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    भगवती प्रसाद पांथरी

    Bhagwati Prasad Panthari

    भगवती प्रसाद पांथरी गढवाली भाषा व साहित्य के सुप्रसिद्व कवि थे। गढवाली साहित्य में पान्थरी युग के कर्णधार भगवती प्रसाद पान्थरी माने जाते हैं। स्वतन्त्रता आंदोलन के दौरान 1941-42 से प्रवासी गढवालियों ने गढवाली नाटकों की जोर शोर से रचना की। देहरादून , दिल्ली, आगरा, लाहौर, मुंबई जगह-जगह नयी गढवाली संस्थाओं ने जन्म लिया तथा नवीन जनजाग्रति को जन्म दिया। गढवाली नाटकों के क्षेत्र में भगवती प्रसाद पांथरी की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका रही। उनका "अधः पतन" और "भूतों की खोज" महत्वपूर्ण नाटक है। इन नाटकों का अनेक बार मंचन हुआ। इसी युग में धार्मिक ऐतिहासिक हास्य व्यंग्य अनेक प्रकार के नाटकों की रचना हुई।


    समसामयिकता के कारण इन नाटकों ने जन आंदोलन की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दियां। इसी समय पांथरी समेत अन्य नाटककारों ने समाज का जीवन्त प्रतिबिम्ब प्रस्तुत किया। भगवती प्रसाद पांथरी एक ऐसे गढवाली नाटकाकार हैं जिनकी अन्तर्दष्टि समय के आवरण को हटाकर ऐतिहासिक सत्य के उद्घाटन में विशेष तत्पर दिखायी देती है। प्रो. पांथरी गढवाली पद्य साहित्य के उन्नायकों में अग्रणी माने जाते है। उन्होंने अपनी रचनाओं से गढवाल क्षेत्र में एक नई चेतना उत्पन्न की। नाटक के क्षेत्र में उनका कार्य विशेष उल्लेखनीय हैं। "पांच फूल", "बाॅशुली", "स्वराज्य और जनानी" उनकी उत्कृष्ट रचनाए है। सभी रचनाओं में गढवाली जनजीवन की मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है। वे भविष्य के प्रति सचेष्ट व संघर्षरत दिखायी देते है। इन नाटकों का अनेक बार मंचन भी हुआ।


    पांथरी गढ़वाली नाटककारों में अग्रणी रहे हैं। उन्होंने अपनी रचनाओं से इस क्षेत्र में एक नई चेतना उत्पन्न की अपने नाटको के आदर्शवादी पात्रों के सहारे वे प्रचलित आदर्श को स्थापित करने की कल्पना करते हैं।8 स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौर में लिखे गये उनके नाटक यद्यपि आन्दोलन से प्रत्यक्ष जुड़े हुए नहीं थे परन्तु समान के सम्मुख वे एक आदर्श तो प्रस्तुत करते हैं ही। सन् 1942 में जब सम्पूर्ण राष्ट्र जागरूक हो रहा था अंग्रेजी राज्य का सर्वत्र विरोध हो रहा था हर ओर अंग्रेजो भारत छोड़ो के नारे सुनायी पड़ रहे थे तब इन सभी घटनाओं का प्रभाव उत्तराखण्ड के टिहरी रियासत पर व वहाॅ की जनता पर पड़ रहा था। 29 अगस्त 1942 को श्रीदेव सुमन के साथ भगवती प्रसाद पांथरी को भी बन्दी बनाकर देहरादून कारागार में भेज दिया गया।9 कारागार में उन्होने अनेक कष्ट सहन किये। पांथरी एक आन्दोलनकारी व एक उत्कृष्ट नाटककार भी थे। उन्ही के नाम पर गढ़वाली साहित्य का एक युग 'पांथरी युग' कहलाता है। अपने कृतित्व एव व्यक्तित्व के कारण वे सदैव प्रेरणादायक बने रहेंगे।

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