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    कुमाउँनी रामलीला एवं दशहरा

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    Ramlila


    कुमाऊँ की परम्परागत रामलीला में कुमाऊँ की विशिष्ट संस्कृति की झलक मिलती है। गीत-नाट्य शैली में होने वाली कुमाऊँ की रामलीला समूचे देश में अपने ढंग की अनूठी है। इसके अंतर्गत सभी पात्र गाते हुए अभिनय करने हैं। कुमाऊँ में सबसे पहली रामलीला सन् 1860 में हुई। इसके कुछ वर्षों बाद ही भीमताल, नैनीताल के निकट वीर भट्टी तथा पिथौरागढ़ में रामलीलाायें प्रारम्भ हुई।

    कुमाऊँ के जनपदों में होने वाली रामलीलाओं की अपनी अलग ही पहचान है। यहाँ उपस्थित होने वाली रामलीलाओं में भी कुमाऊँ की विशिष्ट संस्कृति साफ झलकती है। गीत-नाटक शैली वाली यहाँ की रामलीलाओं में सभी पात्र गाकर ही अभिनय करते हैं। सभी पात्रों को परंपरागत चौपाई, दोहा, राग-रागिनी, खम्माच, राधेश्याम, राग-विहाग आदि धुनों में गाकर ही अभिनय करना होता है। अभिनय में निपुण होने के बावजूद यदि कोई पात्र गाने में सक्षम नहीं है, तो उसे अभिनय का अवसर नहीं मिलता। यहाँ प्रचलित राग-रागिनी तथा अन्य गीतों में कुमाऊँ में प्रचलित रामलीलाओं की एक और विशिष्टता यह है कि रामलीला में अभिनय करने वाले राम, लक्ष्मण, सीता, भरत तथा शत्रुघ्न के पात्रों की उम्र 12 से 15 वर्ष के मध्य होती है। कुमाऊँ में आज भी रामलीला मंचन के लिए किराए पर टीमें नहीं लाई जातीं। सैकडों स्थानों पर रामलीला मंचन होता है, लेकिन सभी जगह स्थानीय कलाकार ही होते है, लेकिन सभी जगह स्थानीय कलाकार ही होते हैं। इसी कारण ग्रामीण क्षेत्रों में अभिनय तथा संगीत में रूचि रखने वाले लोगों के उभरने के लिए रामलीला एक महत्वपूर्ण माध्यम होता है। इसके पहले पात्रों के चयन में उनकी आवज, अभिनय तथा उम्र का विशेष ख्याल रखा जाता है। राम, लक्ष्मण, सीता भरत तथा शत्रुघ्न के पात्र अत्यंत छोटी उम्र के बनाये जाते हैं। जब छोटी उम्र के यह पात्र मंच पर अभिनय करते हैं, तो वह अद्भुत सुन्दर लगते हैं। कुमाऊँ में होने वाली रामलीला की एक अन्य विशेषता यह है कि रामलीला मंचन में यहाँ मुस्लिम वर्ग के लोग भी सक्रिय भूमिका निभाते हैं और पूरा सहयोग करते हैं।


    कुमाऊँ में सबसे पहल रामलीला कहाँ और किस वर्ष शुरू हुई यह स्पष्ट जानकारी नहीं है, लेकिन इस संबंध में जो भी प्रमाण मिले हैं, उसके आधार पर पता चलता है कि कुमाऊँ में सबसे पहली रामलीला अल्मोड़ा के बद्रेश्वर में सन् 1860 में हुई। तत्कालीन सदर अमीन बद्रीदत्त जोशी ने इस रामलीला का आयोजन करवाया। उसके बाद पिथौरागढ़ में 1897 में तत्कालीन डिप्टी कलक्टर देवीदत्त सकड़िया ने रामलीली का आयोजन करवाया। वहाँ सबसे पहले देहरादून में प्रचलित रामलीला नाटक के आधार पर रामलीला का मंचन किया गया। 1940 में गंगाराम पुनेठा तथा कुँवर बहादुर सिंह ने भीमताल, अल्मोड़ा तथा नैनीताल रामलीला नाटक के आधार पर एक नए नाटक की रचना की और रामलीला का मंचन किया। कहीं यह भी उल्लेख मिलता है कि 1930 में बेरली या मुरादाबाद में पहली कुमाउँनी रामलीला हुई।


    नैनीताल जनपद में जिला मुख्यालय से कुछ दुरी पर स्थित वीर भट्टी में पहली रामलीला 1897 में दुर्गा साह ने करवाई। सन् 1910 के आस-पास भीमताल में रामलीला प्रारम्भ होने की बात वहाँ के रचना करने वाले पंडित रामदत्त जोशी भी भीमताल (शिलौटी) के ही निवासी थे। आज स्वर्गीय जोशी का रामलीला नाटक समूचे कुमाऊँ में प्रसिद्ध है। हालांकि कुछ अन्य प्रसिद्ध रामलीला नाटकों के आधार पर भी रामलीला का मंचन होता है। स्व. रामदत्त जोशी द्वारा नाटक की रचना करने के बाद भीमताल में स्व. मोतीराम पांडे, श्याम लाल चौधरी (दानों स्वतंत्रता सेनानी), स्व. पूरन लाल साह आदि ने प्रारम्भ में रामलीला का मंचन करवाया। नैनीताल में 1912 में मल्लीताल में पहली बार कृष्णा साह द्वारा रामलीला का मंचन किया गया। इसके अलावा कहीं यह भी उल्लेख है कि 1880 में मोतीराम साह ने सबसे पहले रामलीला का मंचन करवाया। सन् 1911 में अल्मोड़ा के चीनाखान से बसंत कुमार जोशी द्वारा रामलीला मंचन करवाया गया। यह भी बताया गया है कि जानकी नाथ जोशी ने 1931 में कुमाउँनी रामलीला का मंचन शिमला में भी करवाया। पिथौरागढ़ में गोविंद लाल चौधरी ने करीब 60 वर्ष तक रामलीला का संचालन करवाया। बागेश्वर में 1890 में शिवलाल साह ने रामलीला प्रारम्भ करवाई। प्रारम्भ के वर्षों में गिने-चुने स्थानों में होने वाली रामलीला को देखने के लिए सौ-सौ कि.मी. दूर से लोग आते थे, किंतु अब श्रद्धा घटती जा रही है, जिससे रामलीला मंचन में भी अब पहले की अपेक्षा कठिनाई आती है। कुल मिलाकर कुमाऊँ में प्रदर्शित होने वाली रामलीलाएं आज भी विशिष्ट स्थान रखती हैं।


    Ramlila


    दशहरा में भी कुमाऊँ की विशिष्ट संस्कृति की झलक मिलती है। दशहरे के अवसर पर अल्मोड़ा में बनाए जाने वाले रावण, कुंभकर्ण, मेघनाद, ताड़िका, सुबाहु आदि के पुतले कलात्मकता की दृष्टि से पूरे देश में प्रसिद्ध हैं। स्थानीय कलाकारों द्वारा शहर के अलग-अलग मोहल्लों में तैयार किए जाने वाले यह पुतले दशहरा महोत्सव का प्रमुख आकर्षण बन गए हैं। दशहरे पर देश के अन्य स्थानों से भी लोग इन पुतलों को देखने यहाँ आते हैं। रामलीला मंचन की तरह अल्मोड़ा में पुतले बनाने की परम्परा भी बहुत लंबे समय से चली आ रही है। जानकारी के अनुसार, करीब 70-75 वर्ष से यहाँ पुतले बनाने की परम्परा चल रही है। शुरू में लाला बाजार, जौहरी मोहल्ला, मल्ली बजार में अलग-अलग पुतले बनाए जाते थे। उसके बाद कई साल केवल लाला बाजार के लोग रावण का पुतला तैयार करते थे, लेकिन करीब 1985 से अल्मोड़ा नगर के प्रत्येक बाजार तथा मोहल्ले से एक-एक पुतले बनाए जाते हैं। इसके लिए एक दशहरा समिति बनाई जाती है। यह समिति अलग-अलग स्थानों में तैयार होने वाले पुतलों के संबंध में समन्वय का काम करती है।


    दशहरा समिति के समन्वय से हर बाजार तथा मोहल्ले में तैयार होने वाले पुतलों के बारे में तय कर लिया जाता है कि किस इलाके के लोग कौन सा पुतला बनाएंगे। सामान्यतः हर मोहल्ले के पुतले तय है और वह प्रतिवर्ष उन्हीं पुतलों को तैयार करते हैं। लाला बाजार के लोग कई दशकों से रावण का पुतला तैयार करते हैं। इसी प्रकार लक्ष्मी भंड़ार (हुक्का क्लब) द्वारा ताड़िका, जौहरी मोहल्ला द्वारा कुभकर्ण, मुरली मनोहर बाजार द्वारा मेघनाद, खजांची मोहल्ला द्वारा मकराक्ष तथा त्रिपुरा सुंदरी द्वारा अहिरावण का पुतला तैयार किया जाता है। प्रतिस्पर्धा के कारण पिछले कुछ वर्षों से पुतलों के स्तर में और सुधार आया है। दशहरे से करीब एक महीने पहले विभिन्न स्थानों पर पुतलों का बनाना प्रारम्भ हो जाता है। स्थानीय कलाकार अक्सर रात्रि में पुतले बनाने का काम करते हैं। इसके बदले वह कोई मेहनताना आदि नहीं लेते हैं। पुतला आकर्षक लगे, इसके लिए कलाकार पूरी रात-रात भर मेहनत करके पुतलों को जीवन्त बनाने का पूरा प्रयार करते हैं। अनका प्रयास रहता है कि पुतले के हाथ-पैर, मुँह तथा शरीर के हर अंग स्वाभाविक नजर आएं। यही कारण है कि अल्मोड़ा में बनाए जाने वाले पुतले कलात्मकता के लिए प्रसिद्ध हैं। दशहरे के दिन, शाम के समय ढोल-नगाड़ों के साथ सभी पुतलों को मुख्य बाजारों में घुमाकर अल्मोड़ा स्टेडियम ले जाया जाता है और वहाँ अग्नि दे दी जाती है।



    लेखक - दीप जोशी
    सर्वाधिकार -
    दीप जोशी

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