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    मोहन लाल साह

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    मोहन साह (1895-1946: खजांची मोहल्ला, अल्मोड़ा। कुमाऊँ में लाल बैंकिंग व्यवसाय के जन्मदाता। स्वतंत्रता संग्रामी, देशप्रेमी, विधिवेता, राजनीतिज्ञ, समाज सेवी, नैनीताल नगरपालिका के पहले भारतीय अध्यक्ष। कुमाऊँ की धरती पर जन्मा एक श्रेष्ठ पुरुष।

    हाईस्कूल तक शिक्षा अल्मोड़ा में ग्रहण की। स्वामी सत्यदेव परिब्राजक और श्री बद्री साह ठुलघरिया जी के सम्पर्क में आए और एक क्रान्तिकारी दल के सदस्य बन गए । अल्पायु में ही पत्नी का देहान्त हो जाने के कारण क्रान्तिकारी गतिविधियों में विघ्न पड़ गया। उच्च शिक्षा हेतु म्योर सेन्ट्रल कालेज, इलाहाबाद में भर्ती हो गए। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारतीय रक्षा सेना में भर्ती हो गए ताकि वहां प्राप्त प्रशिक्षण क्रान्तिकारी गतिविधियों में लाभदायक सिद्ध हो सके। 1919 में इन्होंने बी.ए. की परीक्षा पास की। इनके देशप्रेम का यह आलम था कि तत्कालीन कुमाऊँ कमिश्नर मि.विंडहम को इन्होंने एक देशप्रेम भरा पत्र लिख डाला। फलस्वरूप इनके पिता को जिला नैनीताल की खजांचीगिरी की नौकरी से हाथ धोना पड़ा। 1922 में इनके पिता का देहान्त हो गया। पिता की मृत्यु के बाद इन्हें पढ़ाई छोड़कर अपने पैतृक बैंकिंग व्यवसाय को सम्भालना पड़ा। बैंकिंग के सिलसिले में इन्हें आला अंग्रेज अफसरों से सम्पर्क बनाए रखना पड़ता था। अपने राजनैतिक जीवन का शुभारम्भ इन्होंने रानीखेत कैन्टोनमेन्ट बोर्ड की सदस्यता से किया। 1923-27 की अवधि के बीच ये बोर्ड के सदस्य और उपाध्यक्ष रहे। 1927 में इन्होंने इलाहाबाद वि.वि. से एम.ए.एल.एल.बी. की परीक्षा उत्तीर्ण की और कुछ समय तक इलाहाबाद उच्च न्यायालय में सर इकबाल अहमद और श्री प्यारेलाल बनर्जी के जूनियर के रूप में वकालत की। छोटे भाई के आकस्मिक निधन के कारण इन्हें परिस्थितिवश घर लौटना पड़ा।

    बीसवीं सदी के प्रारम्भिक दशकों में यहां बैंकों की कोई सुविधा उपलब्ध नहीं थी। साह जी ने 1928 में 'दुर्गा शाह मोहनलाल शाह' बैंक की स्थापना कर इस अंचल के निवासियों को आधुनिक बैंकिंग सुविधाएं उपलब्ध कराई। रानीखेत, अल्मोड़ा, नैनीताल में बैंक की शाखाएं खोलीं। बाद के वर्षों में 'कूर्माचल नगर सहकारी बैंक' की स्थापना इसी बैंक को केन्द्र बिंदु रख कर हुई। 1921 से 1923 तक और पुन: 1933 से 1940 तक लगातार साह जी नैनीताल नगरपालिका के सदस्य और वरिष्ठ उपाध्यक्ष रहे। 1935 में इन्हें नैनीताल नगरपालिका का प्रथम भारतीय अध्यक्ष होने का गौरव प्राप्त हुआ। प्रथम निर्वाचित अध्यक्ष होने का सौभाग्य राय बहादुर जशोद सिंह बिष्ट जी को मिला। अपने पिता की पुण्य स्मृति में साह जी ने नैनीताल में प्रसिद्ध दुर्गा साह म्यूनिसिपल लाइब्रेरी की स्थापना की।

    वित्तीय एवं बैंकिंग का ज्ञान होने के कारण 1934 में सरकार ने इन्हें यू.पी. बैंकिंग इन्क्वायरी कमेटी और उ.प्र. विधान परिषद का सदस्य मनोनीत किया। 1937 में इन्होंने स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में उ.प्र. विधान परिषद का चुनाव लड़ा और कांग्रेस उम्मीदवार कुमाऊँ केसरी बद्रीदत्त पाण्डे जी को परास्त कर विजय प्राप्त की। मृत्युपर्यन्त आप परिषद के सम्माननीय सदस्य रहे। साह जी निर्भक स्वभाव के पुरुष थे। कभी-कभी ऊंचे से ऊँचे अधिकारी से भी भिड़ जाते थे। बड़ी शानो शौकत से रहते थे आप। आपने -समय पर बागवानी, नस्ल-नस्ल के कुत्ते रखना 'डाग-शो' में भाग लेना और भवन निर्माण के शौक अपनाए।

    1937 तक साह जी किसी राजनैतिक पार्टी में नहीं थे। तब तक आप गोविन्द बल्लभ पन्त जी के सम्पर्क में आ गए थे , किन्तु कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण नहीं की थी। द्वितीय विश्व युद्ध के समय अपने सारे वैभव त्याग कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर सबको आश्चर्य चकित कर दिया। 1939 में पंत जी के बाद नैनीताल जिले में ये दूसरे सत्याग्रही , जिन्हें छः माह कारावास का दण्ड मिला। पं. गोविन्द बल्लभ पन्त और हरगोविन्द पन्त के साथ अल्मोड़ा जेल में रहे। जेल से रिहाई के बाद साह जी कांग्रेस के संगठन और समाज सेवा में लग गए। जगह-जगह जाकर सार्वजनिक भाषणों द्वारा आपने अंग्रेजों द्वारा किए जा रहे अत्याचारों की तीव्र भत्र्सना की। परिणामस्वरूप 1942 में गिरफ्तार कर लिए गए । डी. आई.आर. के तहत मुकदमा चला। मुकदमे की पैरवी पं. नेहरू, डा. कैलाश नाथ काटजू और केशव देव मालवीय जी ने की। भारत छोड़ो आन्दोलन में भी इन्हें गिरफ्तार किया गया। लेकिन जेल की खिड़की से ही इन्होंने एक जोशीला भाषण दे डाला। इस पर जिला कलक्टर, नैनीताल ने इन्हें यह कहकर डी. आई. आर. में नजरबन्द कर बरेली जेल भिजवा दिया कि- "He has done a crime over crime"। बरेली जेल में स्वास्थ्य गिर जाने के कारण पं. बद्रीदत्त पाण्डे को और इन्हें अल्मोड़ा जेल स्थानान्तरित कर दिया गया ।

    1944 में सम्पूर्ण उड़ीसा दुर्भिक्ष और महामारी की चपेट में आ गया। साह जी वहां 'सर्वेन्ट्स आफ इण्डिया सोसायटी' के कार्यकर्ता के रूप में पहुंचे और सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में दवाइयां व अन्य सामान बांटने लगे। वहां से लौटकर 'कस्तूरबा गाँधी स्मारक निधि' के लिए धन संग्रह करने लगे। उन दिनों ऐसे कार्यों के लिए चंदा वसूलना सहज कार्य नहीं था, फिर भी आपने रु. 45,000 एकत्र कर नैनीताल जिले को प्रथम स्थान दिलाया।

    1945 में इंग्लैण्ड में चर्चिल की सरकार गिर गई। कांग्रेस के सभी नेता जेल से रिहा कर दिए गए । भारतीयों को सत्ता सौंपने की वार्ताएं होने लगीं। आम चुनाव करवाए गए। पं. पन्त की अध्यक्षता में उ.प्र. में कांग्रेस की सरकार बनी। पार्लियामेन्ट्री सेक्रेट्री के रूप में साह जी को मंत्रिपरिषद में सम्मिलित किया गया। चौधरी चरण सिंह ने भी उस दिन संसदीय सचिव के रूप में शपथ ग्रहण की थी। उ.प्र. को मोटे कपड़े की आपूर्ति करवाने के सिलसिले में एक बार इन्हें बम्बई जाना पड़ा। यात्रा में आपका स्वास्थ्य अत्यन्त खराब हो गया और 30 अगस्त 1946 को अचानक हृदयगति रुक जाने से उत्तराखण्ड का यह 'लाल' काल के हवाले हो गया । पुरवासी अंक-16 में श्री मदन लाल साह का लेख।

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