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    गढ़वाली भाषा की प्रगति यात्रा

    भारत क मध्य पहाड़ी क्षेत्र के अन्तर्गत उत्तराखण्ड प्रदेश को दो मण्डलों में बाँटा गया है। इस पहाड़ी प्रदेश की प्रमुख दो भाषाएं हैं - कमाउनी और गढ़वाली। इस प्रदेश के भाषिक क्षेत्र के निर्माण में यहां के भूगोल और इतिहास का समन्वयात्मक स्वरूप दृष्टिगत होता है। भाषा एक परम्परा व समूह स स्वीकृत होती है। सदियों से इस प्रदेश के भाषा-भाषियों ने अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति अपनी मातृभाषा में की है। भाषा वह सूत्र है जो कि हमें अपने इतिहास का पुन: दर्शन कराता है। भाषा और उसके प्रगतिशील साहित्य के माध्यम से यहाँ के सामाजिक और वैचारिक सम्पदा और परम्पराओं का पोषण हुआ है। गढ़वाली तथा कुमाउनी दोनों ही भाषाओं के साहित्य ने यथोपरि दायित्व का निर्वहन किया है।


    जहाँ तक गढ़वाली भाषा व साहित्य के विकास की हम बात करें तो उसकी प्रकृति, स्वरूप और साहित्य की विविध विधाओं के विषय में विचार करना आवश्यक है। गढ़वाली भाषा में लेखन का माध्यम देवनागरी लिपि है। विश्व की प्राचीनतम लिपि ब्राह्मी लिपि मानी जाती है। भारतीय भाषाओं की लिपियों का जन्म ब्राह्मी लिपि से हुआ है और देवनागरी का उद्गम भी ब्राह्मी लिपि है। गढ़वाली भाषा के पुराने अक्षर ब्राह्मी लिपि से मेल खाते हैं। भारत की ऐसी कोई आर्य भाषा नहीं है जिसका शब्द समूह संस्कृत से निर्मित न हुआ हो। फलत: गढ़वाली भाषा के शब्द भण्डार की भी वृद्धि में संस्कृत के तत्सम व तद्भव शब्दों का योगदान है। इसके अतिरिक्त भी अनार्य भाषाओं के शब्द भी गढ़वाली भाषा में समाहित हुए हैं। भारत के ही नहीं विदेशों की अनेक जातियों ने गढ़वाल में प्रवेश किया, जिनके समय-समय पर आगमन से उनकी भाषाओं के शब्दों ने गढ़वाली भाषा के शब्दों के साथ तालमेल स्थापित किया।

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