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    सालम क्रांति

    भारत की आजादी के लिए हुए आन्दोलनों में उत्तराखण्ड के विभिन्न क्षेत्रों में भी लोगों ने हर कदम पर आगे आकर अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। 25 अगस्त 1942 का दिन था जब अल्मोड़ा के सालम क्षेत्र में भारत छोड़ों आन्दोलन के लिए एक ऐसी ही क्रांति हुई। पनार नदी के आर पार स्थित तल्ला सालम और मल्ला सालम अल्मोड़ा के पूर्वी भाग में स्थित है।


    1919 में क्रांतिकारी, समाज सेवी राम सिंह धौनी ने सालम व इसके आस पास के क्षेत्र में आन्दोलन के लिए आम जन में अलख जलाई। उनके नेतृत्व में लोग आगे आए और उनकी मृत्यु के बाद दुर्गादत्त पाण्डे शास्त्री, रेवाधर पाण्डे, प्रताप सिंह बोरा, रामसिंह आजाद आदि लोगों ने यहां आंदोलन की कमान संभाली।


    अल्मोड़ा के शहरफाटक में 23 जून 1942 के दिन मंडल कांग्रेस की एक सभा में गोविंद बल्लभ पंत जी ने झंडा फहराया था जिसे बाद में राजस्व पुलिस द्वारा उतार लिया गया था जिसके खिलाफ में सभी आंदोलनकारियों ने शहरफाटक के करीब सालम क्षेत्र में 11 स्थानों पर 1 अगस्त 1942 को झंडा फहराने का निर्णय किया। उधर भारत छोड़ो आंदोलन और करो या मरो आंदोलन का प्रस्ताव पास होने के कारण महात्मा गांधी, उत्तराखण्ड के प्रतिनिधि गोविन्द बल्लभ पंत आदि को हिरासत में ले लिया और पूरे देश में सभी नेताओं, कार्यकर्ताओं, आंदोलनकारियों का नेतृत्व करने वालों को पुलिस गिरफ्तार करने लगे। इसी गिरफ्तारी के तहत 11 अगस्त को यहां राम सिंह आजाद को पुलिस दल उनके गांव सांगण पहुंच गया लेकिन राम सिंह आजाद उन्हें चकमा देने में कामयाब हो गये। 19 अगस्त को जब कार्यकर्ता नौगांव में आगामी कार्यक्रमों के बारे में कार्ययोजना बनाने हेतु मिले तो पुलिस ने इन्हें घेरकर समस्त 14 कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस बल जब इन्हें रात के अंधेरे में ले जाने लगी तो सभी आजादी के गीत गाकर चलने लगे। आस पास के सभी गांवों में इनकी गिरफ्तारी की बात फैली तो सभी गांव इकट्ठा होकर कार्यकर्ताओं को छुड़ाने आ गए। भीड़ को डराने की नीयत से पटवारी ने हवाई फायर की तो भीड़ ने विद्रोह में पुलिस बल पर हमला करकर पुलिस को भगा दिया। उसी रात तय हुआ कि जल्द ही पास के धामदेव व जैंती के विद्यालय में सब एकत्रित होंगें और इस गिरफ्तारी का विरोध प्रदर्शन करेंगें।


    25 अगस्त की सुबह थी जब आसपास के सभी गांवों के ग्रामीण तिरंगे और ढोल बाजों के साथ धामदेव के मैदान में इकट्ठा हो गये और देशभक्ति के नारे लगाने लगे। यह बात जब ब्रिटिश सरकार को पता चली तो उन्होनें दल बल के साथ अपनी पुलिस वहां भेजी। जब पुलिस बल गांव क पास पहुंची तो सभी ग्रामीणों ने इसका विरोध किया। जनता को देखकर फिर हवाई फायरिंग करके उन्हें डराने का प्रयास किया गया। फायरिंग के जवाब में जनता ने बचाव में पत्थरों की बौछार शुरू कर दी। पत्थरों की बारिश के बीच पुलिस की एक गोली चैकुना गांव के नर सिंह धानक व एक गोली काण्डे गांव के टीका सिंह कन्याल को लग गयी और वे शहीद हो गये। इस गोलीकाण्ड में दो लोग शहीद व कई बुरी तरह घायल हुए।


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