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    राजा कीर्तिशाह - पंवार वंश

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    राजा प्रतापशाह के स्वर्गवास के बाद, कीर्तिशाह का राज्याभिषेक मात्र 13 वर्ष की अवस्था में हुआ था। उस समय पोलिटिकल एजेन्ट मि. रासैं थे। कीर्तिशाह शाह की आयु कम होने के कारण राजमाता गुलेिरया ने राजा के चाचा विक्रम सिंह को राजकाज सम्भालने को दिया, परन्तु प्रजा के असन्तोष के कारण राजमाता ने शासन की बागडोर स्वयं अपने हाथों में ले ली। राज्य प्रशासन को चलाने के लिए राजमाता की अध्यक्षता में संरक्षण समिति ने कार्यभार सम्भाला। राजमाता ने इस समिति (कौंसिल) में तीन सदस्यों (मेम्बरों) की नियुिक्त की। ये तीन सदस्य पंडित शिवदत्त डंगवाल, पंडित केवलराम रतूड़ी और पंडित विशेश्वर दत्त सकलानी थे। इसके अलावा सक्रेेटरी काउन्सिल पंडित रघनुाथ भट्टाचार्य बंगाली नियुक्त किये गए। राजमाता गलुेरिया ने काफी समय तक बड़ी दक्षतापूर्वक राज्य का कार्यभार सम्भाला।


    राजा कीर्तिशाह की शिक्षा-दीक्षा 'मेयो' काॅलेज अजमेर में हुई। कीर्तिशाह प्रतिभाशाली और वैज्ञानिक चेतना आरै साहित्यिक अभिरूचियों में मंडित व्यक्ति थे। इसका सबूत शिक्षा विभाग के इंस्पेक्टर मिस्टर ई. जाइल्स साहब ने परीक्षा लेने पर कीर्तिशाह को सभी विषयों में उत्तम पाया और अपनी रिपोर्ट में कहा कि "मैं यह बिना संकोच के साथ कहता हूँ कि महाराज कीर्तिशाह को अंग्रेजी, भाषा और गणित का सर्विवषयक ज्ञान है।" राजा कीर्तिशाह र्मइ सन् 1892 में राजसिंहासन पर आसीन हुए। परिषद (कौंसिल) को सलाहकार समिति के रूप में कार्य करने दिया गया। और बाद में सन् 1898 में इसका अवसान कर दिया गया। कीर्तिशाह ने प्रशासनिक तथा प्रजा की भलाई के कार्यों में बहुत रूचि दिखाई आरै उनके राज में कई महत्वपूर्ण कार्य हुये। सन् 1891 में टिहरी का एंग्लो वर्नाकुलुर मिडिल स्कूल, हाईस्कूल तक बनाया गया तब इसे 'प्रताप हाई स्कूल' नाम से जानते थे। (यह स्कूल कौंसिल के कार्यकाल के समय में ही स्थापित हो गये थे) राजा ने शिक्षा को राज्योन्नति का मलूमन्त्र माना अतः राजा ने शिक्षा का प्रचार किया, अंग्रेजी हाईस्कूल, संस्कृत पाठशाला टिहरी में खोली और प्रत्येक पट्टी (ग्राम) में ग्राम पाठशालायें खोली जो अपर प्राइमरी क्लास तक थी। राजा ने उस समय श्रीनगर में सरकारी हाईस्कूल के छात्रावास के लिये 13,000 रूपयों का दान भी किया। कीर्तिशाह के शासनकाल में अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों को ऊँचे पदों पर रखा गया।


    राजा ने एक पटवारी क्लास भी खुलवायी जहाँ पटवारीगिरी के उम्मीदवार शिक्षा पाते थे, इसके अलावा मसुलमानों की शिक्षा के लिए मदरसे की स्थापना भी की। कीर्तिशाह ने पुिलस विभाग में संशोधन तथा जंगलात विभाग का विस्तार नये वैज्ञानिक नियमों पर किया। राजा ने कीर्तिनगर की स्थापना भी की। कीर्तिशाह के शासनकाल में म्युनिसिपैलिटी बोर्ड की स्थापना, टिहरी में बिजली की व्यवस्था, वाटर वक्र्स, कचहरी में सुधार किया गया, साथ ही साथ कुष्ठ रोगियों के लिये उत्तरकाशी में एक अस्पताल भी खुला। इसके अलावा सड़कों का निर्माण, पुलों का निर्माण, इमारतों का निर्माण, टिहरी में क्लाॅक टावर (घण्टाघर) भी बनाया गया, कृषकों की सुविधा के लिए कृषि बैंक भी खुला तथा टिहरी में एक प्रिटिंग प्रेस की भी स्थापना की। राजा ने गढ़वालियों की एक सैपंर्स कम्पनी भी बनायी। सरकार ने कीर्तिशाह को C.S.I की उपाधि दी थी। सन् 1900 में इन्हांनेे यूरोप की यात्रा की। सन् 1903 में ब्रिटिश सरकार ने K.C.S.I उपाधि प्रदान की। इसके पश्चात सन् 1906 में कीर्तिशाह को प्रान्तीय गवर्नमेन्ट की काउन्सिल का सरकारी मेम्बर बनाया गया। कीर्तिशाह ने अपने शासनकाल में 'वन संरक्षण नीति' बनायी, जिसके परिणामस्वरूप जन संघर्ष हुए। इसमें प्रमुख जन संघर्ष इस प्रकार से थे-
    (1) रँर्वाइ व कडाकोट का ढंडक (सन् 1901)
    (2) कुंजणी का वन ढंडक (सन् 1904-05)
    (3) खास पट्टी का वन ढंड़क (सन् 1906-07)
    (4) सकलाना मुआफी के वन ढंडक़ (सन् 1911-13) जिसमें सन् 1906-07 के कृषक विद्रोह में तो पज्रा ने बन्दाबेस्त अधिकारियों के तम्बू उखाड़ फेंके तथा एक अधिकारी के सिर-माथे पर तो डाम (सिक्का गर्म कर) धर दिया था। यद्यपि राजा के आने के पश्चात स्थिति को काबू में लिया गया था। इस घटना के पश्चता सज़ा के तारै पर राजा ने खास पट्टी क्षेत्र के लोगों का बहिष्कार करवा दिया। जिसके परिणामस्वरूप खास पट्टी क्षेत्र से नीचे के क्षेत्र के गाँवों में घरों का मुख्य द्वार खासपट्टी क्षेत्र की तरफ न करने की परम्परा चल पड़ी। लोगों में यह धारणा भी बना दी गयी कि सुबह के समय खासपट्टी की तरफ देखना भी खराब होता है। परन्तु तमाम प्रतिरोधों के बावजूद उत्तराखण्ड में आज भी खासपट्टी के लोगों की कमर्ठता एवं जीवन्ता के उदाहरण दिए जाते हैं। यह वही क्षेत्र है जहाँ कालान्तर में श्री भुवनेश्वरी महिला आश्रम के संस्थापक स्वामी मनमन्थन को अपार जन सहयोग मिला। जिसके फलस्वरूप मनमन्थन जी ने सफलतापूर्वक चन्द्रबदनी मन्दिर में पशुबलि प्रथा को समाप्त करवाया। यह इस क्षेत्र के लोगों का जुझारूपन दशार्ता है। राजा कीर्तिशाह की मृतु 25 अप्रैल सन् 1913 में हुई थी।

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