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    विक्टर मोहन जोशी

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    Victormohanjoshi

    विक्टर मोहन जोशी

     जन्म:  जनवरी 1, 1896
     जन्म स्थान: अल्मोड़ा
     पिता:  श्री जयदत्त जोशी
     माता:  -
     उपाधि  देशभक्त
     व्यवसाय:  आंदोलनकारी, समाजसेवी
     मृत्यु  अक्टूबर 04, 1940

    "अल्मोड़ा के ईसाई कार्यकर्ता श्री विक्टर मोहन जोशी ईसाई समाज के उत्कृष्टतम पुष्पों में से एक हैं, जिन्होंने असहयोग आंदोलन में अपने त्याग एवं कष्ट सहिष्णुता के द्वारा प्रमाणित किया कि वे किस धातु के बने हैं" - महात्मा गांधी।


    ‌विक्टर मोहन जोशी एक निडर आंदोलनकारी, समाजसेवी, गांधीवादी विचारधारा के अनुयायी, कुशल संपादक रहे। इनका जन्म अल्मोड़ा में हुआ था। इनके पिता जयदत्त जोशी जी भी कई आंदोलनों में हिस्सा ले चुके थे। शायद पिता से प्रेरणा लेकर ही मोहन जोशी जी में देश की आजादी के लिये ललख जली। जयदत्त जोशी जी ने ईसाई धर्म अपना लिया था। जिस कारण इन्होने अपने बेटे का नाम विक्टर जोसफ रखा लेकिन उनकी माँ का लगाव हिन्दू धर्म के प्रति ज्यादा था सो उनके कहने पर मोहन नाम को परिवर्तित नहीं किया गया। और विक्टर मोहन जोशी इनका पूरा नाम हुआ।


    पढ़ाई


    ‌मोहन जोशी जी ने 1917 में इलाहाबाद के इरविन क्रिश्चियन काॅलेज से बी.ए. किया। हिंदी, अंग्रेजी के विद्वान थे।


    करियर


    ‌1916 में ‘कुमाऊँ' परिषद में उनकी अहं भूमिका थी। उन्होंने क्रिश्चियन फ्रेंड्स एसोसिएशन और क्रिश्चियन यंग पीपुल सोसाइटी बनायी। 1920 में क्रिश्चियन नेशनलिस्ट अंग्रेजी समाचार पत्रिका शुरू की। ईसाई समाज से अनुरोध किया अपने पैगम्बर ईसा मसीह की भांति नागरिक स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करें। इस पत्रिका ने विचारशील ईसाइयों को राष्ट्रीय आंदोलन में खींचा। उनमें अल्मोड़ा के पादरी यूनुससिंह, डॉ. मनोहर मसीह, सुश्री जैमाना थी। जोशी जी की राष्ट्रीय भावनाओं को देखते हुए गांधी जी ने अखिल भारतीय कांग्रेस का सदस्य मनोनीत किया। 1921 में वे अल्मोड़ा लौट के आ गये। 1921 के कुली बेगार प्रथा के खिलाफ हुए आंदोलन में भी जोशी जी का योगदान रहा। बद्रीदत्त पाण्डे जी के जेल जाने के बाद ‘शक्ति अखबार’ का सम्पादन किया। 1923 में भिकियासैंण में आजादी के आंदोलन में इन्हे गिरफ्तार भी किया गया। 150 रुपये वेतन में मात्र 75 रुपए लेते थे। शेष कताई और खादी प्रचार में लगाते थे। कताई-बुनाई-खादी का खूब प्रचार किया। जिला परिषद के मेलों में 'कतुवा' दंगल कराये। 1928 में त्याग पत्र दिया और कांग्रेस के संगठनात्मक काम में लग गए।


    जागरूकता हेतु प्रकाशित किया स्वाधीन प्रजा


    ‌हरगोविन्द पन्त जी और बद्रीदत्त पाण्डे जी इन्हे देशभक्त कहकर संबोधित करते थे। 1925 में अल्मोड़ा जिला बोर्ड का अध्यक्ष भी रहे, बाद में इन्होनें यह पद छोड़ दिया था। जनता को आजादी के जागरूक करने हेतु 'स्वाधीन प्रजा' नामक साप्ताहिक अखबार भी प्रकाशित किया। अपने इस अखबार में छपी खबरें अंग्रेज सरकार को परेशान करने लगी, जिस कारण उन्होने स्वाधीन प्रजा अखबार पर 6 हजार रूपये की जमानत लगा दी। परन्तु जोशी जी ने अंग्रेजों को जमानत देने के बजाय अखबार को बंद कर दिया।


    महात्मा गाँधी से थे प्रभावित


    ‌1928 में संयुक्त प्रान्त के गवर्नर अल्मोड़ा आए। जोशी उनसे मिले और अल्मोड़ा, नैनीताल जिलों में भूमि बंदोवस्त रूकवा दिया। जोशी जी ने स्वराज मंदिर की स्थापना भी की। जिसका शिलान्यास महात्मा गांधी द्वारा कराया, जिस साल वे कौसानी यात्रा पर आये थे। गाँधी जी मोहन जोशी जी के कार्यों से काफी प्रभावित हुये और अपने द्वारा लिखी पुस्तक यंग इण्डिया में 'ईसाई समाज का उत्कृष्टा पुष्प' कहकर संबोधित किया। 1929 में गांधी जी की कुमाऊँ यात्रा के दौरान जोशी जी उनके साथ रहे। गाँधी जी की डांडी पर 12 मील तक कांधा लगाया। जिससे कांधा सूज गया।


    जीवन की सबसे मर्मस्पर्शी घटना


    ‌1930 में झण्डा सत्याग्राह का नेतृत्व भी किया, यह उस समय अल्मोड़ा की अपने आप में एक बड़ी घटना थी। उन्होंने नगर पालिका भवन पर तिरंगा फहराने का संकल्प लिया था। इसी झण्डा सत्याग्रह के दौरान हुये लाठी चार्ज में इनके सर और रीढ़ की हड्डी में काफी चोटे आई। जोशी जी प्राय: तिरंगा हाथ में लेकर बड़ी तन्मयता से गाते थे, इसकी शान न जाने पाये, चाहे जान भले ही जाए। "इस दुर्घटना के बाद वे अत्यंत भावुक हो गए थे - "शर्म है मेरा जन्म हिन्दुस्तान में हुआ, जहाँ राष्ट्रीय ध्वज का अपमान होता है।" यह उनके लिए असह्य था। यह उनके लिए असह्य था। 1931 में बागेश्वर में उन्होंने विदेशी कपड़ों की होली, मेले के अवसर पर जलाई। 1932 बागेश्वर मेले में गिरफ्तार हुए। छ: महीने की सजा हुई। दो सौ रुपया जुर्माना हुआ।


    मृत्यु


    ‌कहा जाता है कि उनके सर की चोट अन्दरूनी घाव कर गई जिस कारण धीरे-धीरे इनका मानसिक संतुलन बिगड़ गया। उन्होने धीरे धीरे लोगों से मिलना जुलना कम कर दिया। आखिरकार 4 अक्टूबर 1940 को 44 वर्ष की आयु में इनका निधन हो गया।


    सम्मान


    ‌आजादी में उनके योगदान को देखते हुये अल्मोडा के राजकीय महिला अस्पताल में 12 फरवरी, 2004 को उनकी मूर्ति लगाई गई, इसे विक्टर मोहन जोशी महिला चिकित्सालय के नाम से जाना जाता है। बागेश्वर का राजकीय इंटर काॅलेज भी उनके नाम पर रखा गया है- 'विक्टर मोहन जोशी मेमोरियल राजकीय इंटर काॅलेज'। अल्मोड़ा के एन.टी.डी. (नारायण तेवाड़ी देवाल) क्षेत्र में उनकी समाधि स्थल है।

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