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    बद्रीनाथ धाम

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    अलकनंदा नदी के तट पर बसा चार धामों में से एक बद्रीनाथ धाम चमोली जिले में स्थित है। आदिगुरू शंकराचार्य द्वारा धाम के रूप में स्थापित भगवान विष्णु का यह मंदिर समुद्र तल से 3,133 मीटर ( 10,279 फीट) की ऊँचाई पर स्थित है। यह क्षेत्र नर और नारायण पर्वत के बीच में बसा हुआ है । यहां भगवान विष्णु के बद्रीनारायण स्वरूप की पूजा की जाती है। यहां भगवान विष्णु की 1 मी0 लम्बी शालिग्राम की मूर्ति है जिसे आदि शंकराचार्य ने नारद कुण्ड से निकालकर आठवीं शताब्दी में स्थापित किया था। यहां के मुख्य पुजारी को रावल कहा जाता है जो कि दक्षिण भारत में केरल राज्य के नम्बूदरी सम्प्रदाय के ब्राह्मण होते है।


    अत्यधिक ऊँचाई में बसे होने के कारण यह मंदिर केवल 6 महिने के लिये खुला रहता है। बाकी महिने यह बर्फ से ढके रहता है। बद्रीनाथ के कपाट अक्षय तृतीया के अवसर पर खुलते हैं जो कि अप्रैल या मई में पड़ती है। लगभग 6 मास के बाद अक्टूबर नवंबर के आसपास कपाट सर्दियों के लिये बंद कर दिये जाते हैं । बाकि के महिने भगवान विष्णु की मूर्ति को जोशीमठ ले आया जाता है, जहां नरसिंह मंदिर में उनकी पूजा की जाती है।


    बद्रीनाथ के अलावा भगवान विष्णु को समर्पित चार और मंदिर है। इन पांच मंदिरों को पंचबद्री कहा जाता है। यह क्रमशः 1. बद्रीनाथ मंदिर (बद्रीनाथ क्षेत्र में स्थित), 2. योगध्यान-बद्री (पांडुकेश्वर में स्थित), 3. भविष्य-बद्री (जोशीमठ के करीब सुबेन क्षेत्र में स्थित ), 4. वृद्ध-बद्री ( जोशीमठ के समीप अणिमठ क्षेत्र में स्थित ), 5. आदि-बद्री (कर्णप्रयाग-रानीखेत रोड पर स्थित)।


    बद्रीनाथ नाम क्यों और कैसे पड़ा इसकी एक कथा है। बद्री का अर्थ बेर होता है । कहा जाता है कि बेर के पेड़ यहां बहुत अधिक संख्या में पाये जाते थे। परन्तु अब इस तरह का कोई भी पेड़ यहां नहीं है। पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान विष्णु जब योगध्यान मुद्रा में तपस्या में लीन थे तब अत्यधिक हिमपात होने लगा और भगवान विष्णु बर्फ में पूरी तरह ढक चुके थे। माता लक्ष्मी से भगवान विष्णु की यह दशा देखी नहीं गई उन्होने भगवान विष्णु के समीप जाकर एक बद्री यानी बेर के वृक्ष का रूप ले लिया। और सारी बर्फ को अपने उपर ले लिया। कहा जाता है कि जब तक भगवान विष्णु तपस्या में लीन रहे तब तक माता लक्ष्मी ने वृक्ष के रूप में उन्हे धूप, वर्षा और बर्फ से बचाती रही। वर्षों बाद जब भगवान विष्णु तपस्या से उठे तो उन्होने देखा कि माता लक्ष्मी बर्फ से ढकी हुई है तब उन्होने माता लक्ष्मी से कहा-


    “हे लक्ष्मी! तुमने भी मेरे ही समान तप किया है इसलिये इस धाम में मुझे तुम्हारे ही साथ पूजा जायेगा। और क्योंकि बद्री वृक्ष के रूप में तुमने मेरी रक्षा की है सो आज से मुझे बद्री के नाथ यानी की बद्रीनाथ के नाम से जाना जायेगा।“

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    बद्रीनाथ की कहानी-


    कहा जाता है कि शिव हिमालय में पार्वती को घुमाते घुमाते वे उन्हे इस स्थान में लाये। यहां भी उन्होने अपना घर बनाया। कुछ दिन बाद जब शिव और पार्वती आस पास विचरण करके अपने घर लौटने लगे तो घर के बाहर एक छोटा सा बच्चा रोता हुआ देखा। बच्चे को रोते हुये देखकर पार्वती का मन व्याकुल हो गया। बच्चे का रोता देखकर उनकी ममता जाग उठीं। शिव जी जानते थे कि यह लीला भगवान विष्णु की है। शिव जी ने पार्वती जी से कहा कि यह बालक सामान्य नहीं है । इस सुनसान क्षेत्र मे बर्फिले इलाके में यह बालक अकेला ? तुम्हें आश्चर्य नहीं होता कि यह अकेला क्या कर रहा है? इसके माता पिता कहां है? परन्तु पार्वती ने शिव जी की एक बात भी नहीं सुनी । उन्होने बालक को चुप कराया, उसे भोजन कराके सुला दिया। शिव जी सब चुपचाप देखके मुस्कुराते रहे। बालक को सुलाकर दोनों भ्रमण में निकल गये। वापस आकर देखा तो बालक के स्थान पर भगवान विष्णु चतुर्भुज रूप में वहां बैठे हैं। भगवान विष्णु ने पार्वती और शिव जी से प्रार्थना की , कि यह स्थान वे उन्हे दे दे। तब शिव जी ने पार्वती जी से कहा देखा पार्वती मैने तुम से कहा था कि यह बालक सामान्य बालक नहीं है। और वे दोनों भगवान विष्णु को प्रणाम कर दूसरे स्थान की ओर बढ़ गये बाद में शिव जी व पार्वती केदारपुरी क्षेत्र में अपना वास स्थान बनाया। भगवान विष्णु के ही अंश नर और नारायण ने भी इन्ही क्षेत्र में तप किया था जो बाद में क्रमशः अर्जुन और श्री कृष्ण हुये।
    बद्रीनाथ को तीन रास्तों से होकर पहुंचा जा सकता है - हरिद्वार से देवप्रयाग होते हुये, रानीखेत से, कोटद्वार से पौड़ी होते हुये। ये तीनों रास्ते कर्णप्रयाग में मिलते है।


    1.रेलमार्ग के लिये हरिद्वार ( 318 किमी0 ) और काठगोदाम (330 किमी0) तक आया जा सकता है । उसके बाद सड़क मार्ग हेतु बस व टैक्सियां उपलब्ध रहती है या बुक करा सकते हैं।
    2.हवाई सफर में देहरादून का जोलीग्रांट (311 किमी0) और पंतनगर ( 364 किमी0) का हवाई अड्डा है।
    3. शेष यात्रा सड़क मार्ग से पूरी की जाती है। जिसके लिये बस व टैक्सियां उपलब्ध रहती है। आप टैक्सियां बुक भी करा सकते है।


    बद्रीनाथ के पास माणा गांव स्थित है जो कि भारत का अंतिम गांव है। बद्रीनाथ के पास ही वेद व्यास गुफा और गणेश गुफा भी है, कहा जाता है कि यहीं वेदव्यास ने महाभारत लिखी थी, यह भी कहा जाता है कि उपनिषद और वेद भी यहीं लिखे गये थे। यहां एक ब्रह्मकपाल क्षेत्र है जहां श्राद्ध करने से मुक्ति मिलती है। कहा जाता है कि बद्रीनाथ के जिसने दर्शन कर लिये उन्हे सीधे स्वर्ग की प्राप्ति होती है। मान्यता है कि यहीं पर पाण्डवों ने पिण्डदान किया था। यहां से नीलकण्ठ पर्वत के भी दर्शन होते है। पास में ही भीमपुल भी है जहां नदी पार करने के लिये सरस्वती नदी पर भीम ने एक विशालकाय चट्टान फेंक कर रास्ता बनाया था।

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