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    पहाड़ी भानकुन

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    मध्य हिमालय की ऊपरी उपत्यका की विषम भौगोलिक परिस्थितियाँ वहाँ के जन-जीवन को कर्मठ, जिजीविषा एवं संधर्षमय तो बनाती ही हैं साथ ही वहाँ की लोक संस्कृति, परम्पराओं एवं मान्यताओं को भी वैविध्यता एवं विशिष्टतता भी प्रदान करती हैं। लोक नृत्य-गीतों, धिगाड़ों (परिधानों) जिंवरों (आभूषणों) की तरह बर्तन भी वहां के लोकजीवन एवं संस्कृति के विविध आयामों को समेटे हुए हैं। लोककथाओं, गीतों, आणों, (पहेलियों), कहावतों में भी बर्तनों का बखूबी वर्णन है।


    स्थानीय बोली में बर्तनों को भांण या भानकुन कहा जाता है। मोटे लोहे, तांबे, पीतल, कांसे की चादरों तथा मजबूत एवं टिकाऊ लकड़ी से बने ये भांण हांलाकि आज प्रचलन से बाहर होते जा रहे हैं और इनकी जगह एल्युमिनियम, स्टील, प्लाटिक, कांच, चीनी मिट्टी इत्यादि से हल्के व जल्दी भोजन तैयार करने वाले बर्तनों की चौल (प्रचलन) बढ़ गयी है परन्तु व्यंजनों का स्वादिष्ट एवं जायकेदार स्वाद इन नये भानकुनों में कहाँ है जो भड्डू, तबेली, तौली, बन्ड, कडै, भदेले इत्यादि भानकुनों तैयार खाने में मिलता था।


    अधिक कीमत व खास-विशेष अवसरों पर ही इन बर्तनों का प्रयोग होने के कारण निजी रूप से इन्हें कम ही खरीदा जाता। भाई-बिरादरी गण संजैत (संयुक्त) से इन बर्तनों को खरीदते और बड़े भाई (मुखिया) या उसके बताये घर में रखे जाते। जब जिसे आवश्यकता हुयी वह उन्हें ले जा सकता और फिर मॉज-मूजकर (धोकर) वही सौंप आता। कई बर्तन तो घर के बाहर आगन में ही पड़े रहते जिसे आवश्यकता हुई, ले जाता, फिर वापस वहीं रख जाता।


    गॉव के लोग भी कामकाज पर इन बर्तनों को ले जा सकते थे जिसके बदले में ईच्छानुसार पैसा इत्यादि देना होता। इस तरह से अन्य बर्तन खरीदे जाते। वैसे भी पहाड़ में परम्परा रही है कि बर्तन कभी भी खाली नहीं लौटाये जाते भले ही पानी ही क्यों न भरकर लौटाना पड़े। इसी तरह निजी बर्तनों को भी गाँव के लोग कामकाज के लिए ले जाते थे। निजी और भाई बिरादरी गणों के अलावा गांववासी भी संयुक्त रूप से इन बर्तनों को खरीदकर कामकाज में प्रयोग में लाते। समभाव, संयुक्तता एवं मेल-जोल की इससे अनूठी पहिचान और कहाँ देखने को मिलेगी।


    ये बर्तन इतने भारी होते कि एक बर्तन को उठाने के लिए तीन-चार व्यक्तियों को खपना पड़ता था। इन्हें खरीदने के लिए लोग नजदीकी बाजारों के अलावा वहाँ समय-समय पर आयोजित होने वाले कौतिकों (मेलों-ठेलों) का महीनों इंतजार करते।


    पहाड़ में कौतिकों की अनूठी परम्परा रही है। इन मेलों से लोग अपनी रोजमर्रा की जरूरत की वस्तुओं से लेकर साज-सज्जा, श्रृंगार, कृषि उपकरणों व बर्तन-भांडों की खरीद-फरोख्त करते थे। दरअसल इन्हीं मेलो-ठेलों के आयोजन से अपनी जरूरत की वस्तु खरीदने के साथ-साथ अपनी कला, संस्कृति, पहिचान को वे सहेजते थे। जरूरती वस्तुओं के क्रय-विक्रय के उपरांत भी कई दिनों तक वे मेले में नृत्य-गीतों का समां बाँधते।


    बागेश्वर का उत्तरायणी मेलाए थल मेला, जौलजीवी मेला, मासी का सोमनाथ मेला इत्यादि कई छोटे-बड़े मेलों में पहाड़ी बर्तनों की अलग ही रौनक रहती थी। स्थानीय शिल्पी सामल पत्ता बांधकर कई दिन पहले से ही इन मेलों में पहुंचकर अपने हुनुर के साथ मेलों की रौनक बढ़ाते। हर एक उत्पादक के लिए अलग-अलग बाजार लगता। उनका प्रत्येक वर्ष नियत स्थान होता। कुम्मैया भदेलों की तो समूचे पर्वतीय क्षेत्र में बड़ी मांग रहती थी जिन्हें स्थानीय लोगों के अलावा दूर-दराज इलाकों के लोग खरीदने के लिए पहुंचते थे।


    बडे-बूढ़े बताते हैं, खाने का असली आनन्द बंड, तौल, भड्डू, तबेली इत्यादि भानकुनों में तैयार खाने में मिलता था ही इसके अलावा इनका प्रयोग धार्मिक-अनुष्ठानों, खाद्य-पदार्थों के रख-रखाव व संरक्षण में भी होता था।


    भड्डू


    भड्डू आकार में गोलाई लिए व पतली गर्दन युक्त छोटा मुंह वाला बर्तन है। यह कांसे या पीतल का बना वजनी होता है। इसमें दाल व गोश्त (मीट) इत्यादि का स्वाद खूब निखर कर आता है।

    भड्डू में कच्चा खाद्य-पदार्थ कम पानी में रखकर पकाने के लिए रखा जाता है जिस पर 'स्वड़' का ढक्कन लगा होता है। स्वड़ में पानी भरा होता है जो भाप में गर्म होता है। यह पानी बीच-बीच में आवश्यकतानुसार भोजन में मिलाया जाता है। पानी डालने के लिए सनेसी प्रयोग में लाया जाता हैं।


    'स्वड़' वाला बर्तन प्राय: कांसा या पीतल का होता है।


    तौल


    तौल-तौल ताँबे की मोटी चादर का बना होता है। यह थोड़ा गहरा व अधिक चौड़ाई युक्त मुंह का होता है। इसमें लोहे या तांबे के छोटे दो मुनड़े लगे होते है जिससे इसे पकड़ने-उठाने में आसानी होती है। इस मुनड़ी तौल भी कहा जाता है। शादी-ब्याह, सामूहिक कार्यों, धार्मिक-अनुष्ठानों या अन्य अवसरों पर इन्हीं तौलों में भात (चावल) सूजी इत्यादि तैयार किये जाते हैं। इसमें पन्द्रह पसेरी तक भात एक साथ तैयार किया जा सकता है।


    तौली


    यह तौल के आकार से काफी छोटी होती है जिसमें चार-पांच सदस्यों के लिए भात, सूजी इत्यादि व्यंजन तैयार किये जा सकते हैं। व्यंजन बनाने के अलावा यह शुभ कार्यों के पर अवसर पूजा-स्थल में प्रयोग में लाया जाता है।


    बन्ड


    यह कांसे एवं पीतल मिश्रित धातु से बना आकार में गोलाई लिए वजनी होता है। इसकी पेंदी चौड़ाई युक्त व मुँह संकरा होता है इस पर दो मुनड़े भी लगे होते हैं जो एक स्थान से लाने-ले जाने में सहायक होते हैं।


    बन्ड मुख्यतया दाल बनाने के काम में लाया जाता है। इसमें मिश्रित दाल आसानी से गल जाती है। कभी-कभार यदि दाल ज्यादा बनानी हो तो दाल गलाने के उपरांत दूसरे बर्तन में उड़ेलकर छोंक लगायी जाती है। इसमें बनी दाल काफी स्वादिष्ट एवं आसानी से पाचक होती है।


    दाल के अलावा गोश्त इत्यादि जल्दी पकाने के लिए भी इसका प्रयोग होता है। इसमें एक साथ कई सौ लोगों के लिए व्यंजन तैयार किया जा सकता है।


    कस्यर


    पीतल, लोहे इत्यादि की मिश्रित धातु से बना कस्यर पानी रखने के प्रयोग में लाया जाता था। इसका तलवा चौड़ा व ऊपरी भाग संकरा होता था। इसमें रखा जल ताजा एवं स्वाजस्य्च वर्धक माना जाता है।

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