KnowledgeBase

    नैन सिंह रावत - मौलिक पण्डित

    Read This Article in Hindi/ English/ Kumauni/ Garwali

    19वीं सदी के विलक्षण खोजी। अद्भुत साहस के धनी, धैर्यवान और खतरों से खेलकर लक्ष्य को प्राप्त करने वाले अकेले वीर पुरूष। प्राइमरी स्कूल की मास्टरी से जीवन का प्रारम्भ कर भौगोलिक अन्वेषयण के क्षेत्र में एक कीर्तिमान स्थापित करने वाले नैन सिंह रावत उर्फ पण्डित नैनसिंह उर्फ ए.के. ने अपने अदम्य साहस से उत्तराखण्ड को गौरव प्रदान किया है। उन्होंने नेपाल के माध्यम से तिब्बत तक व्यापार मार्ग का नक्शा बनाया था, पहली बार ल्हासा का स्थान और ऊंचाई तय की और ब्रह्मपुत्र नदी के एक बहुत बड़े हिस्से का मानचित्र बनाया था।


    प्रारंभिक जीवन


    राय बहादुर नैन सिंह रावत का जन्म 1815 में गांव मिलम, तहसील मुनस्यारी (जोहार) पिथौरागढ में हुआ था, जो जौहर की घाटी में एक भोटिया गांव है। स्कूल छोड़ने के बाद, नैन सिंह ने अपने पिता की मदद की। उन्होंने तिब्बत में उनके साथ विभिन्न केंद्रों का दौरा किया, तिब्बती भाषा, रीति-रिवाजों और शिष्टाचारों को सीख लिया और तिब्बती लोगों से परिचित हो गए। तिब्बती भाषा और स्थानीय रीति-रिवाजों का यह ज्ञान नैन सिंह के काम में "जासूस खोजकर्ता" के रूप में काम आया।


    बतौर खोजकर्ता


    उल्लेखनीय है कि 18वी. सदी तक तिब्बत में किसी गैर तिब्बती के प्रवेश की सख्त पाबन्दी ने और सीमा सुरक्षा की जरूरत ने भारत में राज कर रही ब्रिटिश सरकार को इस क्षेत्र के बारे में जानने की तीव्र लालसा ने सर्वेक्षण को प्रेरित किया। सभी प्रयास जब विफल हो गए तो गख्याँग (पिथौरागढ़) स्कूल के प्राइमरी के मास्टर को तिब्बत के भौगोलिक सर्वेक्षण करने के लिए चुना गया। यह काम बड़ा दुरूह, जोखिम भरा और गुप्त रूप से सर्वेक्षण करते पकड़े जाने पर मौत की गारन्टी भरा था। नैन सिंह रावत तैयार हो गए। सर्वे आफ इण्डिया, देहरादून में इन्हें नौकरी पर नियुक्त कर दिया गया। 1866 में व्यापारी के छद्म वेश में नैनसिंह ने नेपाल सीमा से ल्हासा (तिब्बत) तक सर्वेक्षण पूरा किया। हिन्दुस्तान वापस लौटते समय इन्होंने त्साङयो (ब्रह्मपुत्र) नदी के 600 मील बहाव पथ का भी सर्वेक्षण पूरा किया। इस यात्रा में इन्होने 1200 मील की दूरी बड़े परिश्रम और नपे-तुले कदमों से चलकर तय की। 1867 में पश्चिमी तिब्बत क्षेत्र गरतोक के पूर्व में स्थित विख्यात थोक-जालुँग साने की खानों का भ्रमण किया। सिंधु नदी की ऊपरी दो शाखाओं कें नक्शे पूरे करने के लिए सूचनाएं संकलित की और सतलज नदी के स्रोत के आस-पास 18000 वर्गमील क्षेत्रफल का सर्वेक्षण भी पूरी किया। जुलाई, 1873 में लेह (लद्दाख) से प्रारम्भ कर ल्हासा होते हुए मार्च, 1875 में गुवाहाटी(असम) कलकता में समाप्त हुई यात्रा के दौरान 1319मील पैदल चलकर गुप्त सर्वेक्षण किया। यह पूरा मार्ग तब तक सर्वेक्षित नहीं था।


    यह अत्यन्त उत्सुकता भरा प्रश्न है कि गैर तिब्बती होने के बावजूद दूसरे देश में छद्म रूप में हजारों मील की दूरी को आखिर पण्डित नैनसिंह ने कैसे सर्वेक्षित किया। इतनी दुरूह और लम्बी यात्रा की सही-सही नपाई के लिए इन्हे ‘ऊँ मणि पद्मे हुम’ जाम करने के लिए एक धर्मचक्र (तिब्बती लामाओं द्वारा अनिवार्य प्रतिक्षण हाथ से घुमाया जाने वाला ढोल के आकार का चक्र) तथा मनका मालाएं दी गई। अपने पास कम्पास, सेक्सटैंट, थर्मामीटर, बैरोमीटर आदि छिपाकर रखते थे। मनका माला में 108 के बजाय 100 मनके रखे गए थे। प्रति दसवां मनका बड़ा बनाया गया। व्यापारी का वेश बनाकर अपने घोड़े के एक कदम पर मनका खिसकाते तिब्बत के पठार पर और ब्रह्मपुत्र नदी के लम्बे घाटी क्षेत्र में एक-एक कदम गिनते और रिपोर्ट धर्मचक्र के भीतर रखे कागज में लिख कर देहरादून भेजते रहे।


    सम्मान


    भूगोल शास्त्र के क्षेत्र में पाइमरी स्कूल के एक शिक्षक द्वारा जो सेवाएं दी गई, उसके लिए तत्कालीन ब्रिटिश शासन ने पण्डित नैनसिंह को ‘कम्पेनियन आफ इण्डियन एम्पायर’ (सी.आई.इ.) के अलंकरण से विभूषित किया। अंतर्राष्ट्रीय स्तर की वैज्ञानिक संस्थाओं ने इस महान साहसिक कार्य के लिए परतंत्र नागरिके होने के उपरान्त भी पण्डित नैनसिंह को समुचित सम्मान दिया और अलंकृत भी किया। 1865-68 में काठमाण्डू-ल्हासा-मानसरोवर सर्वेक्षण कार्य के लिए रायल ज्योग्राफिकल सोसायटी, लन्दन ने उन्हें एक सोने की छड़ी देकर सम्मानित किया। ज्योग्राफिलि सोसायटी का पेट्रन्स स्वर्ण-पदक, भारतीय मूल के किसी भी नागरिक को दिया जाने वाला सर्वप्रथम व एकमात्र सर्वोच्च अलंकरण है। पण्डित नैनसिंह को दिए गए सम्मान ने विश्व के सर्वकालीन महान अन्वेषकों पियरे, तालसेन, स्काट, लिंग्विस्टन के समकक्ष लाकर भारत का मान-सम्मान बढ़ाया है। कदाचित परतंत्र भारत में किसी भी भारतीय मूल के व्यक्ति को वैज्ञानिक कार्य के लिए दिया जाने वाला यह सर्वोच्च और एकमात्र सम्मान है। लार्ड सेलिसबरी ने भी वायसराय के द्वारा संस्तुत्य रोहेलखण्ड के एक गाँव की जागीर, जिसकी वार्षिक आय एक हजार रुपए थी, स्वीकार करते हुए लिखा, ‘‘नैनसिंह के कार्यो की ओर न केवल इंग्लैण्ड, बल्कि पूरे यूरोप के भूगोल शास्त्रियों का ध्यान वर्षो से आकर्षित था। लद्दाख-ल्हासा, असम की इस सफल और अविस्मरणीय यात्रा के आधार पर मैं आपके द्वारा प्रस्तावित सम्मान व पुरस्कार को दिए जाने में अपनी सहमति व्यक्त करता हूँ।


    नैन सिंह रावत पे आधारित पुस्तकें


    ●रिकार्ड्स आफ सर्वे आफ इण्डिया (1915) - देहरादून से प्रकाशित


    ●एबोड आफ स्नो - केनेथ मेसन


    ●दि ओरियन्टल एडवेंचर (1976) - टिमार्थी सेवेरिन


    ●तिब्बतः ए क्रोनिकल आफ एक्सप्लोरेशन (1970)- जान मेक ग्रेगर


    ●दि इण्डियन एक्सप्लोरर्स आफ नाइनटींथ सेंचुरी - इन्द्र सिंह रावत


    ●डिस्कवरी एण्ड एक्सप्लोरेशन, ए रिफरेंस हैण्ड बुक (1980) - एलन एडविन डे


    मृत्यु


    जीवन के अंतिम समय वह आज के उत्तर प्रदेश में रहने लगे थे और 1 फरवरी 1882, मोरादाबाद जिले में उन्होंने आखरी साँस ली।


    Related Article

    Leave A Comment ?