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    रक्षा सूत्र आंदोलन

    ‌पर्यावरण से संबधित कई आंदोलनों का उत्तराखण्ड जनक रह चुका है। इन्ही में से एक आंदोलन था - "रक्षा सूत्र आंदोलन"। 1994 में टिहरी के भिलंगना क्षेत्र खवाड़ा गांव से शुरू हुआ यह आंदोलन धीरे धीरे आस पास के जिलों तक फैल गया। चिपको आंदोलन की तरह ही इस आंदोलन में भी महिलाओं द्वारा वृक्षों की रक्षा हेतु कदम बढ़ाये गये थे।


    ऊँचाई पर पेड़ रहेंगे, तो
    नदी ग्लेशियर टिके रहेंगें
    पेड़ कटेंगे तो पहाड़ टूटेंगे
    बिना मौत के लोग मरेंगे
    जंगल बचेगा देश बचेगा
    गांव गांव खुशहाल रहेगा।
    - रक्षा सूत्र आंदोलन का नारा


    ‌अगस्त 1994 में टिहरी के भिलंगना क्षेत्र के आस पास की भूमि में वन विभाग ने जंगलों में पेड़ो को काटने की समस्त तैयारी कर ली थी। इसकी सूचना जब ग्रामीणों को लगी तब खवाड़ा, भेटी, भिगुन आदि गांवों की लगभग सैकड़ो महिलाओं ने आपस में समूह बनाकर एक आंदोलन छेड़ दिया जिसके तहत महिलाओं ने सभी पेड़ों जिन्हे वन विभाग द्वारा काटने के लिये चिह्नित कर लिया गया था उन वृक्षों पर रक्षा सूत्र बांध दिया। जिसके पीछे महिलाओं का संदेश था कि इन पेड़ो की रक्षा अब हम करेंगें। धीरे धीरे आंदोलन व्यापक होने लगा। जिस कारण पेड़ो का कटान रूक गया। 1997 में उतरकाशी जिले के हर्षिल सहित आस पास के क्षेत्र में भी जंगल काटना शुरू हुआ तो वहां भी रक्षा सूत्र आंदोलन चलाया गया।


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