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    श्री बल्लभ उपाध्याय - लोहुमी और लोहनी जाति के मूल पुरुष

    श्रीबल्लभ उपाध्याय (जीवनकाल: 15वीं सदी): लोहना ग्राम, जिला अल्मोड़ा। असाधारण विद्वान, तपस्वी, सिद्धसाधक। मंत्रशक्ति से लोहा भष्म कर देने के कारण इन्हें 'लौहहोत्री' या 'लौहहोमी' नाम से सम्बोधित किया जाने लगा।


    श्रीयुत श्रीबल्लभ उपाध्याय जी भारद्वाज गोत्री कान्यकुब्ज ब्राह्मण मूलतः कन्नौजवासी थे। लेकिन इनके पूर्वज सम्राट हर्षवर्धन के समय उनके गुरु के रूप में उनके साथ प्रयाग से प्रतिष्ठानपुर (वर्तमान में झुंसी) चले गये थे। कालान्तर में जब चन्दों ने कूर्मान्चल में राज्यसत्ता प्राप्त करने की चेष्टा की तो उन्हें पूर्ण सफलता नहीं मिली और अनेक संघर्षों के बावजूद कत्यूरी राज्य के अधीन माण्डलिक राजा ही बने रहे। चम्पावत से आगे उनका राज्य विस्तार नहीं हो पाया। चन्द राजा कीर्ति चन्द जब सिहासनारूढ़ हुए तो राज्याभिषेक के बाद वे स्वयं झूसी गए और आदर के साथ श्रीबल्लभ उपाध्याय को ई. सन् 1489 में कुमाऊँ लिवा लाये।


    श्रीबल्लभ उपाध्याय जी अप्रतिम विद्वान, तपस्वी और सिद्ध साधक थे। इनकी कृपा से कीर्तिचन्द ने न केवल डोटी के राजा के आक्रमण को विफल किया, अपितु चौंभेंसी, सालम, फल्दाकोट, ऊँचाकोट, बारामण्डल, कैडेरों, धनियाकोट, कोटोली, छखाता और पाली पछाऊँ में भी विजय प्राप्त कर राज्य का विस्तार किया और लगभग तीन चौथाई कुमाऊँ पर अधिपत्य स्थापित कर एक स्वतंत्र एवं सार्वभौम चन्द राज्य की स्थापना की। इसी समय वर्तमान अल्मोड़ा का गणनाथ क्षेत्र चन्द राज्य के अधिकार क्षेत्र में आया। मंत्र शक्ति से लोहा भष्म कर श्रीबल्लभ जी ने सर्वप्रथम अपनी मंत्र शक्ति का चमत्कार दिखाया। श्री गणनाथ को इन्होंने अपनी साधना स्थली और निवास के लिए चुना। गणनाथ के समीप जहां इन्होंने अपना निवास बनाया, वह जगह आज 'लोहना' गाँव के नाम से प्रसिद्ध है। मंत्र शक्ति से लोहा भष्म कर देने के कारण इन्हें 'लौहहोत्री' या 'लौहहोमी' नाम से सम्बोधित किया जाने लगा। इनकी चमत्कारिक सिद्धियों का वर्णन वाल्टन ने अल्मोड़ा गजेटियर में (जिल्द 12, पृष्ठ 425-26) किया है। लोहना गाँव में पानी बहुत दूर था। इन्होंने मंत्र शक्ति से उस पहाड़ी पर जलस्रोत उत्पन्न कर दिया, जो आज भी 'श्रीबल्लभ का धारा' के नाम से प्रसिद्ध है।


    श्रीबल्लभ जी के वंशधर और सेवक बाद में सत्राली घाटी में बसे। इनमें प्रमुख गाँव पाटिया, सीमा, लोहना, पाटन, भैंसोड़ी, ताकुला, पनेरगाँव, पतेलखेत आदि प्रमुख हैं। बाद में चन्द राजाओं ने इनके वंशधरों को कसून, पिलख, ओकाली, सूपाकोट, लछमपुर, बल्दगाड़, भगौती, कुमल्टा, कोटा, कांटली, भेटा, भाड़कोट, बटगल, काकड़ा, आदि गाँव भेंट में दिए। कुमाऊँ के जनमानस में आज भी 'लोहनी को तंत्र, काण्डपाल को मंत्र और पारकोट की जड़ी' लोकोक्ति प्रसिद्ध है। कालांतर में इनके वंशधर पाण्डे, काण्डपाल, लोहुमी और लोहनी जाने गए (आचार्य भास्करानंद लोहनी लिखित पुस्तक 'कुमाऊँ' से)।

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