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    गिन्दी मेला (गेंद का मेला) तथा गेंदुवा मेला (हिंडोड़ा)

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    उत्तराखण्ड में विभिन्न लोकउत्सव ऐसे हैं जिनमें सभी वर्गों के लोगो की भागीदारी रहती है। जिनमें व्यसायिक उत्सव, पशुचारक उत्सव , खेलोत्सव , कृषि व पशुपालकोत्सव आदि सभी प्रकार के उत्सव हैं। ऐसे ही दो खेलोत्सव या क्रीड़ाउत्सव हैं जो मकर संक्रांति के दिन मनाये जाते हैं -



    गिन्दी मेला / गेंद का मेला -


    गिन्दी मेला एक प्रकार का खेल उत्सव है जो कि प्रतिस्पर्धा, साहस, आनन्द का प्रतीक है। मकर संक्रांति के अवसर पर यह उत्सव वैसे तो गढ़वाल के कई क्षेत्रों में जैसे थल नदी, देबीखेत, डांडामंडी, दालमीखेत, मावाकोट, सांगुड़ा बिलखेत आदि स्थानों में आयोजित होता है लेकिन पौढ़ी गढ़वाल के यमकेश्वर विकास खण्ड के थल नदी और डांडामंडी का यह मेला गढ़वाल क्षेत्र में काफी प्रसिद्ध है। आसान तरीके से समझे तो यह एक प्रकार का रग्बी से मिलता जुलता खेल है। बस इस खेल के नियम अलग है जिसमें चमड़े की एक बड़ी गेंद बनायी जाती है जिसे पकड़ने केे लिए उसी में चमड़े के दो कंगन लगाये जाते हैं, ग्रामीणों के दो दल बनते हैं जो गेंद को अपनी तरफ खींचने का प्रयास करते हैं। इसमें खिलाड़ियों की संख्या असीमित होती है और न समय का कोई बन्धन।


    इस मेले में खेल दो क्षेत्रों या पट्टीयों के खिलाड़ियों के बीच खेला जाता है जो कि क्रमशः उदेपुर तथा अजमीर पट्टीयां हैं और स्थान थलनदी का मैदान होता है। खेल उत्सव की शुरूआत देवी और देवताओं की पूजा से होेती है। दिन में लोग अपने अपने क्षेत्र की ध्वजा लेकर ढोल-दमाऊ, नगाड़े बजाते हुए मैदान में एकत्रित होते है। उसके पश्चात गेंद का भी पूजन होता है। फिर खेेल शुरू होता है गेंद हवा में उछाली जाती है और यहीं से उसे लपककर अपने क्षेत्र की ओर को लाने का प्रयास करते हैं। जद्दोजहद चलती रहती है दर्शक और वाद्यवादक अपने अपने धड़े के लोगों का तालिया बजाकर, वाद्य बजाकर प्रोत्साहित करते हैं। लम्बे संघर्ष के बाद जिस दल द्वारा गेंद पर अधिकार जमाया जाता है उसकी जीत होती है। और वह दल गेंद को अपने साथ ले जाता है। विजय दल गांव ले जाकर अपने मंदिरों में पूजा करते हैं और विजय का उत्सव मानाया जाता है।



    गेंदुवा मेला / हिंडोड़ा-


    उत्तरकाशी के पुरोला तहसील में मकर सक्रांति के दिन गेंदुवा मेला आयोजित होता है। पुरोला तहसील के सिंगतूर पट्टी के गांव देवरा और गैच्वाणा गांव दो दलों में विभक्त होते हैं जिन्हें पानसाई तथा साठी कहते हैं। पानसाई को पांडवों का प्रतिनिधि माना जाता है तथा साठी को 60 कौरवों ( इस क्षेत्र की लोकपरंपराओं के अनुसार कौरवों की संख्या 60 मानी गई है ) का प्रतिनिधि माना जाता है। दोनों पक्षों में गेंद को अपनी तरह लाने के लिए संघर्ष होता है। महाभारत काल में कर्ण इस क्षेत्र में अपना शासन चलाते थे उसी समय से इस खेल का आयोजन करते हैं। माना जाता है कि जब पांडवो और कौरवों के बीच महाभारत का युद्ध हो रहा था तो अर्जुन के पुत्र बबरीक की मृत्य के बाद उसके सिर को हासिल करने के लिए ये संघर्ष हुआ था ।आज के दौर में यह खेल पांडव और कौरवों के युद्ध के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। कर्ण के एक वीर हिल्कुवा के नाम से यह मेला लगाया जाता है।


    परंपराओं के अनुसार देवरा गांव में जब कोई गाय मरती है तब उसकी खाल से फुटबॉल के आकार की एक गेंद बनाई जाती है जिसकी पूजा पाठ करने के बाद वनस्पतियों से तैयार किए गए लाल रंग की पॉलिश इस गेंद के बाहर से की जाती है। मैदान के बीच एक रेखा खींची जाती है , गेंद को दोनों दल फिर अपने अपने पाले में फेंकने का प्रयत्न करते हैं। इस खेल में 4 राउंड होते हैं जिसके ज्यादा अंक होते हैं वो विजेता होता है । टाई होने पर खेल का निष्कर्ष इस प्रकार किया जाता है कि मैदान के मध्य में दो मजबूत डंडे रखे जाते है जिनमें हुक लगाकर गेंद फंसाई जाती है फिर दोनों दलों से एक एक खिलाड़ी आकर गेंद को अपनी ओर खींचने का प्रयास करता है जो ज्यादा बार सफल होता है वो विजई घोषित होता है। दूर दूर गांवों से इस मेले को देखने लोग एकत्रित होते हैं। ढोल नगाड़ों , अपने अपने दलों को भीड़ की प्रोत्साहित करती ध्वनियां चारों ओर फैली रहती है।



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