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    भिटौली या भिटोई

    bhitauli or bhitoli or bhitoi festivel of kumaon

    चैत का महिना प्रकृति की मनमोहक रंगत के साथ-साथ कई त्यौहार भी लाता है। इस माह की शुरुआत फूल संक्रान्ति या फूल दे से होती है और चैत माह हिन्दू नव वर्ष का पहला महिना होता है। चैत महिना आते ही विवाहित स्त्रियों को अपने मायके की याद आने लगती है, उन्हें इन्तेजार रहता है अपने भाई का कि वो भिटौली लेके आता होगा। भाई को भी अपनी बहन इन्तेजार रहता है कब वो अपने बहन से मिले और कहता है - "ऐगो भिटौली को म्हैंणा, आस लागी रै हुनलि मेरि बैंणा" अर्थात भिटौली का महीना आ गया है, मेरी बहिन मेरे आने की राह देख रही होगी। इसमें महिला के पिता या भाई या कोई अन्य मायके से अपनी बेटी/बहन के लिये उसके ससुराल भेंट लेकर आते हैं। जिसमे पूरी, सिंगल, शैय, खजूर या जिसे सकल पारा भी कहते है, मिठाई, गुड़, वस्त्र व कुछ उपहार आदि सामर्थ्य के अनुसार होता है। यह त्यौहार विवाहित महिलाओं को उनके मायके से आने वाली भेंट का मौसम होता है या यह कहें कि यह ससुराल में गई कन्या और मायके की याद का भावनात्मक त्यौहार है। भिटौली मिलने के बाद उसे गांव या पड़ोस में भी बांटा जाता है। पहली भिटौली कन्या को बैसाख के महिने में दी जाती है, उसके बाद से फिर हर साल चैत मास में दी जाती है। पहाड़ मे चैत मास को काला महिना माना जाता है और इस माह मे शुभ कार्य नहीं किये जाते है इसलिए पहली भिटौली चैत मास मे नहीं दी जाती। (Bhitauli Festival of Uttarakhand)


    लेकिन अब जमाना बदल गया है पहाड़ के लोग दूर शहरों जैसे दिल्ली, मुंबई और अन्य राज्यों में बस गए है। उस स्थिति में पकवान और अन्य चीजें भेजना या लेजाना मुमकिन न होने के कारण इसकी जगह रूपए ने ले ली है। परंतु जो अभी पहाड़ में बसे है वो लोग अभी भी इस रिवाज को निभा रहे है।


    चैत में विवाहित महिलाओं की भावनाओं को यहां के गीतों में भी अभिव्यक्त किया गया है। चैती, ऋतुरैण, या खुदेड़ गीतों के रूप में इन्हें गाया भी गया है। ऐसे ही एक गीत-

    रितु ऐगे रणमणी, रितु ऐगे रैणा,
    डालि में कपुवा बासो खेत फली देंण,
    ईजु मेरी भाई भेजली भिटौली दिणा,
    रितु ऐगे रणमणी, रितु ऐगे रैणा,


    एक सखी दूसरी को चैत्र मास के आगमन पर कहती है कि सखी यह ऋतु चैत्र मास की आ गयी है। मेरी माँ मेरे भाई को भिटौली देने भेजेगी। इसी ऋतु मॆ एक पक्षी "कफुवा" जॊ कि चैत्र मास शुरू होते ही अपना विरह गीत जंगलों में गाने लगता है तब ससुराल में लड़की को अपने मायके की याद और अधीक आने लगती है यह उस समय होता है जब एक नवविवाहिता जंगल मे घास काट रही है तब उसे कफुवा पक्षी का स्वर सुनाई देता है। तब वह उस पक्षी को कहती है कि मेरे मायके मे जाकर चाहको ताकि मेरी माँ को मेरी "भिटौली" भेजने कि याद आ जाय। (Bhitauli Festival of Uttarakhand)


    "बास कफुआ मैतन को देशा,
    ईजा मेरी सुणली, तो भेटौली भेजली।"


    भिटौली एक क्षेत्रीय प्रथा है जिसमे विशेषकर भाई-बहनों के सम्बन्ध का ज्यादा मानवीयकरण किया गया है। जिस भाई कि बहन अथवा जिस बहन का भाई नही होता तब पिता या भाई-भतीजे बहिन को भिटौली दे आते है।


    भिटौली से जुड़ी कई लोक कहानियां भी पहाड़ो में विख्यात है। जिन्हें आप नीचे दिए लिंक पे क्लिक करके पढ़ सकते है।
    भिटोली - नरिया और देबुली की कहानी
    सचदेव और गोरिघना की कहानी


    लेकिन अब जमाना बदल गया है पहाड़ के लोग दूर शहरों जैसे दिल्ली, मुंबई और अन्य राज्यों में बस गए है। शहर में अधिकतर आज के जीवनशैली में समय की कमी के कारण भिटौली रूपये या उपहार भेजकर मना लिया जाता है। किन्तु पहाड़ों में अभी भी बेटी या बहन के घर जाकर भिटौली दी जाती है।

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