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    गुमानी पंत व लोकरत्न

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    gumanipanth

    गुमानी पंत व लोकरत्न

     जन्म:  मार्च 11, 1790
     जन्म स्थान: काशीपुर, उधमसिंह नगर
     पैतृक निवास: उपराड़ा (गंगोलीहाट), पिथौरागढ़
     पिता:  पं. देवनिधि पंत
     माता:  देवमंजरी
     व्यवसाय:  संस्कृत के कवि और रचनाकार
     निधन:  1846

    इनका मूल नाम लोकनाथ / लोकरत्न था। गुमानी पंत संस्कृत और हिन्दी के कवि थे। पंत जी कुमाऊँनी के साथ साथ नेपाली बोली के भी प्रथम कवि थे। इन्हे खड़ी बोली का प्रथम कवि भी माना गया है। इनके दादा जी पं. पुरूषोत्तम पंत जी वैघ थे। पं. पुरूषोत्तम पंत जी चंदवंशी राजाओं के राज्य में वैघ थे। गुमानी जी के दादा व पिता ही इन्हे प्यार से गुमानी कहते थे। परंतु कुछ लोगो का कहना ये भी है कि राजा गुमान सिंह के वहां राजकवि होने के कारण इनका नाम "गुमानी" पड़ा। गुमानी पंत जी का बचपन अपने गांव उपराड़ा, अल्मोड़ा व काशीपुर में बीता। इनकी शिक्षा भी अल्मोडा में इनके चाचा के निगरानी में हुई। बाद में आगे की शिक्षा ग्रहण करने के लिये यह इलाहाबाद चले गये थे। ज्ञान की खोज में ये कई सालों तक हिमालयी क्षेत्रों में भी भ्रमण करते रहे।


    राजकवि के रूप में पंत जी की नियुक्ति सबसे पहले काशीपुर के राजा गुमान सिंह देव के राजदरबार में हुई। कुछ समय के लिये पंत जी टिहरी के नरेश सुदर्शन शाह के वहां भी रहे। गुमानी जी ने उस वक्त गोरखा शासकों के अत्याचारों के खिलाफ अपनी कलम से बखूबी काम लिया। जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने अपनी पुस्तक "लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया" में गुमानी पंत जी को कुमाऊँ का सबसे प्राचीन कवि माना है।


    गुमानी जी की रचनाओं में संस्कृत,हिन्दी, कुमाऊँनी, नेपाली मिश्रित रहती थी। राम महिमा वर्णन, गंगा शतक, कृष्णाष्टक, चित्र पद्यावली, रामाष्टक, शतोपदेश, ज्ञान भैषज्य मंजरी, दुर्जनं दूषण, राम नाम पंचपंचाशिका, जग्गनाथाष्टक, कालिकाष्टक आदि इनकी प्रमुख रचनायें है।

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