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    बर्तन - रेशों द्वारा निर्मित

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    प्रकृति में बहुत से ऐसे पौधे मिलते हैं जिनके तनों और पत्तियों से रेशे निकालकर मनुष्य उनका उपयोग विभिन्न प्रकार की वस्तुओं के निर्माण में अज्ञात भूतकाल से करता आ रहा है। पर्वतीय प्रदेश में इस प्रकार के रेशेदार पौधों में भ्यौल, अल्ल, मालू तथा भाँग के तने और विशेष जाति के रामबाँस की पत्तियाँ प्रमुख हैं। मालू की एक वर्ष पुरानी बेल के रेशे तो सरलता से निकाले जा सकते हैं लेकिन भाँग, अल्ल आदि के तनों और रामबाँस की पत्तियों को आठदस दिनों तक पानी में भिगोये रखने के बाद उनसे रेशे निकाले जाते हैं। इन रेशों से ग्रामीण जीवन के उपयोग में आने वाली अनेक वस्तुओं के निर्माण के लिए विभिन्न मोटाई और लम्बाई की डोरियाँ बनाई जाती हैं। इन डोरियों से मोटी-पतली रस्सियाँ बनाई जाती हैं जो बोझ ढोने, घास-लकड़ी आदि के गट्ठर बाँधने के अतिरिक्त पशुओं को बाँधने के 'गल्र्यूँ-गालड़', उनके गले में घण्टियों को लटकाने के 'डोरे', बोझा इधर-उधर ले जाते समय रस्सी के सिरे पर सिर पर लगाये जाने वाले 'लम्याला' आदि बनाने में किया जाता है। पतली डोरियों को जाल के आकार में बुनकर पशुओं के मुंह पर लगाये जानेवाले 'म्‍वाला' और वस्त्रादि को रखने के लिए जालीदार 'कख्याला' भी बनाये जाते हैं। 'बाब्यौ' नामक घास की पतली, लम्बी और मजबूत पत्तियों से भी रस्सियाँ तथा अन्य समान प्रकार की वस्तुयें बनाई जाती हैं। इस घास की पत्तियों तथा धान के सूखे पुवाल से बिछाने के लिए 'फीने' भी बनाये जाते हैं जो गद्दों के स्थान पर उपयोग में लाये जाते हैं।


    कुछ वर्षों पहले तक भाँग के तने से निकाले गये रेशों से पतले तागे के समान डोरियाँ बनाकर उनसे वस्त्र बनाये जाते थे। ऐसे वस्त्रों को बनाने का उद्योग गंगोली के बोरानी क्षेत्र और पश्चिमी नेपाल के क्षेत्र में अधिक था। भाँग के रेशों से बनाये जाने वाले इन 'कपड़ों' से नेपाल के लोग तो तन ढकने के लिए 'गादा' भी बनाते थे लेकन बोरानी के लोग इस 'कपड़े' से छोटे-बड़े थैले ही बनाते थे। इस कपड़े से बनाये गये बड़े थैलों को 'कोथला' कहा जाता था। प्राय: 'कोथले' पचास किलो से लेकर एक क्विन्टल तक की धारिता वाले बनाये जाते थे। इन 'कोथलों का उपयोग खेत-खलिहानों से अनाजों को लाने में किया जाता था।


    पहाड़ों के शिखरवनों में बांस की प्रजाति का एक पौधा पाया जाता है जो बाँस की अपेक्षा पतला और बारह-पन्द्रह फीट तक ऊंचा होता है। इसे 'निडाला' या रिंगाल के नाम से जाना जाता है। इसके तने को चीरकर लम्बे-लम्बे 'चोये' निकाले जाते हैं। इन 'चोयों' को बुनकर अनेक प्रकार के छोटे-बड़े बरतन तथा अन्य उपयोगी उपकरण जाते हैं जिनको आकार प्रकार के बनाये आधार पर विभिन्न नाम दिये गये हैं। पाँच से लेकर आठ-नौ फीट वर्ग की चटाइयाँ जिनको 'मोस्टा' कहा जाता है, फर्श में बिछाने, अधिक मात्रा में अनाज सुखाने और धान की भंड़ाई में प्रयुक्त किये जाते हैं। थाली के आकार के तीन-चार फीट व्यास वाले 'थलिया' तथा 'सुप्पों' (सूप) में कम मात्रा में अनाजादि सुखाये जाते हैं। सुष्पों से अनाजादि से कूड़ा-करकट अलग करने का काम भी लिया जाता है। अनाजादि को रखने के लिए चौड़े मुंह और आकार में छोटी 'छापरी' (टोकरी) और बड़े आकार के 'डाली' (डलिया) में कम दिनोंं के लिए ही अनाजों का भण्डारण किया जाता है। दोहरी दीवार की विशिष्ट बनावट की छोटी टोकरी 'सोजो' कहलाती है जिसका उपयोग रोटी-पूरी आदि को रखने में किया जाता है। उच्च जाति के ब्राह्मणों के अतिरिक्त अन्य वर्गों के लोग ही इनको प्रयोग में लाते हैं। अनाजों के अधिक समय के लिए भण्डारण करने हेतु सैंकरे मुंह वाले 'गड्याले' और 'पुतकों का उपयोग होता है। आकार में 'गड्याले' अपेक्षाकृत छोटे और 'पुतके' बड़े होते हैं। कुछ 'पुतके' तो इतने बड़े बनते हैं जिनमें आठदस क्विन्टल तक अनाज भण्डारित किया जा सकता है।


    अनाजों के भण्डारक बरतनों के अतिरिक्त अनेक दैनिक उपयोग की वस्तुओं का निर्माण भी 'निङाले' के 'चोयों द्वारा किया जाता है, जिनमें वस्त्राभूषण रखने की पिटारियाँ, खाद आदि ढोने के 'डोके', अनाज-दाल आदि की नाप-पाल करने वाले 'नाली-माना' प्रमुख हैं। सोर में एक नाली की धारिता लगभग सवा किलोग्राम होती है और एक 'नाली' की धारिता चार 'माना' के बराबर होती है। 'निङाल' से बनाये जाने वाले उपरोक्त भण्डारकों तथा अन्य उपकरणों में 'डोका','मोस्टा' और 'सोजा' को छोड़कर शेष सभी को गोबर-मिट्टी से लीप कर उपयोग में लाया जाता है।

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