारणों और सम्भवतः पुत्र प्राप्ति की इच्छा के वशीभूत राजा प्रीतम देव ने पुण्डीर राजा के समक्ष मौला देई से शादी का प्रस्ताव रखा। मौला देई की अवयस्क आयु के बावजूद पुण्डीर राजा प्रस्ताव को अस्वीकार न कर सके। पाणी ग्रहण संस्कार की रस्म तो पूरी कर दी गई, किन्तु राजा पिथौराशाही मौला देई को साथ नहीं ले गए और आश्वासन दे गए कि लखनपुर गढ़ से डोली आएगी, तभी रानी उसमें बैठकर मायापुर से जाएगी। लखनपुर गढ़ पहुंचकर बूढ़ा राजा रानी मौला देई को लिवाने के लिए डोला भेजना भूल गया। कुछ समय बाद महर-फड़यालों के साथ रानी लखनपुर गढ़ पहुच गई। पुत्र प्राप्ति हेतु रानी को तीर्थ यात्राएं और दान-पुण्य आदि कार्य करने पड़े। सन 1393 में रानी को एक पुत्र प्राप्त हुआ। बालक का नाम धामदेव रखा गया। इस बीच राजा प्रीतम देव वृद्ध हो गए। राज्य की देखभाल राजा के उत्तराधिकारी अवयस्क पुत्र धामदेव के नाम से सबसे छोटी रानी मौला देई करने लगी। रानी का प्रभाव बढ़ने लगा। वह अब जिया राणी कही जाने लगी। एक समय अन्य रानियों ने सौतिया बांट की बात कहकर जिया राणी को तराई–भाबर का इलाका दे दिया। बालक धामदेव की संरक्षता करते हुए रानी राज्य संचालन करती रही। एक लोकगाथा के अनुसार धामदेव ने अपने पिता प्रीतम देव की हत्या कर सिंहासन छीन लिया था। लोकगाथा में शुनपति शौका की पुत्री राजला का अपहरण करने वाले मालूशाही को धामदेव का पुत्र बताया गया है।


    सन 1418 में दिल्ली के सैय्यद (सुल्तान) की सेना कटेहर के हरीसिंह का पीछा करते हुए। तराई–भाबर तक आ पहुंची थी। जियाराणी ने हरीसिंह को अपने राज्य में शरण दी थी और शाही सेना को तराई से मार भगा कर कटेहर पर पुनः अधिकार करने में उसकी सहायता की थी। यह युद्ध भाबर में हल्द्वानी-काठगोदाम क्षेत्र में लड़ा गया था। भीषण युद्ध के बीच यवन सेना जिया राणी को रानीबाग (काठगोदाम) से पकड़ कर ले गयी। हंसा कुंवर ने रानी को कैद से छुड़ाया। संघर्ष करते रानी को कई घाव लग गए थे। कुछ दिन रानी गुप्त स्थान में छिपी रही। बाद में उसकी मृत्यु हो गई। इस वीरांगना की स्मृति में चित्रशिला घाट, रानीबाग में उस युग की बनी रानी की समाधि आज भी कत्यूरी युग की याद ताजा कराती है। कहते हैं, राणी जिया ने अपने राज्य में प्रत्येक वयस्क अवयस्क को तलवार चलाने की प्रेरणा दी थी।


    जिया पहली भारतीय रानी थी, जो अपनी इज्जत की खातिर बलिदानी बनी। इतिहासकारों ने जिया को वह स्थान नहीं दिया जिसको वह अधिकारी थी। मांग भी उठी उसे लक्ष्मीबाई के समकक्ष माना जाये, ये राजनीति है।


    प्रतिवर्ष संक्रांति 14 जनवरी को उत्तरायणी चित्रशिला में सैकडों परिवार, ग्रामवासी आते हैं। जागर लगाते हैं। सारे दिन, सारी रात जैजिया, जिया के स्वर गूंजते हैं। जिया को पूजते हैं। जिया कुमाऊँ की जनदेवी, न्याय की देवी बन गयी है। गाँव-गाँव कई परिवारों में चैत्र और अश्विन की नवरात्रियों में जागर (जागरण) जिसमें प्रशस्ति गायी जाती है, ढोल-ढमके बजाकर देवी-देवता अवतरित होते हैं, जागर लगायी जाती है। अब जिया कुमाऊँ की झांस्कृतिक विरासत बन गयी है।


    संदर्भ

    1- पुरवासी - 2015, श्री लक्ष्मी भण्डार (हुक्का क्लब), अल्मोड़ा | लेखक - डॉ० अरुण कुकसाल, जी.के. प्लाजा, श्रीकोट, श्रीनगर (गढ़वाल)

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