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    पौड़ी गढ़वाल का स्वतंत्रता संग्राम में योगदान -2

    गांधी जी द्वारा चलाये गये सत्याग्रह आंदोलन के सन्दर्भ में सर्वश्री भैरवदत्त धूलिया, जीवानंद वडोला तथा गौवर्द्धन वडोला बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से अपनी पढ़ाई छोड़कर वापस आये तथा सत्याग्रह आंदोलन का संचालन किया। इसके अलावा प्रताप सिंह नेगी, कृपाराम मिश्र 'मनहर', रूपचन्द वर्मा, गोपाल नारायण गौड़ आदि भी संगठन कार्य में लगे थे। चौंद कोट में केशर सिंह रावत ने, सलाण में ईश्वरी दत्त ध्यानी, हरिदत्त बौड़ाई, गंगा सलाण में अनसूइया प्रसाद बहुगुणा और शिव सिंह ने कुली वेगार प्रथा के विरुद्ध अपना अभियान तेज बनाया। फलतः जनता ने 'बेगार' देना बंद कर दिया। फलतः गढ़वाल और कुमाऊं में कुली बेगार प्रथा का कलंक हमेशा के लिए मिट गया।


    उधर राष्ट्रीय स्तर पर 1923 में स्वराज्य पार्टी के गठन कर कौसिलों में प्रवेश करने की नीति पर दिल्ली में सम्मेलन हुआ। स्वराज्य पाटी के टिकट पर श्री जोधा सिंह नेगी को मुकन्दी लाल बैरिस्टर ने हरा दिया व एसेम्बली में प्रवेश किया।


    उधर सन् 1930 में पेशावर में 22 अप्रैल को गढ़वाली सैनिकों को जिनके नेता हवलदार चन्द्र सिंह गढ़वाली थे, ने निहत्थे कांग्रेसी स्वयंसेवी पठानों पर गोली चलाने से इन्कार कर दिया। यह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की महत्वपूर्ण घटना थी जो 1857 के बाद घटी थी। हवलदार चन्द्र सिंह गढ़वाली को 'काला पानी' की सजा हुई। इस घटना ने गढ़वाल में अंग्रेजों के विरुद्ध आग में 'घी' का काम किया।


    1929 में गढ़वाल में असहयोग आंदोलन का प्रभाव तेज हुआ, प्रताप सिंह नेगी, जगमोहन सिंह नेगी कृपाराम मिश्र 'मनहर' आदि ने सत्याग्रह के बारे में योजना का प्रारूप तैयार किया। 1930 को पौड़ी में कुमाऊं केशरी श्री हरगोविन्द पन्त की अध्यक्षता में कुमाऊं परिषद का सम्मेलन हुआ जिसमें गढ़वाल के लिए जीवानंद डोभाल, अध्यक्ष भोलादत्त चंदोला मंत्री तथा प्रताप सिंह नेगी संचालक नियुक्त किये गये। कुछ दिनों बाद 'कोट' (सितोन्स्यू) में राजनीतिक महासम्मेलन हुआ जिसमें नरदेव शास्त्री, महावीर त्यागी, हरगोविन्द पन्त भी शामिल हुए। गढ़वाल में भी जगह-जगह विदेशी वस्त्रों की होली जलाई गई, शराब की भट्टियों पर धरना दिया गया। इस आंदोलन के कारण अंग्रेजी सरकार ने प्रताप सिंह नेगी, देवकी नन्दन ध्यानी, तथा अनसूइया प्रसाद बहुगुणा को जेल की सजायें दी।


    अक्टूबर 1930 में यमकेश्वर में 144 धारा तोड़ी गई। श्री जगमोहन सिंह नेगी, छवाण सिंह नेगी तथा रूपचन्द्र ऊनियाल सहित 18 व्यक्ति गिरफ्तार किये गये। कृपाराम मिश्र, सकलानंद शास्त्री, भक्त दर्शन सिंह नेगी आदि कार्यकर्ताओं को जेल में डाल दिया गया। श्री गोकुल सिंह नेगी ने इस आंदोलन का भूमिगत होकर संचालन किया। बाद में उन्हें गिरफ्तार कर दिया गया।


    1938 में श्री नगर (गढ़वाल) में एक राजनीतिक सम्मेलन का आयोजन किया गया। जिसमें पं. जवाहर लाल नेहरू, विजयलक्ष्मी पंडित, श्री हत्थी सिंह ने भी भाग लिया। इस सम्मेलन में कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किये गये। सरकारी नीतियों की कटु आलोचना की गई।


    1940-41 के मध्य गढ़वाल में एक अशोभनीय घटना घटी जिसमें विजोली और मैन्दोली गांवों के सवर्ण लोगों ने शिल्पकारों पर हमला कर दिया, गांधी जी ने दुखी होकर सत्याग्रह गढ़वाल में बंद कर दिया, लेकिन बाद में समझौता कर दिया गया तथा भविष्य में ऐसी घटना की पुनरावृत्ति न होने देने का संकल्प व आश्वासन दिया गया, इस घटना व समझौते की सूचना पुनः भक्त दर्शन, प्रताप सिंह नेगी आदि नेताओं के डेलीगेशन ने गांधी जी को इलाहाबाद में दी। डोला-पालकी समस्या का हल करने के लिए श्री बलदेव सिंह आर्य व कलम सिंह नेगी के तत्वावधान में एक कमेटी बनाई गई, इस प्रकार 26 फरवरी 1941 को। सत्याग्रह से प्रतिबन्ध उठा लिया गया।


    इस बीच 1941 में सारे भारत में व्यक्तिगत सत्याग्रह जोर पकड़ता गया। 8 अगस्त 1942 को 'भारत छोड़ो' का प्रस्ताव पास हुआ। इस समय पोड़ी व चमोली के कार्यकर्ता भी बड़ी संख्या में गिरफ्तार किये गये। अनेक व्यक्तियों को 6 माह से 4 वर्ष को सजायें दी गई। इनमें श्री सुन्दर लाल शास्त्री, की पौड़ी जेल में मत्व हई। भोला दत्त चन्दाला, लोलानंद डबराल, अनसइया प्रसाद बहुगुणा, कोतवाल सिंह की मृत्यु घर आका गढ़वाल से बाहर जिन लोगों की मृत्यु हुई उनमें से 1 महीधर शर्मा बड़थ्वाल भी थे, वे पक्के कांग्रेसी थे उन्होंने 1936 में दिल्ली में 'गढ़देश सेवा संघ' को स्थापना भी की। हेमवती नन्दन बहुगुणा ने इलाहाबाद में युवक आंदोलन का नेतृत्व किया। बनारस में डॉ. कुशलानंद गैराला ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


    नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने आजाद हिन्द फौज का गठन किया तो गढ़वालो अफसरों व सिपाहियों ने विशेष रूप से सक्रिय एवं प्रशंसनीय योगदान दिया। आजाद हिन्द फौज में गढ़वाल के 3000 के लगभग अधिकारी व सैनिक थे जिनमें लगभग 600 शहीद या युद्धबंदी बनाये गये।


    इस प्रकार भारत की गुलामी को दूर फेंकने में 'गड़वाल' का विशेष योगदान रहा है। स्वतंत्रता संग्राम के लिए जिन महान व्यक्तियों ने कार्य किया। जिन्होंने अपना सर्वस्व न्यौछावर देश के हित में कर दिया। उनकी अमूल्य सेवाओं के मूल्यांकन कर हमें उनके आदशों पर चलने की प्रेरणा लेनी है।

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