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    कालू महरा - उत्तराखंड का प्रथम स्वतंत्रता सेनानी

    Kalu Mahara - Uttarakhand First Freedom Fighter

    कालू महरा (1831-1906): जन्मः काली कुमाऊँ में कुटौलगढ़ क्षेत्र के एक गांव में। सन 1857 की आजादी की पहली लड़ाई का वीर, साहसी और देशभक्त जननायक। सशस्त्र क्रान्तिकारी कालू महरा के वंश की पृष्ठभूमि संक्षेप में इस प्रकार है- चन्द राजा सोमचन्द को कत्यूरी राजा ने अपनी पुत्री से शादी के उपलक्ष्य में चम्पावत में दहेज के रूप में एक छोटी जागीर प्रदान की थी। उस समय सम्पूर्ण कुमाऊँ छोटे-छोटे गढ़पतियों में विभक्त था। इस छोटी रियासत को चम्पावत, अस्कोट, सीरा, चौगर्खा, चौभसी, पाली-पछांव तथा माल-भाबर तक फैलाने में जिन लोगों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थीं, उनमें विसंग के मारा, फाल, करायत, देव आदि अधिकारियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। क्षेत्र के बीचों बीच एक किला आज भी अप्रतिम सौन्दर्य लिए हुए है। इस किले को अंग्रेजों ने 'फोर्ट हेस्टिंग्स' नाम दिया था। मारा लोग इस किले के किलेदार थे। इन्हें कोट्याल मारा कहा गया है। चन्दों के परवर्ती काल में भीमराज मारा को वंश सहित इस किले में मारे जाने से यहाँ के बचे हुए लोग किले के सामने वाले क्षेत्र में बस गए। इसी गांव में ठाकुर रतिभान सिंह के यहाँ कालू महरा का जन्म हुआ था। ठाकुर रतिभान सिंह का तिब्बत के साथ अच्छा व्यापार था। कालू महरा बचपन से ही अक्खड़ और दबंग थे। घुड़सवारी का उन्हें बहुत शौक था। एक ही दिन में वे अल्मोड़ा से लौटकर वापस विसंग पहुँच जाते थे। ठिगना कद, चपटी नाक, सांवली आकृति तथा गठीला शरीर। कमर में खुकरी, चारों ओर शरीर पर लबादा, यह उनका बाहरी व्यक्तित्व था।


    कालू महरा के रोहेला नवाब खान बहादुर खान और टिहरी नरेश से अच्छे सम्बन्ध थे। 1857 में जब कुम्मैएं लोग भाबर गए थे तो अवध की बेगमों का कालू महरा के पास दूत आया। बेगमों ने कालू महरा को अंग्रेजों के विरुद्ध आन्दोलन में कूदने की दावत दी थी। नवाब खान बहादुर खान द्वारा संधि वार्ता करने के लिए कालू महरा को संदेश भेजा गया। अन्ततः कालू महरा और खान में समझौता हो गया। समझौते के अनुसार 1. जहाँ तक रथ का पहिया चलेगा, वह क्षेत्र नवाब का होगा; उसके बाद का क्षेत्र कालू महरा का होगा। 2. नवाब कालू महरा को आर्थिक सहायता प्रदान करेगा तथा सैन्य सामग्री की पूर्ति भी करेगा। इस वार्ता के पश्चात काली कुमाऊँ अंचल में संघर्ष की तैयारियां शुरू हो गयीं। कालू महरा के नेतृत्व में सभी लोग इकट्ठे हो गए। चौड़ापित्ता के बोरा, रैधों के बैडवाल, रौलमेल के लडवाल, चकोट के क्वाल, धौनी-मौनी, करायत, देव, बोरा व फालों ने आपस में सलाह मशविरा कर कालू महरा को अपना सेनापति नियुक्त किया। इन लोगों ने लोहाघाट में अंग्रेजों की बैरकों में धावा बोलकर उन्हें वहाँ से भगा दिया और बैरकों में आग लगा दी। इस विजय के पश्चात धन प्रबन्ध की जिम्मेदारी खुशाल सिंह को सौंपकर कालू महरा वस्तिया की ओर बढ़े। लोहाघाट से भागे हुए सैनिकों ने अल्मोड़ा पहुँचकर कमिश्नर रैमजे को आपबीती सुनाई। कूटनीतिज्ञ रैमजे ने तत्काल सैनिकों की एक टुकड़ी ब्रह्मदेव (टनकपुर) और दूसरी लोहाघाट भेजी। ब्रह्मदेव में मैदानी क्षेत्रों से पहाड़ को आने वाले आन्दोलनकारियों को रोकना था। लोहाघाट पहुँची सैनिक टुकड़ी ने कालू महरा के विश्वस्त सहयोगी खुशाल सिंह को अपनी कूटनीति से पराजित कर दिया। अमोड़ी के पास क्वैराला नदी के समीप किरमोली गांव में, जहाँ क्रान्तिकारियों का धन व अस्त्र-शस्त्र रखने का गुप्त अड्डा था, स्थानीय लोगों की मुखबिरी पर अंग्रेजों ने लूट लिया। अधिकतर क्रान्तिकारी मार दिए गए। वस्तिया में कालू महरा के साथ गोरे सैनिकों का संघर्ष हुआ। कालू को पराजित होकर पीछे हटना पड़ा। अंग्रेजों ने अपनी चाल से माधोसिंह और नरसिंह सहित कई लोगों को अपनी ओर मिला लिया। घर और साथियों द्वारा छोड़ दिए जाने पर भी कालू ने हिम्मत नहीं हारी और बचे-खुचे सहयोगियों को एकत्र कर अल्मोड़ा की ओर ऐतिहासिक कूच किया। रास्ते में कालू को एक प्रमुख सहयोगी वारि गांव के रामकृष्ण वारियाल मिले। 22 जोड़ी हल बैल रखने वाला यह व्यक्ति सम्पन्न किसान था। क्रान्ति के बाद वह निःसन्तान ही मर गया। कालू महरा और रामकृष्ण वारियाल अंग्रेजों के लिए आतंक के पर्याय बन गए थे। कुछ समय पश्चात अंग्रेजों ने पूरी क्रान्तिकारी सेना को बुरी तरह छिन्न-भिन्न कर परास्त कर दिया। इस प्रकार कुमाऊँ में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम असफल हो गया।


    इस सशस्त्र क्रान्ति के बाद कई लोगों को गोली से उड़ा दिया गया। आनन्द सिंह फर्त्याल और विशन सिंह करायत इनमें प्रमुख थे। कालू महरा के घर को अग्निसात कर दिया गया। रामकृष्ण वारियाल भागकर नेपाल चले गए। कई सहयोगी जंगलों में भटकते-भटकते भूख-प्यास से मर गए। अंग्रेज समर्थकों को पुरस्कृत किया गया। माधोसिंह को बरेली तथा नरसिंह को सैय्यदपुर किरौड़ा व दूरदासपुर की 539 रुपये 14 आना की जागीर दी गई। काली कुमाऊँ को बागी घोषित कर दिया गया। 1937 तक यहाँ के लोगों को सेना में नहीं लिया गया। कुछ समय उपरान्त कालू महरा अपने गांव लौट आये। मकान न होने के कारण उन्होंने अपना निवास मायावती के नजदीक जंगल में खाटकुटुम में बना लिया। स्वाधीनता प्रेमी, क्रान्ति पुत्र, वीर कालू महरा द्वारा काली कुमाऊँ में सुलगाई क्रान्ति की चिन्गारी शोला बनकर नहीं फूट सका। उनकी मृत्यु के संबंध में इतिहास मौन है। कुमाऊँ केसरी श्री बद्रीदत्त अनुसार उन्हें 52 जेलों में घुमाया गया। कुछ का मानना है कि कालू को फाँसी पर लटका दिया गया था। इतना सशस्त्र विद्राेह करने पर भी उन्हेंं सजा नहीं हुई- कुछ लोग इसे कमिशन कुटनीतिक चाल बताते है। सन्दर्भ-"कुमाऊँ का स्वाधीनता संग्राम में योगदान" पत्रिका (लोहाघाट)

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