Folk Songs


    मुझको पहाड़ ही प्यारे हैं

    प्यारे समुद्र मैदान जिन्हें
    नित रहे उन्हें वही प्यारे
    मुझ को हिम से भरे हुए
    अपने पहाड़ ही प्यारे हैं

    पांवों पर बहती है नदिया
    करती सुतीक्ष्ण गर्जन ध्वनियां
    माथे के ऊपर चमक रहे
    नभ के चमकीले तारे हैं

    आते जब प्रिय मधु ऋतु के दिन
    गलने लगता सब और तुहिन
    उज्ज्वल आशा से भर आते
    तब क्रशतन झरने सारे हैं

    छहों में होता है कुंजन
    शाखाओ में मधुरिम गुंजन
    आँखों में आगे वनश्री के
    खुलते पट न्यारे न्यारे हैं

    छोटे छोटे खेत और
    आडू -सेबों के बागीचे
    देवदार-वन जो नभ तक
    अपना छवि जाल पसारे हैं

    मुझको तो हिम से भरे हुए
    अपने पहाड़ ही प्यारे हैं

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