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    तराई-भाबर का इतिहास - 1

    भाबर एवं तराई के प्रान्त प्राचीनकाल से ही पर्वतीय राज्यों के अविच्छिन्न अंग रहे हैं। नेपाल, कूर्माचल, गढ़वाल एवं हिमाचल प्रदेश के ऊंचे पहाड़ों के तटवर्ती मैदानी भाग पर्वतीय कृषक की अमूल्य थाती रहे हैं। भाबर क्षेत्र औसतन 500 मीटर ऊंचा है। इसका निर्माण दक्षिण की ओर बहने वाली अनेक तीव्रगामी नदियों द्वारा तलहटी पर निक्षेपण किये बोल्डर, पत्थर, बालू आदि द्वारा हुआ है। भाबर का ढाल तीव्र है। बड़े एवं भारी पदार्थों का निक्षेपण भाबर में हुआ है। बारीक एवं सूक्ष्म पदार्थ एवं बालू तराई क्षेत्रों के निर्माण में सहायक हुए। भाबर की भूमि में पर्वतों से उतरने वाला समस्त जल प्रवाह भूमिगत हो जाता है। अतएव यहां जल अधिक गहराई में मिलता है। नहरों के निर्माण से जल के अभाव की पूर्ति हुई है। तापक्रम एवं मिट्टियों की दृष्टि से इस क्षेत्र में पहाड़ी कृषकों को सदा से उन्नत कृषि करने में मिली। इस क्षेत्र के प्रचुर वन यहां की अमूल्य प्राकृतिक संपदा हैं। तराई कूर्माचल का सबसे निचला एवं दक्षिणी क्षेत्र है। तराई में जल की प्रचुरता है। भाबर क्षेत्र में लुप्त हुआ जल तराई क्षेत्र में अपेक्षाकृत कम ऊंचाई के कारण सतह में प्रकट हो जाता है और दलदली परिस्थिति पैदा कर देता है। तापक्रम एवं उपजाऊ मिट्टी के प्रभाव से कृषि के लिए अनुकूल देश है।


    तराई का उर्वर प्रदेश कूर्माचल में मध्य देश के नाम से प्रसिद्ध था। मध्य देश का बिगड़ा रूप मधेशिया आज भी प्रयोग में आता है। इसी को मढ़ौ की माल भी कहते थे। मढ़ौ भी मध्य देश का अपभ्रंश लगता है। वैसे सर्वसाधारण इस प्रान्त को माल कहते हैं। कुछ विद्वान माल को फारसी शब्द महाल का रूपान्तर समझते हैं। यही माल कूर्माचल के इतिहास में चौरासी माल या नौलखिया माल के नाम से प्रसिद्ध रहा। चौरासी कोस लम्बा होने के कारण चौरासी माल कहलाया गया। नौ लाख रुपया लगान प्राप्त होने के कारण इस क्षेत्र का नाम नौलखिया माल प्रसिद्ध हुआ। इस नौरासी माल की सीमा पूर्व में पूरनपुर (जि. पीलीभीत) में शारदा नदी तक थी। पश्चिम में पीला नदी के पास रायपुर (जसपुर एवं रामगंगा के बीच) के निकट सीमा थी। उत्तर में भाबर की ऊखड़ भूमि थी। दक्षिण में ऊंची भूमि मैदानी भागों की (विशेषकर का कठेड़ की) थी। कूर्माचल नरेश महाराज रूद्रचन्द्र देव (1567-1597 ई.) के समय निम्नलिखित खण्ड चौरासी माल में सम्मिलित थे :
    1. सहजगीर (जसपुर का पुराना नाम)
    2. काशीपुर या कोटा (वर्तमान काशीपुर)
    3. मुंडिया (वर्तमान बाजपुर)
    4. गदरपुर
    5. बोक्सार (रुद्रपुर, किदमपुरी)
    6. बख़्शी (नानकमता)
    7. विन्की (बिल्हरी, सरबना)


    हैहय वंसी कार्तवीर्य के वंशजों ने लंबे समय तक (ईसा की लगभग चौथी सदी से दसवीं सदी तक) कूर्माचल, गढ़वाल, कठेड़ (वर्तमान रूहेलखण्ड) में राज्य किया। समुद्र गुप्त के प्रयाग वाले शिला लेख में कर्तृपुर (कार्तिकेयपुर) का उल्लेख मिलता है। एशियाटिक सोसाइटी के जर्नल में 1898 ई. में भी C.F. Oldham ने सप्रमाण यह सिद्ध किया कि कर्तृपुर वर्तमान कार्तिकेयपुर (कत्यूर) है। यहां के वैभवशाली शासकों का राज्य पश्चिम में सतलुज नदी से पूर्व में गण्डक नदी तक, उत्तर में कूर्माचल-गढ़वाल से लेकर दक्षिण में कठेड़ (रूहेलखण्ड) तक था। सम्पूर्ण तराई का भाग इस राज्य के अन्तर्गत था। 1844 में इस भाग का बंदोबस्त अंग्रेजों के शासनकाल में श्री जे.एच. बैटन द्वारा हुआ। उन्होंने एक लेख एशियाटिक सोसाइटी के जर्नल में लिखा। वे लिखते हैं : "I see no reason for doubting that the Tarai throughout its whole extent formed integral part of the Kuttoor Kumaon Raj."


    हुएन सांग वर्णित गोविषाण राज्य


    634 ई. में प्रसिद्ध चीनी यात्री हुएन-सांग थानेश्वर से शत्रुघ्न (वर्तमान सहारनपुर) होता हुआ बिजनौर के पास मडावर आया। वहां से मयूर अथवा मायापुर (हरद्वार) आया। वहां से श्रस्त्रपुर राज्य से होता हुआ गोविषाण आया। वहां से पांचाल प्रदेश में अहिच्छत्र की ओर गया। गोविषाण राज्य का पूरा वर्णन चीनी यात्री ने लिखा है। कनिंघम ने गोविषाण को वर्तमान काशीपुर के पास उझियानी (द्रोण सागर) के निकट बतलाया है। सम्पूर्ण तराई एवं जिला पीलीभीत इस राज्य के अन्तर्गत थे। श्री एटकिन्सन गोविषाण को काशीपुर से 22 मील दूर ढिकुली के पास बतलाते हैं।


    पुरातत्व संबंधी अन्वेषण के लिए तराई का प्रान्त बहुत महत्वपूर्ण है। चीनी यात्री लिखता है कि गोविषाण नगर के पास दो बौद्ध मठ थे जिनमें 100 भिक्षु हीनयान का अध्ययन करते थे। एक देव मंदिर भी था। नगर के पास बड़े मठ में अशोक का बनवाया हुआ स्तूप था। यह स्मारक सम्राट अशोक ने इसलिए बनवाया कि यहां पर भगवान बुद्ध ने स्वयं एक महीने तक धर्मोपदेश दिया। चीनी यात्री लिखता है कि नगर एक ऊंची जगह पर बसा है। इसके चारों ओर लता कुंज एवं सरोवर हैं। यहां की आबादी घनी है। लोग सीधे-सादे तथा अपरिष्कृत हैं। धर्म एवं साहित्य में उनकी रूचि है। अधिकांश लोग ब्राह्मण-धर्म का पालन करते हैं। इसी नगर के पास वह स्थान भी है जहां शाक्य मुनि से पूर्व चार बुद्ध रहते थे। इसी स्थान के पास दो और स्तूप हैं जिन में भगवान बुद्ध के नख और केश रखे हैं। उत्खनन कार्य द्वारा ही इन स्तूपों का पता लगाया जा सकता है। मडावर (बिजनौर) और अहिच्छत्र (बरेली) के बीच गोविषाण राज्य था। रामनगर के पास ढिकुली के प्राचीन अवशेष बड़े महत्वपूर्ण हैं। इसी ढिकुली का प्राचीन नाम विराट पत्तन या विराट नगर था। पश्चिम की ओर लाल ढाँक चौकी के पास पाण्डुवाल में प्राचीन नगर के अवशेष मिलते हैं। पाण्डुवाल के पास ल्यूनी सोत में प्राचीन ध्वंसावशेष हैं। नजीबाबाद से 6 मील उत्तर पूर्व में मोरध्वज का दुर्ग है जहां बौद्धकालीन अवशेष हैं। रामपुर और नैनीताल के बीच चतुर्भुज के पास जोनार तथा ककरोला नदियों की बीच की भूमि में प्राचीन अवशेष प्रचुर मात्रा में मिलते हैं। काशीपुर में उझियानी के पास मौर्य एवं कुषाण कालीन अवशेष मिले हैं। 1934 ई. में लेखक ने स्वयं इन क्षेत्रों का दौरा किया तथा इन प्राचीन अवशेषों की ओर U.P. Historical Society का ध्यान आकर्षित किया। भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा यहां कुछ स्थानों में उत्खनन कार्य किया गया। उझियानी के पास द्रोण सागर है। यह कौरव-पाण्डवों के गुरु द्रोणाचार्य का आश्रम था। ढिकुली के निकट गर्जिया चौड़ के पास सीतामढ़ी है। यहां भी प्राचीन अवशेष मिलते हैं। इन अवशेषों तथा हुएन सांग के वर्णन से ज्ञात होता है कि तराई प्रान्त में उर्वरा भूमि के कारण धन-संपदा प्रचुर मात्रा में थी। इसा की सातवीं सदी में यहां घनी आबादी थी। कृषि होती थी। लोग सीधे-सादे, धर्म-निष्ठ एवं साहित्य प्रेमी थे।


    दसवीं सदी में सूर्यवंशी कत्यूरी शासकों का वैभवसूर्य अस्त होने लगा। केन्द्रीय सत्ता क्षीण होने पर कूर्माचल एवं अन्य स्थानों में माण्डलिक सामन्तों की शक्ति बढ़ने लगी। छोटे-छोटे दुर्गों के अधिपति बनकर ये सामन्त आसपास के गांवों से लगान वसूल करने लगे। अराजक कुव्यवस्था, कुप्रबंध के कारण अशान्ति बढ़ी। तराई-भाबर के प्रान्तों में इस विषम परिस्थिति का प्रभाव बढ़ा। लहलहाते खेत अरण्य प्रदेश में परिवर्तित हो गए। यह अरण्य प्रदेश भयंकर पशु एवं दुर्दान्त दस्युओं के आश्रम स्थल बन गये।


    चन्द राज्य का उदय


    इस अराजकता के समय कूर्माचल के पूर्वी अंचल में चम्पावत के निकट एक नयी शक्ति का उदय हुआ। यह शक्ति थी प्रयाग के निकट झूस या प्रतिष्ठान पुर के चन्द्र वंशी क्षत्रियों की। इस वंश का संस्थापक सोम चन्द था। इस राजकुमार का विवाह कत्यूरी राजा वैचल देव की पुत्री से हुआ। विवाह में सोम चन्द को 15 वीसी जमीन काली कुमाऊँ में और तराई-भाबर में मढ़ौ की माल दहेज में मिली। सोमचन्द्र के वंशजों ने कूर्माचल में लगभग 1105 वर्ष तक राज्य किया। इस लम्बी अवधि में केवल 200 वर्ष सत्ता खसों के हाथ रही। किन्तु 1130 ई. के लगभग इसी वंश के वीर चन्द्र देव न कन्नौज से आकर अपने पूर्वजो का राज्य खसों से छीन लिया। इस बीच कन्नौज में बड़ी उथल-पुथल हुई। 1194 ई. में कुतुबउद्दीन ऐबक ने कन्नौज के शासक जयचन्द्र को पराजित किया। सारे अन्तर्वेद में इस्लामी राज्य स्थापित हो गया। इस उथल-पुथल के फलस्वरूप बड़ी संख्या में बैसवाड़े के ठाकुर एवं ब्राह्मण इस नवीन उदीयमान चन्द राज्य में आकर बसे और यहीं के होकर रह गये। इस संक्रमण से चन्द राज्य का बल बढ़ा। धीरे-धीरे इस नवीन शक्ति ने माण्डलिक सामन्तों को पराजित कर कूर्माचल में केन्द्रीय सत्ता को दृढ़ किया। सोमचन्द्र की सैंतीसवीं पीढ़ी में कीर्ति चन्द्र देव (1488-1503) ने कत्यूरी मांडलिक सामन्त को लखनपुर (पाली मछाऊँ) में पराजित कर कौटा-भाबर एवं कोटुली से लेकर जसपुर तक चन्द राज्य का विस्तार किया। यह पहला चन्द शासक था जिसने तराई-भाबर में प्रवेश किया। कीर्ति चन्द्र से पूर्व गरुड़ ज्ञान चन्द्र के समय (1431-1476) संभल के सूबेदार ने तल्ला देश में मढ़ौ की माल पर अधिकार किया। पर राजा के वीर सेनापति नील सिंह कठायत ने सूबेदार को पराजित किया और तल्ला देश में चन्द सत्ता कायम की।

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