KnowledgeBase

    ऊखल - पुरातत्व के नये आयाम

    Read This Article in Hindi/ English/ Kumauni/ Garwali

    प्राकृतिक चट्टानों, शिला खण्डों और शिला-पट्टों (पटालों) में विभिन्न प्रकार के धंसाव अज्ञात अतीत से बनाये जाते रहे हैं। पुराविद् इनको “कप-मार्क/क्युपुले” (Cup-mark/ Cupile) नाम से पहचानते हैं। चूंकि इनका सबसे लोक प्रिय आकार "ऊखल" सदृश है, अतः उत्तराखण्ड के पुरातत्व में इनको "ऊखल" कहा जाता है। यह उल्लेखनीय है कि कठोर से कठोर चट्टनों में विभिन्न आकार के धंसाव सारे विश्व में बनाये जाते रहे हैं, जहां मध्य ऑस्ट्रेलिया में आधुनिक युग तक वहां के आदिवासियों द्वारा इनका निर्माण किंकिरात नामक पक्षी के अण्डों के उत्पादन में वृद्धि हेतु एक अनुष्ठान के रूप में विशिष्ट चट्टानों पर किया जात रहा है, वहीं केन्या (अफ्रीका) में इनका प्रयोग "बोआ" जैसे खेल के लिये पट्ट (बोर्ड) की तरह या फिर खनिज संसाधन हेतु किया जाता है।


    भारतीय पुरातत्व में धंसाव अलग-अलग सन्दर्भों में प्राप्त होते हैं। उदाहरणार्थ, कशमीर घाटी के "बुर्ज होम" नामक पुरास्थल में इनका संबंध नवाश्म-महश्म संस्कृतियों के संचरण काल, विदर्भ में महाश्म, और दक्षिण भारत में नवाश्म संस्कृतियों के साथ पाया गया है, जो कि वर्तमान से 5 से 3 हजार वर्ष पूर्व प्राचीन हैं। यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि हाल में ही मध्य भारत स्थित डरकी-चट्टान एवं भीम बेटका (मध्य प्रदेश) के "ऑडीटेरिअम केव" उत्खनन के परिणाम स्वरूप पुरापाषाण कला के प्रकाण्ड विद्वान प्रो. बेडनारिक ने अकाट्य साक्ष्यों के आधार पर यह सुझाया है कि कम से कम मध्य भारत में पाये गये उपरोक्त स्थलों में विद्यमान "ऊखल" मध्य प्लीस्टोसीन भूगर्भीय युग के हैं। यह कि "पूर्व पाषाण अशुलियन संस्कृति" जो कि भारत में 2,00,000 से 1,50,000 वर्ष तक प्राचीन है, से कहीं अधिक पूर्व काल के हैं। प्रो. बेडनारिक का यह कथन महत्वपूर्ण है कि जहां अफ्रीका "मानव" प्रजाति के विकास का पालना था तो दक्षिण एशिया (भारतीय उपमहाद्वीप) मानव की विशिष्ट पहचान बनाने वाले तत्वों, मानव के स्वयं के आत्मबोध, और तकनीकी कुशलता के प्रारंभिक विकास का रंगमंच रहा और मध्य प्रदेश के सन्दर्भित "ऊखल" विश्व के प्राचीनतम पाषाण कला के उदाहरणों में से हैं।


    अज्ञात अतीत में "ऊखलों" के रचयिता उत्तराखण्ड में सर्वत्र विचरण करते रहे हैं, अतः यहां के पुरातत्व में इनका विशेष महत्व है। इनके विषय में प्राचीनतम ज्ञाता लेख 1854 ई. हेनवुड नामक लेखक ने प्रकाशित किया, जो की देवीधुरा (चंपावत जिला) में विद्यमान धंसावों पर आधारित था। कालान्तर में कुमाऊँ के विभिन्न स्थानों, विशेषकर द्वाराहाट और सोमेश्वर क्षेत्र में स्थित विभिन्न प्रकार के "ऊखल" एवं अन्य अभिप्रायों पर एक वृहत् लेख कार्नक नामक पुराविद् ने 1877 में प्रकाशित किया, जिसमें यह तथ्य भी उजागर हुआ कि इस प्रकार के पुरावशेष यूरोप में भी विद्यमान हैं। इसके उपरान्त 1970 के दशक में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पूर्व महानिदेशक स्व. श्री मुनीश चन्द्र जोशी जी ने देवीधुरा पुरास्थल का पुनः निरीक्षण कर विभिन्न प्रकार के धंसावों के विद्यमान होने की पुष्टि की। इसके उपरान्त प्रस्तुत लेखक ने कुमाऊं-गढ़वाल के कई पुरास्थलों का सर्वेक्षण कर इन धंसावों और उन से संबंधित अन्य पुरावशेषों पर 1980 के दशक में दो शोध पत्र प्रकाशित किये। इसके उपरान्त पद्म श्री डॉ. यशोधर मठपाल और लगभग समान समय में 1990 के दशक में डॉ. डी.पी. अग्रवाल और उनके सहयोगियों ने उपरोक्त पुरावशेषों पर शोध कार्य प्रकाशित किये।


    जैसा कि पूर्व में कहा जा चुका है, धंसाव विभिन्न-प्रकार के होते है, तदनुसार मैंने धंसाव उत्तराखण्ड में प्राप्त धंसावों को सात श्रेणियों में बांटा है, जिनमें सबसे वृहत आकार के धंसाव आवास हेतु बनाये गये प्रतीत होते हैं। बगवाली पोखर स्थित एक धंसाव में कई वर्ष पूर्व एक भैंस गिर गई थी। शेष छह प्रकार के धंसाव लगभग 0.5 से 27 से.मी. व्यास के तथा कुछ अन्य चतुर्भुजाकार और कुछ अन्य ज्यामितीय या वनस्पतीय या प्राणि समूह सदृश आकार में उत्कीर्ण मिलते हैं। आम प्रकार के आकार में 0.3 से 55 से.मी. गहरे एवं 09 से 27 से.मी. व्यास के पाये जाते हैं जो कि "कप मार्क" के नाम से विख्यात हैं और स्थानीय लोग इन्हें "ऊखल" कहते हैं।


    यद्यपि धंसाव उत्तराखण्ड में सर्वत्र प्राप्त होते हैं परन्तु उनका संकेन्द्रण क्षेत्र, अब तक ज्ञात सर्वेक्षण रपटों के आधार पर, अल्मोंड़ा के आस-पास "खस-पर्जा" में प्रतीत होता है। अल्मोड़ा नगर की स्थापना के विषय में एक लोकप्रिय किवंदती है कि यहां चंद्र नरेश कल्याण चन्द्र आखेट हेतु आया था और उसने देखा कि झाड़ी में घुंसते ही एक शशक व्याघ्र के रूप में परिवर्तित हो गया। इसकी वास्तविकता का आंकलन नहीं करते हुए, यह निष्कर्ष तो निकला जा सकता है कि 16वीं ईसवी सदी तक अल्मोड़ा में प्रचुर आखेट उपलब्ध था। चूंकि वर्तमान में अल्मोड़ा नगर के चप्पे-चप्पे में निर्माण कार्य हो चुका है। अतः इसके मूल स्वरूप को नहीं देखा जा सकता। परन्मु छावनी क्षेत्र में प्राकृतिक संरचना आंशिक रूप में विद्यमान है। अतः यहां वर्तमान में भी जिलाधिकारी आवास के निकट दक्षिण की और “ऊखल “ विद्यमान है। प्रस्तुत लेखक ने कलमटिया, डीनापानी, चितई, जसकोट, चौमू क्षेत्र में भारी संख्या में विभिन्न प्रकार के धंसावों को खोजा है। इनमें सबसे महत्वपूर्ण स्थल जसकोट है, जिसकी सूचना मुझे 1977 में स्नातक कक्षा में छात्र डी.एन.तिवाड़ी ने दी थी जो वर्तमान में राज्य संग्रहाल पिथौरागढ़ में संग्रहपाल हैं। आगे स्पष्ट किया जायेगा कि "ऊखल" का आदिम आखेट प्रणाली से गहरा संबंध है।


    उत्तराखण्ड में धंसाव बहुधा वीहड़ वनाच्छदित पहाड़ों या फिर धाटियों में प्राप्त होते हैं। डॉ. मठपाल ने नौलागांव के समीप स्थित एक पटाल में एक साथ "73 कपमार्क खुदे" होने की सूचना दी। यह पटाल एक शवाधान स्थल में प्रयुक्त की गई थी। इसी प्रकार कफड़ा में एक "मेनहिर" (अनगढ़ प्रस्थर स्मारक स्तम्भ) में दीपक सदृश धंसावों को काफी अधिक संख्या में उत्कीर्ण किया गया है। कत्यूर घाटी में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के प्रागैतिहास शाखा के पुराविद डॉ. ए. के शर्मा ने भी एक शवाधान के निकट "कप मार्क्स" पाये जिन्हें वे “पोस्ट होल्स “ (स्तंभ को खड़ा रखने के लिये बनाये गये गर्त) के रूप में पहचाने हैं। उक्त उदाहरण स्पष्ट करते हैं कि धंसावों का संबंध अवश्यमेव मृतक संस्कार से रहा है। इस सन्दर्भ में "ला फरासी", फ्रान्स में पाये गये एक महत्वपूर्ण साक्ष्य निएंडरथल मानव की समाधि है जिसको एक पटाल से ढका गया है। इस पटाल का वह भाग जो कि शव की ओर किया गया है में भी 18 क्युपुले (Cupules) पाये गये। प्रो. बेडनारिक ने इस शवाघान को लगभग सत्तर से चालीस हजार वर्ष पूर्व आंका है। इससे स्पष्ट होता है कि धंसाव अति प्राचीन काल में मानव द्वारा शवघान से संबंधित कर्मकाण्ड में प्रयोग किये जाते रहे हैं।


    डॉ. बेडनारिक ने धंसावों को मानव कला की प्राचीनतम ज्ञात घरोहर ठहाराया है और यह भी सुझाया है कि इनका प्रतीकात्मक पहलू भी है जो कि सन्देश सम्प्रेषध हेतु प्रयोग किया जाता रहा होगा। पुराविद यह स्वीकारते हैं कि उनके वर्तमान ज्ञान से सुदूर अतीत के मानव का मन्तव्य/संदेश जो कि प्रागैतिहासिक पुराकलावशेषों में प्रकट किया गया था, ज्ञात नहीं किया जा सकता हैं। इस सन्द्रर्भ में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जिन्हें आज हम पुराकला के रूप में पहचानते हैं क्या मूलतः प्रागैतिहासिक मानव ने उसकी रचना एक कलाकृति के रूप में की थी? मैं समझता हूँ कि इस प्रश्न का आंशिक उत्तर इन पुरावशेषों के कार्यमूलक उपयोगिता में ढूंढा जा सकता है।


    नृजाति साक्ष्य दर्शाते हैं कि आदिम आखेट प्रणाली में आखेटक उन स्थानों को चिन्हत कर लेते हैं जहां स्थित चट्टानों को जंगली पशु चाटते हैं क्योंकि इनमें प्राकृतिक खनिज लवण होते हैं। इस बात की प्रबल संभावना है कि प्रागैतिहासिक मानव ने प्रारम्भ में "ऊखल" सदृश धंसावों का निर्माण इस आशय से किया कि वह इनमें पानी, अवसादक, चारा या मूत्र रखकर आखेट को आकर्षित करते होंगे। इस प्रकार प्रारम्भ में इन धंसावों का निर्माण पात्र के रूप में किया गया होगा। इस सन्दर्भ में यह उल्लेखनीय है कि वर्तमान में ऐसे पालतू पशु जिनकी उपयोगिता समाप्त हो जाती है स्वतंत्र छोड़ दिये जाते हैं। ये पशु यत्र तत्र नगरों में मानव मूत्र पीते हुए देखे जा सकते हैं। इसी प्रकार पक्षियों को दाना और पानी देने के लिये घर-घर में ऊंचे खुले स्थानों में मिट्टी के गोलाकार पात्र रखे दिखाई देते हैं। मृद भाण्डों के आविष्कार से पूर्व मृत व्यक्ति के शव के साथ रखे पटाले में उकेरे गये धंसाव पात्रों के प्रतीक ही प्रतीत होते हैं जैसा कि "ला फरासी" फ्रांस के उदाहरण से स्पष्ट है। कालानतर में पात्रों के आविष्कार के उपरान्त भी यह परंमरा जीवित रही जैसा कि नौलागांव (अल्मोड़ा जिला) के उदाहरण में देखा जा सकता है।


    यह प्रशन उठना स्वाभाविक है कि उत्तराखण्ड के धंसाव कितने प्राचीन है? अन्यत्र मैने सुझाया था कि बीहड़ जंगली पहाड़ों में पाये जाने वाले "ऊखल" मानव गतिविधि के उस काल के हैं जब वह आखेटक-संग्रहक था और घाटी में जाने वाले अन्न उत्पादन काल के इस लेख में मैंने इनका वर्णन मृतक संस्कार के सन्दर्भ में किया था। इस बीच हिमालय क्षेत्र में कई स्थानों में अति महत्वपूर्ण प्रागैतिहासिक अवशेष प्राप्त हो चुके हैं। पाकिस्तान के पोटवार क्षेत्र में "खिट" नामक स्थल से लगभग 24 लाख वर्ष प्राचीन और जम्मू-कश्मीर (भारत) के "उत्तरबेणी" नामक स्थल से लगभग 28 से 5 लाख वर्ष प्राचीन पुरापाषाण उपकरण प्राप्त हो चुके हैं जो कि विश्व के प्राचीनतम उदाहरणों में गिने जाते हैं। इसी के साथ-साथ पश्चिमी हिमालय की शिवालिक श्रेणी में मानवसम बन्दर प्रजाति “शिवापिथेकस - रामपिथेकस “ के अश्मीभूत अवशेष रामनगर द्रोणी (जम्मू-कश्मीर), हरितल्यंगर, रनिताल, डेरा गोपीपुर क्षेत्र (हरियाणा), और कालागढ़ द्रोणी (उत्तराखण्ड) एवं पूर्व की ओर नेपाल में बुटवाल के समीप तिनौखोला में प्राप्त हो चुके हैं। विद्वानों का एक वर्ग मानव प्रजाति के विकास में "रामापिथेकस" को एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखता है। रामापिथेकस का विचरण काल 95 से 70 लाख वर्ष पूर्व आंका गया है। इस प्रकार उत्तराखण्ड में इन मानवसम प्रजातियों के अवशेष मिलने से मानव प्रजाति के विकास के चरण विद्यमान हैं। मानव प्रजाति के प्रचीनतम उपकरणों में लोहों में निर्मित भारी भरकम खंडक उपकरण (Chopping loots) देहरादून के कई स्थलों में खोजे गये हैं। निःसन्देह उत्तराखण्ड मानव संस्कृति के विकास को खोजने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है। इसी पृष्ठ भूति के साथ क्या यह सुझाया जा सकता है कि कुछ स्थानीय "ऊखल" अज्ञात अतीत में भीम बेटका और डरकी-चट्टान की तरह लाखों वर्ष पूर्व मानव ने आखेट को आकर्षित करने को बनाये गये हो?



    लेखक -डॉ० महेश्वर प्रसाद जोशी
    संदर्भ -
    पुरवासी - 2009, श्री लक्ष्मी भंडार (हुक्का क्लब), अल्मोड़ा, अंक : 30


    Leave A Comment ?