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    उत्तराखण्ड के इतिहास का एक साधन - अमरकोश - 1

    Nandadevi

    'उदुम्बर' नाम के एक ऋषि का उल्लेख श्राद्ध के अवसर पर आयोजित तर्पण में किया जाता है। रक्षाबन्धन के पर्व पर 'ऋषि -तर्पण' में भी उदुम्बर का ना लिया जाता है। उदुम्बर विश्वामित्र गोत्री ऋषि थें। उनके वंशजों ने 57 ई. पू. मे मालव, यौघेय, भौखरी और कुलिन्दों के साथ मिलकर हिमाचल प्रदेश में 'औदुम्बर गणराज्य' की स्थापना की थी। हिमाचल प्रदेश में पठानकोट, नूरपुर, कांगड़ा, गुरदासपुर और होशियारपु से प्राप्त औदुम्बर गणराज्य के राज्य धरघोष, शिवदास, रूद्रदास और महादेव के चाँदी और ताँबे के सिक्कों पर 'तिमुल' का वृक्ष अंकित है। घर्मसिंधु (पृष्ठ-635) में लिखा है कि श्राद्ध के अवसर पर उदुम्बर के पत्तों का प्रयोग करना चाहिए। वराहपुराण के पिण्डकल्पोत्तपति प्रकरशा (अध्याय-189) में श्राद्ध के समय उदुम्बर के पात्र (पुड़) में पानी रखने का उल्लेख है-


    औदुम्बरे च पात्रे च कृत्वा शान्त्युदकानि च।
    प्रोक्षयेच्च गृंह सर्व यत्र तिष्ठ त्स्व्यं द्विजः।।


    अथर्ववेद (कुन्तापसूक्तानि, पृष्ठ- 228) में भी बिल्ब और उदुम्बर को पवित्र पेड़ बताया गया है।


    कुमाऊँ में श्राद्ध के अवसर पर तिमुल के पत्तल बनाकर उनमें पितरों के निमित्त भात, दाल, सब्जी, रायता, चटनी, खीर, मिठाई, फल, बड़ा और पूरी रखरक पुरोहित को खिलाने का रिवाज है। उसे 'पातली' कहते है। उसमें दाड़िम और अखरोट के गूदे रखे जाते हैं। प्रत्येक परिवार को वर्ष में माता-पिता की पुण्यतिथि और महालया (सोलह श्राद्ध) के कुल चार श्राद्ध करने पड़ते हैं। जिससे उसे अपने घर के पास एक तिमुल का पेड़ लगाना पड़ता है। तिमुल की बड़े आकर की चिकनी पत्तियाँ होती है। वे गाय भैसों के लिए उत्तम भोजन मानी जाती है। तिमुल का हरे आकार का फल सब्जी बनाने के काम में आता है उसमें दही, मट्ठा अथवा भांग पीसकर डालने से बनी सब्जी पहले गाँवों में शादी के अवसर पर बारातियों को खिलाने के लिए बनाई जाती थी।


    तिमुल का फल पक जाने पर लाल अथवा बैगनीरंग का होने लगता है। आयुर्वेद के अनुसार रक्तचाप और पेटदर्द की वह अचूक दवा है। मधुमेह के रोगी आजकल भी उसका प्रयोग करते है। संभवतः इसी कारण अमरसिंह ने उदुम्बर का औषधि वर्ग (द्वितीय काण्ड) में रखा है। और उससे दूध की तरह का रस निकलने का उल्लेख किया है।


    उदुम्बरा जन्तुफलो यज्ञाड़ गो हेमदुग्धक :।
    कोविदारे चमरिक: कुछालो युगपत्रकः।।


    अमरसिंह ने जिस तरह उदुम्बर का 'हेमदुग्धकः' कहा है, उसी तरह इंगुदी (च्यूर) को 'तापसतरू' अर्थात् तपस्वियों का पेड़ कहा है-


    इंगुदी तापसतरू भूर्जे चर्मि मृदुत्त्वचौ।
    पिच्छिला पूरणीभोचा स्थिरायुः शाल्मलिर्द्वयोः ।। 48।।


    च्यूर को औषधिवर्ग में रखना और 'तामसतरू' कहना सर्वथा उचित है। अमरसिंह के समकालीन कालिदास ने भी अपने नाटक अभिज्ञानशाकुन्तलम में कण्व ऋषि के आश्रम में इंगुदी के उपयोग का तीन बार उल्लेख किया है। प्रथम अंक के प्रारम्भ में 'कण्वाश्रम' के समीप पहुँचने की सूचना के रूप में यह कहा गया है कि जिन वृक्षों के कोटर में तोते रह रहे हैं, उन कोटरों में से तृणघान्य नीचे पृथ्वीपर गिरे हुए है, इंगुदी फलों को तोड़ने से चिकने हुए पत्थर इधर उधर पड़े हुए दिखाई दे रहे है। मृग रथ की असाधारण ध्वनि को सुनकर किसी भी प्रकार की व्यग्रता प्रदर्शित नहीं कर रहे है़, जलाशय में स्नान कर आश्रम की ओर लौटने वाले तपस्वियों के कपड़ों से चूने वाले पानी से मार्ग में लकीर सी बन गई है-


    नीवाराः शुकगर्भ कोटर मुखभ्रष्टस्तिरूणामर्धः,
    प्रास्निग्घाः क्वचिदिड़ गुदीफलभिदः सूच्यन्त एवोपलाः।
    विश्वासोपग मादभिन्नगतयः शब्दं सहन्ते मृगा-
    स्तायाघारपथाश्च वल्कलशिखानिष्यन्द रेखाड़ि कता।।


    द्वितीय अंक में विदूषक शकुन्तला के किसी इंगुदी का तेल लगाने से चिकने सिर वाले तपस्वी से विवाह होने की संभावना बताते हुए कहता है-


    'मा कस्यापि तपस्विन इंगुदी तैलमिश्रचिक्कण - शीर्षस्य हस्ते पतिस्यति।।’


    चतुर्थ अंक में कुलपति कण्व शकुन्तला की विदाई के समय मार्ग में खड़े मृग के बारे मे कहते है कि उस मृग के मुख में कुश के चुभने से जो घाव हे गया था- उस पर घाव भरने वाला इंगुदी का तेल लगाकर शकुन्तला ने ठीक किया था-


    यस्य त्वया व्रणविरोपणामिड़ गुदीनां,
    तैलं न्यषिच्यत मुखे कुशसूचिविद्धे।
    श्यामाकमुष्टिपरिवर्घितको जद्यति,
    सोडयं न पुत्रकृतकः पदवीं मृगस्ते।।


    यह एक आश्चर्यजनक तथ्य है कि आत कोटद्वार के समीप मालिनी नही के किनारे कण्वाश्रम के क्षेत्र में इंगुदी (च्यूर) के पेड़ नहीं है। च्यूर का पेड़ आम की तरह विशाल होता है। पिथौरागढ़ में सरयू और रामगंगा नदियों के संगमस्थल-रामेश्वर के क्षेत्र में यह वृक्ष बहुतायत से पाया जाता है। रामेश्वर के समीप पहले 'बशिष्ठाश्रम' था। महर्षि बशिष्ठ यहाँ पर अपने शिष्यों और अयोध्या के राजकुमारों को शस्त्र, शास्त्र और गोसेवा की शिक्षा देते थे। उनकी नन्दिनी गाय की कहानियाँ संस्कृत भाषा के ग्रन्थों में मिलती है। आश्रम के प्रधान का नाम बशिष्ठ था जो आधुनिक शंकराचार्यो की तरह एक गद्दी का ना था। सत्ययुग, त्रेता और द्वापर में आश्रम के प्रधान को बशिष्ठ ही करते थे। विद्यालय के साथ-साथ बशिष्ठाश्रम कैलास-मानसरोवर के तीर्थ यात्रियों के लिए रात्रि विश्राम-स्थल भी था। अमरसिंह और कालिदास भी अपनी कैलास यात्रा के समय बशिष्ठाश्रम में रहे होंगे। यहीं उन्होने 'इंगुदी' (च्यूर) का पेड़ देखा होगा। इंगुदी की लकड़ी जलाने के लिए विशेष उपयोगी है। इसके फूलों से निकलने वाला शहद बहुत स्वादिष्ट होता है। इसके मीठे फलों से पहले गुड़ बनाया जाता था। बादाम की तरह का बीज तोड़ने के बाद पत्थरों मं पीसा जाता है। कई महिनों तक पत्थरों पर तेल की छाप बनी रहती है। च्यूर का तेल दिवाली मे पकवान बनाने के लिए प्रयुक्त होता है। यह जम कर ठोस हो जाता है अतः तीर्थयात्री उसे यात्रा में साथ ले जाते है। जाड़े के दिनों में हाथ-पैर फटने पर च्यूर लगाने का रिवाज है। इसी कारण अमरसिंह ने इसे औषधि वर्ग में रखा है।


    अमरसिंह ने जाड़े के भी पर्यायवाची शब्द लिखे हैं अतः वह शीतकाल में भी उत्तराखण्ड में रहा होगा।


    भाग 1 - उत्तराखण्ड के इतिहास का एक सधान - अमरकोश



    लेखक - डॉ मदन चन्द्र भट्ट - व्यवस्थापक सुमेरू संग्रहालय 7/12, टकाना रोड़ पिथौरागढ़
    सर्वाधिकार - पुरवासी - 2009, श्री लक्ष्मी भंडार (हुक्का क्लब), अल्मोड़ा, अंक : 30


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