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    भविष्य बद्री - भविष्य का बद्रीनाथ

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    अथ श्री भविष्य-बदरी महात्म्य
    प्रायः कलौ मनुष्याणा मगम्या बदरी भवेत।
    यावद्विष्णुर्यही पृष्ठे यावदगंगा महेश्वरि।।
    तावद्वै बदरी गम्या दुर्गम्यों च ततः परम।
    बदरीनाथ यात्रा वै करिष्यति बहिः स्थलात्।
    गन्धमादनदक्षे च पाश्रार्वे मुनिजनप्रिये।
    पुलिने धवलाया वै बदरी तत्र विश्रुता।।


    केदारखण्ड अध्याय 58 श्लोक 68-69-70 अर्थात प्रायः कलयुग में मनुष्यों के लिये बदरिकाश्रम (बदरीनाथ) अगम्य होगा। जब तक भूतल पर विष्णु रहेंगे और जब तक गंगा रहेगी तब तक बदरिकाश्रम गम्य रहेगा और उसके बाद अगम्य हो जाएगा। तब बाहर की भूमि से लोग बदरीनाथ की यात्रा करेंगें। गन्धमादन (वर्तमान में चौखम्बा) पर्वत के दक्षिण पार्श्व में जो मुनिजनों को प्रिय है, धवला नदी (धौली) के तट पर बदरी प्रसिद्ध है अर्थात भविष्य बदरी वहीं होगा।


    सनत कुमार संहिता के अनुसार जब जोशीमठ में नृसिंह भगवान की मूर्ति की पतली बांह टूट जाएगी तब बदरीनाथ का वर्तमान मार्ग बन्द हो जाएगा और भगवान बदरी विशाल के दर्शन भविष्य-बदरी में होंगे। ई. टी. एटकिंसन ने 1884 में हिमालयन गजेटियर के अन्तर्गत इस मंदिर सम्बन्धी जन विश्वास को इस ग्रन्थ में भी उल्लेखित किया ( हिमालयन गजेटियर (भाग-2 पृष्ठ 514) एच. जी. वाल्टन जिनका गढ़वाल हिमालय का गजेटियर एटकिंसन के दो दशक बाद (1910) में प्रकाशित हुआ उसमें भी भविष्य बदरी का उल्लेख मिलता है।


    भविष्य बदरी की गणना सप्त बदरी के अन्तर्गत शामिल है जिनमें आदि बदरी (कर्णप्रयाग के निकट) योगध्यान बदरी (पाण्डुकेश्वर) भविष्य बदरी (सुभाई गांव, जोशीमठ के निकट) ध्यान बदरी (उर्गम, हेलंग के निकट) नृसिंह बदरी (जोशीमठ ) विशाल बदरी (बदरीनाथ)।


    बदरीनाथ मोटर मार्ग पर जोशीमठ से एक मार्ग विष्णु प्रयाग होते हुए श्री बदरीनाथ के लिये चला जाता है। जोशीमठ से एक अन्य मार्ग तपोवन सलघार, भलारी होते हुये नीति घाटी की ओर निकल जाता है। जोशीमठ से इस मार्ग पर 18 किमी की दूरी पर सलधार नामक स्थान है जहां से 4 किमी. को खड़ी चढ़ाई युक्त दूरी पार कर सुभाई गांव में स्थित भविष्य बदरी पहुँचा जाता है । सुभाई गांव में स्थित श्री भविष्य बदरी 2744 मीटर की ऊंचाई पर स्थित विकासखण्ड जोशीमठ तथा जिला चमोली के अन्तर्गत शामिल प्राचीनता एवम वास्तुशिल्प की दृष्टि से देवप्रयाग के रघुनाथ मंदिर, त्रियुगीनारायण पाण्डुकेश्वर मंदिर के समान ही है जिसकी स्थापना 8वीं शताब्दी के दौरान की निर्धारित की जाती है। सुभाई गांव एवम इस मंदिर से दो किमी ऊपर कैल (ब्लू पाइन) का घना जंगल है। जंगल के ऊपर खुली पर्वतमालायें और उनके ऊपर हिमश्रंग है। इस खुबसूरत घने जंगल के अन्दर एक सामान्य संरचना वाले मंदिर के भीतर एक शिलाखण्ड में अस्पष्ट रेखाकृति उभरी हुई है जो ग्रामवासियों व निकट के प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार बढ़ रही है। मान्यता है कि कालान्तर में बदरीनाथ धाम की पूजा इसी भविष्यबदरी में ही सम्पन्न होगी। इतिहासकार शिव प्रसाद नैथानी लिखते है कि ’घने जंगल के गधेरे के पार्श्व में एक चट्टान को काटकर 80×40 सेमी. की एक गुफा है उसमें चट्टान को काटते हुए एक मूर्ति के अंकन है जो स्पष्ट नही है। इसी अस्पष्टता ने भविष्य बदरी का नाम उभारा।


    ’’हिमालय दर्शन’’ के प्रसिद्ध लेखक एवम कवि श्री दिगम्बर दत्त थपलियाल ने अपने स्वयं के यात्रा स्मरणों के दौरान इस स्थान के विषय में (सन् 1960 के बाद का यात्रा संस्मरण) लिखा है- ’खूबसूरत घने जंगल के अन्दर लगभग 9000 फुट की ऊँचाई पर एक विशाल शिला है जिस पर एक अस्पष्ट रेखाकृति है जो ग्रामवासियों के अनुसार निरन्तर बन रही है और कालान्तर में बदरीनाथ मंदिर की भगवान विष्णु की पद्मासन स्थित आकृति का रूप ले लेगी तथा इसका भविष्य बदरी नाम सार्थक होगा। 29 सितम्बर 06 को इन पंक्तियों की लेखिका के भविष्य बदरी यात्रा के दृश्यावलोकन में वह गुफा या विशाल शिला एक साधारण संरचना वाले मंदिर में अपना स्थान बना चुकी थी। इस प्राकृतिक रूप में उद्बुद्ध प्रतिमा के दर्शन अधिकतर यात्रियों को इसलिए नहीं हो पाते क्योंकि मंदिर अधिकतर बंद रहता है। मंदिर द्वार के ताले की चाभी 2 किमी नीचे सुभाई गांव के किसी व्यक्ति के पास रहती है। लोग जालीदार द्वार से ही भविष्य के बदरी को प्रणाम कर सुभाई गांव या जोशीमठ की ओर बढ़ जाते है। मेरी यात्रा के दौरान इस मंदिर में कोई नियमित पुजारी नहीं था लेकिन ज्ञात हुआ है कि डिमरी ब्राहमणों द्वारा नित्य 6 मास तक (जब तक बदरीनाथ के पट खुले रहते है) नियमित पूजा होती रही है। पूजा में सुभाई ग्राम निवासियों का भी सहयोग रहता है। अपने मूर्ति वैशिष्ट्य के कारण घने जंगल के मध्य भविष्य बदरी नाम से सम्बोधित इस मंदिर को विशेष मान्यता दी जा रही है। भविष्य बदरी के निकट श्री सतपाल जी महाराज के आश्रम में कार्यरत चन्द्र मिश्रा ने हमें बताया कि छः साल पहले जब वह वहां आये थे तब प्राकृतिक रूप से प्रकट इस मूर्ति व पत्थर का आकार काफी छोटा था। इन छः सालों में मूर्ति का आकार करीब 2.5 फुट बढ़ा है। मूर्ति वाले स्थान को 100 साल से भी अधिक प्राचीन माना गया है। सर्वप्रथम भेड़ बकरी चुगाने वालों ने इस पर ध्यान दिया कि पत्थर के बीचों बीच एक मूर्ति स्वतः आकार ले रही है और उसका स्वरूप निरन्तर बढ़ रहा है। सम्भवतः यह हो न हो उस प्रचलित मान्यता की भी पुष्टि करता है जहां नृसिंह मंदिर में प्रतिष्ठित नृसिंह मूर्ति के सम्बन्ध में कहा जाता है कि नृसिंह मूर्ति का एक हाथ निरन्तर पतला होता जा रहा है। जिस दिन यह हाथ टूट कर गिर जाएगा तभी नर-नारायण पर्वत आपस में मिल जाएंगे और बदरीनाथ का मार्ग अवरूद्ध हो जाएगा । उस समय भगवान बदरीनाथ जी नए रूप में प्रकट होंगे। वह स्थान वर्तमान में यही भविष्य बदरी कहा गया है। कुमार संहिता में उल्लेख है कि विष्णु ज्योति ज्योर्तिमठ (जोशीमठ) से उठ जाएगी तो बदरीनाथ मनुष्य के लिए अगम्य हो जाएगा। केदारनाथ में भविष्य बदरी के सम्बन्ध में उल्लेख मिलता है कि पूर्वकाल में अगस्त्य मुनि ने भगवान श्री हरि की अराधना इसी स्थान में की थी। श्री विष्णु ने अगस्त्य मुनि से कहा था कि घोर कलयुग में जब बदरीनाथ मनुष्यों के लिये अगम्य होगा तब बदरीनाथ भविष्यबदरी में पूजित होंगे। तपोवन एवम् सलधार के निकट दो उष्ण जल स्त्रोत यह विश्वास दिलाने में सफल है कि भविष्य में इन्हें तप्त कुण्ड के रूप में स्थापित किया जो सके।


    भविष्यबदरी मंदिर के निकट एक बाबा जी की कुटिया है जहां वे एकान्त में भयमुक्त होंकर निवास करते हैं। इस क्षेत्र में स्थानीय लोगों द्वारा परी-आछरियों व जंगली जानवरों की अनेक कहानियां सुनने को मिल जाती है। जिन्हें प्रत्यक्षदर्शी नाम सहित बयान करते हैं। इस क्षेत्र के ऊपरी हिस्सों में जहां जहां बर्फ है वहां परी-आछरियों का प्रभाव अधिक बताया जाता है। श्री शेर सिंह बिष्ट जी जो निकट में ही स्थित श्री सतपाल जी महाराज के आश्रम में कार्यकर्ता थे उन्हे करीब तीन साल पहले आछरियां उठा ले गई। चार दिन तक वह इस क्षेत्र में लापता रहे। पांचवे दिन उन्हें उसी स्थान पर छोड़ दिया गया जहां से उनका हरण हुआ था। इसके अतिरिक्त सुभाई गांव की एक लडकी शादी के दिन हरण कर ली गई। बाद में उसे भी उक्त स्थान पर छोड़ दिया गया। एक अन्य व्यक्ति व एक वृद्ध व्यक्ति के साथ भी यह घटना घटी। इसके अलावा इस क्षेत्र में जंगली सुअर, भालू, बाघ आदि का भी आतंक बताया जाता है। इन जंगल जानवरों द्वारा अंजाम दी गई कई घटनायें भी यहां सुनने को मिलती है। रा़त्र के अंधकार में महाराज जी के आश्रम में मन्द पड़ चुकी दीपक की रोशनी के मध्य यह सत्य घटनायें सुनना भी कम साहस का कार्य नहीं था। दुर्लभ जड़ी- बूटियों तथा जानवरों की खालों की तस्करी भी होती है। हमारी इस यात्रा से कुछ समय पहले ही जानवरों की खालों व जड़ी बूटियों की एक बड़ी तस्करी करते हुए कुछ लोग पकड़े भी गये थे। शान्त और अध्यात्म की दृष्टि से देखें तो यहां जंगल में मंगल है।


    सुभाई गांव में स्थित भविष्य बदरी वास्तुशिल्प की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। मंदिर तलछन्द वास्तु एवम् स्थापत्य कला की दृष्टि से निर्मित वर्गाकार मंदिर है इसमें गर्भगृह और मण्डप दोनों बने है। 2.65 मीटर गर्भ वाले इस मंदिर का ऊर्ध्वछन्द भी सादा है। यह वेदीबन्ध और शिखर से युक्त एक रथ मंदिर है। नागर शैली के एक रथ वाले मंदिर का विस्तार बहुत सादा है। इसका गुम्बदाकार शिखर पाण्डुकेश्वर वासुदेव मंदिर के समान ही है। शीर्ष पर काष्ठछत्र और उसके ऊपर कलश होने से इसके 7वी. 8वी. शती में बने होने का अनुमान पुरातत्वविद लगाते है। मंदिर गर्भगृह में विष्णु की चतुर्मुखी मूर्ति स्थापित है। मूर्ति के दायें तथा बायें पार्श्व क्रमशः नृसिंह एवं बराह हैं। भगवान विष्णु के हाथों में पद्म, शंख, चक्र, और गदा विराजमान है। मूर्ति का स्वरूप भव्य एवम् आकर्षक है। भविष्य बदरी के इस मंदिर के समीप ही दूसरा मंदिर लक्ष्मी नारायण का है। यह पूर्व मंदिर से छोटा और वर्गाकार मंदिर है। इसके लघु मण्डप आगे के दो स्तम्भों पर आधारित है इसका आच्छादन काष्ठ वेदिनी से संयुक्त है। वेदिनी के ऊपर कलश सुशोभित है। कत्यूरी शिखर शैली के इस मंदिर के गर्भगृह में 37×23 सेंटीमीटर की लक्ष्मी नारायण की युगल मूर्ति किरीट, मुकुट, रत्नकुण्डल, हार, केयूर, यज्ञोपवीत, कटिसूत्र मेखलाधारी चतुर्भुज नारायण और उनके वाम पार्श्व में लक्ष्मी जी विराजमान है। लक्ष्मी मूर्ति द्विभूज है। परिकर में विष्णु के अवतारों का अंकन है। वस्तुविद मूर्ति का निर्धारण 13वीं शती प्राचीन स्वीकारतें है (भट्ट, राकेश चन्द्र, जनपद चमोली का पुरातात्विक अंध्ययन, शोधग्रन्थ पृष्ठ 183)


    सुभाई ग्राम की अन्य पर्वतीय ग्रामों की भांति अपनी एक अनोखा छटा है जिसमें भवन निर्माण की विशेष शैली भी शामिल है। अधिकांश भवन एक मंजिल व डेढ़ मंजिल है। कुछ दो मंजिले भी है। वन सम्पदा से सम्पन्न इस क्षेत्र में इमारती लकड़ी की कमी नहीं है। गर्मियों में आरामदेह जाड़ों में गरम, भूकम्प की दृष्टि से सुरक्षित यहां के भवनों की भी अपनी विशिष्टता है। लाल मिट्टी से पुते इन पर्वतीय खुबसूरत घरों को देखते ही महाकवि कालिदास के अल्कापुरी के भवन स्मरण हो जाते है।


    श्री भविष्य बदरी में विश्राम के लिये श्री सतपाल जी महाराज द्वारा निर्मित आश्रम तथा श्री बाल योगी लाल बाबा जी का काली शंकर मठ/आश्रम है। इन आश्रमों में रहने ठहरने व भोजन आदि की व्यवस्था हो जाती है। श्री सतपाल जी महाराज के भांति ही श्री लाल बाबा जी के इस क्षेत्र में और भी आश्रम बने हुये है।



    लेखक -श्रीमति हेमा उनियाल
    संदर्भ -
    पुरवासी - 2009, श्री लक्ष्मी भंडार (हुक्का क्लब), अल्मोड़ा, अंक : 30

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