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    उत्तराखण्ड के इतिहास का एक साधन - अमरकोश

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    Nandadevi

    57 ई0 पू0 में शकों को परास्तकर उज्जैन में कृत्युग (सत्ययुग) की घोषणा करने वाले मालव गणराज्य के प्रधान विक्रमादित्य के दरबारी नवरत्न और कालिदास के समकालीन बौद्ध विद्वान अमरसिंह द्वारा लिखा ग्रंथ 'अमरकोश' अत्तराखण्ड के इतिहास को जानने का एक महत्वपूर्ण साधन है। पर्वतीय गाँवों में पूजापाठ की पुस्तकों के साथ अमरकोश की पाण्डुलिपियाँ मिलने से भी यह प्रतीत होता है कि संस्कृत भाषा के पर्यायवाची शब्दों पर लिखी यह पुस्तक विशेष लोकप्रिय रही है और पहाड़ की मध्यकालीन पाठशालाओं में 'लघुकौमुदी' और 'मुहुर्त्ताचिन्तामणि' के साथ इसे पढ़ाया जाता था।


    बदरीनाथ मन्दिर में आठवीं से दसवीं सदी तक उत्तराखण्ड में शासन करने वाले कार्त्तिकेयपुर के राजाओं के चार ताम्रपत्र हैं जिन्हें पुरातत्व विभाग ने 'पाण्डुकेश्वर ताम्रपत्र' नाम दिया है। राजा ललितभूर और पद्मटदेव के ताम्रपत्रों में राजा के भूमिदान की सूचना राजकर्मचारियों तथा राज्य के महत्वपूर्ण व्यक्तियों को दी गई है, उसमें राजकुमार, मंत्रियों और सामन्तों से पहले 'राजन्यक' नामक पद का उल्लेख है।


    (श्रीमत् कार्त्तिकेयपुर विषये समुपागतान् सर्वानेव नियोगस्थान् राजराजन्यक राजपुत्र राजामत्य सामन्त महासामन्त .....)। 'राजन्यक' शब्द उत्तराखण्ड के मध्यकालीन ताम्रपत्रों में वर्णित नहीं है अतः ऐतिहासिक दृष्टि से इसका स्पष्ट अर्थ जानने के लिए आमरकोश से सहायता ली जा सकती है। उसमें कहा गया है कि क्षत्रियों के छोटे-छोटे गणराज्य थे, उनके राजा को 'राजन्यक' कहा जाता था। (द्वितीय काण्ड, क्षत्रिय वर्ग)।


    राजन्यकं च नृपतिक्षत्रियाणां गणे क्रमात्।।4।। उत्तराखण्ड में वैदिक काल से ही छोटे- छोटे गणराज्य थे जो कृषि, पशुपालन और वाणिज्य के व्यवसाय के साथ-साथ धन लेकर ये किसी भी शासक की ओर से लड़ते थे और लड़ाई के बाद वापस अपने क्षेत्र में आ जाते थे। इन्हीं के प्रधान को 'राजन्यक' कहा जाता था। केन्द्रीय शासन में इन गणों के प्रधान राजाओं को विशेष महत्व दिया जाता होगा। तभी राजकुमारों और मंत्रियों से पहले इनका उल्लेख है। बाद में इन्हीं गणों से जातियों, कुल और गोत्र वाला समाज सामने आया। गाँवों के समीप आज जो दुर्गम 'गढ़' अथवा 'कोट' नाम के शिखर हैं, व इन्हीं राजन्यकों की राजधानी रही होंगी। अमरकोश में सभा के पर्यायवाची शब्दों में समज्या, परिषद, गोष्ठी, समिति और संसद दिए गये है।


    कार्त्तिकेयपुर के ताम्रप़त्रों में 'वर्ल्मपाल' और 'गौल्मिक' नामक कर्मचारियों के पद भी है। अमरकोश के अनुसार 'वर्त्म' शब्द मार्ग के लिए प्रयुक्त होता था। (द्वितीय काण्ड)-


    अयनं वर्त्ममार्गाध्वपन्थान: पदवी सृतिः।
    सरणिः पद्धति पद्मा वर्त्तन्येकपदीति च।।15।।


    इससे 'वर्त्मपाल' का शब्दार्थ है - 'मार्ग रक्षक'। उत्तराखण्ड में ग्रीष्मकाल में कैलास-मानसरोवर, बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री के तीर्थयात्री आते थे। अतः यहाँ मार्गों का महत्व होने से 'वर्त्मपाल' का पद विशेष दायित्व का रहा होगा। पहाड़ों की दुर्गम भौगोलिक स्थिति के कारण तीर्थयात्री एक दिन मे पन्द्रह किमी. से अधिक मार्ग तय नहीं कर पाते थ। अतः हरिद्वार से बदरीनाथ तक हर पन्द्रह किमी. पर तीर्थ यात्रियों के रात्रिवास और भोजन की व्यवस्था के लिए चट्टी बनी हुई थीं। चट्टियों में दुकान और धर्मशाला के अलावा नौले ओर गौशालायें भी होती थी। सुरक्षा के लिए कुछ स्थानों पर सैनिक भी रखे जाते थे। अमरकोश में छोटी सेना के लिए 'गुल्म' शब्द का प्रयोग है, उसी का प्रधान 'गौल्मिक' कहा जाता होगा।


    ज्योतिर्विदाभरण नामक ग्रंथ क अनुसार उज्जैन के राजा विक्रमादित्य के दरबार में धन्वन्तरि, क्षपणक, अमरसिंह, शंकु, वेतालभट्ट, घटपार्कर, कालिदास, बराहमिहिर और वररूचि नामक नवरत्न थे। यह स्वाभाविक है कि उज्जैन की राजसभा में नवरत्न नियुक्त होने से पहले अमरसिंह का अमरकोश विषेश चर्चित हो चुका होगा। इसी ग्रंथ ने उसे नवरत्न के पद पर नियुक्ति के योग्य बनाया। अमरकोश लिखने से पहले बौद्ध भिक्षु अमरसिंह ने उत्तराखण्ड और कैलास की यात्रा की होगी तभी इस ग्रंथ में कूर्म, गन्धमादन, कालिन्दी, मन्दाकिनी, मेरू आदि की चार्चा है। अमरसिंह बौद्ध भिक्षु था जो वैदिक ऋषियों की तरह घुम्मकड़ थे। वर्षाकाल को छोड़कर धर्मप्रचार के लिए घूमते रहते थे। उस युग के घुमक्कड़ों के सबसे प्रिय स्थान थे कैलास और सुमेरू पर्वत। जिस तरह कालिदास ने 'मेघदूत' में कैलास और अलकापुरी का उल्लेख किया है, उसी तरह अमरसिंह ने भी कैलास और अलकापुरी का उल्लेख किया है। अमरकोश मे 'स्वर्गवर्ग' से शब्द और उसके पर्यायवाची शुरू किये गये हैं। उसमें प्रारम्भ में 'त्रिविष्टप' शब्द दिया हुआ है। जिससे आधुनिक 'तिब्बत' शब्द प्रचलित हुआ। तिब्बत के लिए 'त्रिविष्टप' शब्द विशेष प्रचलित नहीं रहा। महाभारत में भी इस शब्द का प्रयोग है। अमरकोश में यह कहा गया है कि देवताओं का कोषाध्यक्ष कुबेर कैलास के समीप 'अल्का' नामक स्थान में रहता था। (प्रथम काण्ड)-,


    अस्योद्यानं चैत्ररथं पुत्रस्तु नलकूबरः।
    कैलासः स्थानमलका पूर्विमानं तु पुष्पकम् ।।74।।


    गधर्व, विद्याधर और यक्ष मूलतः तिब्बत के निवासी थे। ये शीतकाल में भारतभर मे घूमले रहते थे। गर्न्धव मानसरोवर झील के उत्तर में रहते थे और घोड़े के व्यापारी थे। तिब्बत में आज भी जंगली घोड़े पाये जाते है। प्राचीन भारत में इन्हीं जंगली घोड़ो को भारत में लाकर गन्धर्व बेचते थे। इसी कारण घोड़ो की एक नस्ल ही गन्धर्व कहलाती थी। अमरसिंह ने भी गनधर्व जाति के घोड़ो का उल्लेख किया है। यक्षों की नगरी अलकापुरी उत्तराखण्ड की ओर से तिब्बत मे प्रवेश करते ही मिलती थी। अतः यह आधुनिक तिब्बत के 'ताकलाकोट' नामक स्थान पर रही होगी। अपनी कैलास यात्रा के समय अमरसिंह ने देवदारू के वृक्ष और किरातों (आधुनिक वनरौतों के पूर्वज) को भी देखा होगा। उसने मेरू पर्वत भी देखा था जिसे आज नन्दादेवी पर्वत काह जाता है। उसने मेरू पर्वत के पर्यायवाची शब्दों में सुमेरू, हिमाद्रि, रत्नसानु और सुरालय (देवताओं का निवास) का उल्लेख किया है।(प्रथम काण्ड) -


    मन्दाकिनी वियद्गंगा स्वर्णादी सुरदीर्धिका ।
    मेरूः सुमेरूर्हिमाद्री रत्नसानु सुरालय :।।53।।


    यह ध्यान देने की बात है कि महाभारत और कालिदास की तरह अमरसिंह ने भी नन्दादेवी पर्वत का उल्लेख नहीं किया है। नन्दादेवी पर्वत के पृष्ठ भाग में तिब्बत में सोने की खान होने से मेरू, को सोने का पहाड़ माना जाता रहा है। पुराणों में मेरू, उदुम्बर, कूर्म आदि ऋषियों के नाम भी हैं और पर्वत, वृक्ष तथा स्थान के नाम भी हैं। इससे एक संभावना यह बनती है कि मेरू नामक ऋषि ने जिस पर्वत का विस्तृत अध्ययन किया, उसी के नाम पर उस पर्वत का ना 'मेरू' पड़ गया। इसी तरह उदुम्बर नामक ऋषि ने जिस वृक्ष की उपयोगिता का पता लगाया। उस वृक्ष का नाम उदुम्बर पड़ गया। इसी तरह कूर्म ऋषि के निवास के कारण चम्पावत को कूर्म पर्वत कहा जाने लगा। अमरकोश में कूर्म के पर्यायवाची शब्दों में 'कामठ' और 'कच्छप' का भी उल्लेख है। रामायण प्रदीप नामक ग्रंथ में 'कमठ' को कूर्म का पर्यायवाची मानते हूए अल्मोड़ा के राजा कल्याणचन्द तृतीय को कमठगिरि का राजा कहा गया हैं।


    मेरू एक वैदिक ऋषि थे। उनकी पत्नी का नाम धारिणी और पुत्र का नाम मन्दर था। वायु पुराण के अनुसार उनकी तीन कन्यायें थीं।


    मेरोस्तु धारिणी पत्नी दिव्यौषधिसमन्वितम।
    मन्दंर सुषुवे पुत्रं तिस्त्रः कन्याश्य विश्रुताः।33।।


    पुराणों में 'भुवनकोश' नाम का एक प्रकरण है जिसमें सप्तद्वीपा पृथ्वी के मध्य में 'जम्बूद्वीप' की स्थिति मानी गई । उसके मध्य में मेरू पर्वत बताया गया है। इस प्रकरण से स्पष्ट हे कि किसी ऋषि ने मेरू सम्बन्धी भौगोलिक जानकारियों को संकलित किया । इन जानकारियों में निम्न तथ्यों को स्वीकार किया गया है-


    1. मेरू पर्वत भारत का सबसे ऊँचा पर्वत है।
    2. यह भारत की उत्तर दिशा में स्थित है।
    3. यह बदरीनाथ के पूर्व में स्थित है।
    4. मेरू के पृष्ठ भाग में कैलास पर्वत हैं
    5. मेरू में अंसख्य औषधियाँ पायी जाती है।


    आज नन्दादेवी पर्वत भारत का सबसे ऊँचा पर्वत है अतः यही वैदिक कालीन मेरू पर्वत हेना चाहिए। नन्दादेवी पर्वत बर्फ से ढका रहने से ‘श्वेत’ रंग का है। प्रातः काल और सायंकाल जब सूर्य की किरणों इसी पर्वत पर सिमट जाती है, तब यह सुनहला दिखायी देता है। सोने की तरह पीला दिखाई देने से 'सुमेरू' नाम प्रचलित हुआ। तिब्बत में इस पर्वत के पास सोने की खान होने से इसे सोने का मेरू अथवा 'सुमेरू' कहा गया। नन्दादेवी पर्वत के पास बहने बाली पिण्डर और गोरी नदियों के बालू को छानकर हाल ही तक सोना निकालने का रिवाज था। बालू से प्राप्त चींटीं के आकार का यह स्वर्ण 'पिपीलक' स्वर्ण कहलाता था क्योंकि संस्कृत भाषा में चींटी को 'पिपीलिका' कहा जाता है। उत्तराखण्ड के इस स्वर्ग का उल्लेख यूनान और चीन के प्राचीन साहित्य में भी मिलता है। प्रारम्भ में यह अधिक मात्रा में उपलब्ध रहा होगा। तभी मेरू को सोने का पहाड़ कहते थे। मध्य काल में सोना समाप्त हो गया और इसके किस्से-कहानियाँ ही संस्कृत साहित्य में रह गये।


    'नन्दादेवी' शब्द कार्त्तिकेयपुर के राजा ललितभूर (नवीं सदी) के पाण्डुकेश्वर ताम्रपत्रों में मिलता है अतः यह नाम अमरकोश में नहीं है। पुराणों के अनुसार नन्द गोप की जिस पुत्री को मथुरा के राजा कंस ने मार डाला, उसी को गोकुल के गोपों ने हिमालय और विन्ध्य पर्वत पर थाप दिया। बाद मे वहीं नन्दादेवी और विन्ध्यवासिनी के रूप् में प्रसिद्ध हुई। उत्तरकाशी त्रिशूल लेख से ज्ञात होता है कि सातवीं सदी तक पर्वतीय क्षेत्र में यह लोक विश्वास था कि मृतकों की आत्मायें 'सुमेरू' पर्वत पर चली जाती हैं। इसी परम्परा में 'सुरालय' अर्थात् देवताओं का निवास नाम प्रचलित रहा होगा। मेरू पर्वत को औषधियों का भण्डार माना जाता था। अमरसिंह ने अपनी पुस्तक में औषधियों पर विस्तार से चर्चा की है। उसने उदुम्बर (तिमुल) और इंगुदी (च्यूर) की भी औषधि वर्ग में रखा है।

    भाग 2 - उत्तराखण्ड के इतिहास का एक सधान - अमरकोश



    लेखक - डॉ मदन चन्द्र भट्ट - व्यवस्थापक सुमेरू संग्रहालय 7/12, टकाना रोड़ पिथौरागढ़
    सर्वाधिकार - पुरवासी - 2009, श्री लक्ष्मी भंडार (हुक्का क्लब), अल्मोड़ा, अंक : 30

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