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    मुकुन्दी लाल- बैरिस्टर

    मुकुन्दी लाल- बैरिस्टर (1885-1982): गाँव पाटली, पट्टी मल्ला नागपुर, चमोली गढ़वाल। उत्तराखण्ड के प्रथम और अन्तिम बार-एट-ला। मुकन्दीलाल एक प्रसिद्ध वकील, कुशल प्रशासक, उच्चकोटि के कलामर्मज्ञ, लेखक, पत्रकार मशहूर शिकारी, फोटोग्राफर, पुष्प और पक्षी प्रेमी और भी ना जाने किन-किन नामों से पहचाना जाता था। उ.प्र. के पूर्व राज्यपाल श्री बी.गोपाल रेड्डी के शब्दों में कहा जाए तो "इसमें कोई दोराय नहीं होगा कि बैरिस्टर मुकुन्दीलाल को गढ़वाल के भीष्म पितामह है।"


    शिक्षा


    मुकुन्दीलाल जी की शुरूआती शिक्षा चोपड़ा (पौड़ी) मिशन हाईस्कूल में हुई थी। रैमजे इन्टर कालेज, अल्मोड़ा से हाईस्कूल और इन्टर परीक्षाएं उस जामने में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थी। वर्ष 1911 में इलाहाबाद से प्रथम श्रेणी में बी.ए. की परीक्षा पास की जिसके बाद उन्हें दानवीर घनानन्द खण्डूड़ी द्वारा मिली आर्थिक सहायता से 1913 में इंग्लैण्ड में आगे पढ़ने के लिए चले गए। जिसके बाद मुकुन्दीलाल साल 1919 में बार-एट-ला की डिग्री प्राप्त कर भारत लौट आए। इंग्लैंड में पढ़ाई के साथ-साथ मुकुन्दीलाल भारतीय कम्युनिस्ट नेता सकलातवाला, प्रवासी स्वाधीनता संग्राम सेनानी शिव प्रसाद गुप्त, प्रो. हेराल्ड लास्की, प्रो. गिलवर्ट गेर, दार्शनिक वर्टेड रसेल और साहित्यकार बर्नाड शा जैसे नामी लोगों के साथ उनका उठना-बैठना होता था। इसी दौरान उनकी मुलकात साल 1914 में महात्मा गाँधी जी से हुई। अपनी पढ़ाई के दिनों में मुकुन्दीलाल बोल्शेविक साहित्य से काफी प्रभवित हुए। उन्होंने 6 अप्रैल 1919 को बार-एट-ला की डिग्री प्राप्त हुई जिसके बाद वे अपने योरोपीय आदर्शवाद और मार्क्सवादी विचारों को लेकर भारत की ओर रुख किया। जिसके बाद जैसे ही उन्होंने भारत में कदम रखा उन्हें बम्बई में खुफिया पुलिस के द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया। जिसका कारण यह दिया गया कि उनके पास माक्र्सवादी विचारों और साहित्य का होना था। इस खबर के बाद करेण्डकर और 'हिन्दू' के सम्पादक कस्तूरी रंगा अय्यर, मुकुन्दीलाल से मिलने बम्बई में पहुंचे। जहाँ अय्यर जी ने मुकुन्दीलाल को मद्रास आने तथा अपने साथ 'हिन्दू' में काम करने का ऑफर दिया। मुकुन्दीलाल ने उनका आमंत्रण ठुकरा इलाहाबाद पहुंचे जहाँ स्वयं पण्डित नेहरू ने इनका गर्मजोशी से स्वागत किया।


    राजनेतिक जीवन


    इस दौरान इन्हें राष्ट्रीय नेताओं पण्डित मोती लाल नेहरू, जवाहर लाल नेहरू, रामेश्वरी नेहरू, सुन्दरलाल और महात्मा गाँधी जैसे नेताओं के सम्पर्क में आने का मौका मिला। मुकुन्दीलाल ने अपने विचारों से सबको प्रभावित किया और जिसके बाद ये पूरी तरह से राजनीति में उतर आए। कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर साल 1919 में मुकुन्दीलाल जी लैन्सडौन में वकालत करने का फैसला लिया। जिसके बाद इनका सामना स्वतंत्रता सेनानियों और आन्दोलनकारियों से हुआ। उसी दौरान उनकी मुलाकात पहली बार जिन्ना से हुई जब वो प्रतिनिधिमण्डल के साथ अमृतसर कांग्रेस में सम्मिलित होने पहुंचे।


    गढ़वाल पहुँचने पर इन्होंने कांग्रेस की स्थापना की और 800 लोगों को इसका सदस्य बनाए। उसी समय पूरे गढवाल में कुली-बेगार आन्दोलन की आग की तरह फेल रहा था और मुकुन्दीलाल इस आन्दोलन का हिस्सा बन गए। इस आन्दोलन में इन्हें गढ़वाल को करीब से जानने का मौका मिला। इस आन्दोलन में मुकुन्दीलाल को चौन्दकोट के केसर सिंह रावत, योगेश्वर प्रसाद बहुखण्डी, मंगतराम खन्तवाल, हरिदत्त बौड़ाई, भैरव दत्त धूलिया, ईश्वरी दत्त ध्याणी, भोला दत्त चन्दोला, जीवानन्द बडोला, गोवर्धन बडोला, रघुवर दयाल और हयात सिंह जैसे आंदोलनकारी सहयोगी मिले। साल 1923 और 1926 में बैरिस्टर मुकुन्दीलाल गढ़वाल से प्रान्तीय कौंसिल के रूप में चुना गया। जिसके बाद इन्हें साल 1927 में कॉउंसिल के उपाध्यक्ष के रूप में चुना गया। साल 1930 में कांग्रेस आन्दोलन शुरू होते ही इन्होंने कांग्रेस से अपना नाता तोड़ दिया। साल 1930 से 1962 तक का ऐसा समय था जिसमें ये गैर कांग्रेसी तथा स्वाधीनता आंदोलनों से जुड़े रहे। साल 1930 में मुकुन्दीलाल एबटाबाद (अब पाकिस्तान में) जा पहुँचे जहाँ उन्होंने इतिहास प्रसिद्ध में पेशावर काण्ड के सिपाहियों की पैरवी की और उन्हें फांसी से बचाया। जबकि अंग्रेज सरकार अपने इस अपमान का बदला फांसी पर चढ़ा कर चुकाना चाहती थी। 1938 से लेकर 1943 तक इन्होंने टिहरी रियासत हाईकोर्ट के जज और 16 वर्षों तक टरपेन्टाइन फैक्ट्री, बरेली के जनरल मैनेजर पद पर रह कर कार्य किया। कांग्रेस से अपने पद से इस्तीफा देने के 32 साल बाद और प्रान्तीय कॉउंसिल के लिए साल 1936 में हुए चुनाव में पराजित होने के 26 साल बाद, साल 1962 में इन्होंने फिर से गढ़वाल से वि.सभा के लिए निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में रहते हुए चुनाव लड़ा और भारी मतों से जीत हासिल की। इस जीत के बाद ये फिर काँग्रेस से जुड़ गए। साल 1967 के बाद से उन्होंने हर तरह से राजनीति से दुरी बना ली पर किसी ना किसी रूप से गढ़वाल से जुड़े मामलों पर उनका ध्यान रहता था।


    कला समीक्षक व साहित्यिक जीवन


    गढ़वाल के महान चित्रकार मोला राम को देश दुनिया के सामने लाने का श्रेय मुकन्दी लाल को जाता है। उन्होंने साल 1969 में भारत सरकार के प्रकाशन विभाग ने ‘गढ़वाल पेन्टिंग्स’ नामक इनकी प्रसिद्ध पुस्तक का प्रकाशन किया। पर इस पुस्तक के कुछ ऐसी तस्वीरें थी जो विवाद और चर्चा का विषय बनी रही। 'मौलाराम स्कूल आफ गढ़वाल आर्ट' की स्थापना का पूरा श्रेय मुकुन्दीलाल को ही जाता है।


    सम्पादक जीवन


    लैन्सडौन से मेजनी के 'यंग इटली' की तर्ज पर 'तरुण कुमाऊँ' मासिक पत्र का सम्पादन का प्रकाशन साल 1922-23 में आरम्भ किया। मुकुन्दीलाल लगातार 75 वर्षों तक लेखन के काम से जुड़े रहे।


    मुकुन्दी लाल थे कुशल आखेटक


    मुकुन्दीलाल को कुशल शिकारी के रूप में भी जाना जाता था इस दौरान इन्होंने 5 शेर और 23 बाघ भी मारे। 'भारती भवन' जो कोटद्वार (उत्तराखंड) में स्थित है वर्तमान समय में यह पक्षियों और दुर्लभ फूलों का एक छोटा-मोटा संग्रहालय बन चूका है।


    मुकुन्दीलाल अपने जीवनकाल में गढ़वाल के उत्थान के लिए हमेशा ही आगे रहते थे पर वो बिलकुल भी अलग उत्तराखण्ड राज्य के पक्ष में रहे। गढ़वाल कमिश्नरी का सृजन और इन्होंने अपने 97 वर्षों के जीवनकाल में सभी धर्मों से जुड़ाव रखा जिनमें आर्य समाज, ईसाई, सिख, हिन्दू, बौद्ध आदि। बतौर बौद्ध रहते ही निर्वाण प्राप्त कर लिया। उत्तराखण्ड के प्रथम और अन्तिम बैरिस्टर मुकुन्दीलाल, चित्रकला के अमर अन्वेषक अपनी सृजनात्मक, गुणात्मक और भावात्मक विशिष्टताओं में ख्याति प्राप्त, अमर मानवतावादी स्व. मुकुन्दीलाल जी को नमन।


    सम्मान


    साल 1972 में इन्हें उ.प्र. ललित कला अकादमी की फेलोशिप से सम्मानित किया गया। अखिल भारतीय कला संस्थान ने साल 1978 में इन्हें अपनी स्वर्ण जयन्ती के अवसर पर सम्मानित किया।

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