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    राजा सुदर्शन शाह - पंवार वंश

    King-Sudarshan-Shah-garhwal-dynasty

    सुदर्शन शाह- राजा (1788-1859): गढ़वाल पर राज्य करने वाले 59 पंवार वंशीय राजाओं की सूची में 55वीं पीढ़ी में जन्मे, रियासत टिहरी के पहले नरेश, दूरदर्शी, प्रजाहितैषी, विद्वान और विद्वानों का आश्रयदाता। इनकी जन्मतिथि के बारे में इतिहासकार एकमत नहीं हैं।


    सन् 1804 की माह फरवरी में किसी दिन गोरखा सेना के साथ खुड़बुड़ा, देहरादून में युद्ध करते राजा प्रद्युम्न शाह वीरगति को प्राप्त हो गए थे। फलतः गढ़वाल राज्य पर गोरखालियों का अधिपत्य हो गया। राजकुमार सुदर्शन शाह की आयु उस समय मात्र 17-18 वर्ष रही होगी। 12 वर्ष तक वह कनखल, ज्वालापुर, हरिद्वार में प्रवास में रहा। उन दिनों हरिद्वार, ज्वालापुर, कनखल तथा गंगाजी के पार चण्डी परगने की भूमि, जिसे नजीबुद्दौला ने गढ़राज्य से छीन लिया था, ईस्ट इण्डिया कम्पनी के राज्यान्तर्गत थी। सुरक्षा के अभाव के साथ ही सुदर्शन शाह के लिए आर्थिक संकट भी था। सोने का राजसिंहासन, स्वर्णाभूषण और बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर के चढ़ावे का मनों सोना प्रद्युम्न शाह ने पहले ही बेच दिया था। कैप्टेन हियरसे ने लिखा है कि- "सुदर्शन शाह को न तो भोजनादि आवश्यक वस्तुएं उपलब्ध थीं, और न उसके पास परिवार के लिए वस्त्रादि बनाने के लिए आवश्यक धनराशि थी।" हियरसे ने कुछ नगद रूपया, भोज्य सामग्री और वस्त्रादि देकर उसकी सहायता की थी। उसने अपनी जागीर में से 'हारा' नामक स्थान पर एक हजार बीघा बंजर भूमि राजकुमार सुदर्शन शाह को खेती करने के लिए दी थी। उन दिनों के कुमाऊँ की राजनीति के कौटिल्य हरकदेव जोशी ने राजकुमार सुदर्शन शाह को कैप्टेन हियरसे से मिलवाया था।


    सुदर्शन शाह व्यग्रतापूर्वक उस घड़ी की प्रतीक्षा करता रहा, जब गोरखालियों को भगाकर उसे उसका खोया हुआ गढ़राज्य प्राप्त होगा। इसके लिए कम्पनी सरकार की दोस्ती के अतिरिक्त उसे कोई दूसरा रास्ता नजर नहीं आ रहा था। उसने काशीपुर, बरेली, कानपुर, फतेहगढ़, सहारनपुर और दिल्ली में अनेक अंग्रेज अधिकारियों को अपनी व्यथा सुनाई। वह मुरादाबाद के सहायक सर्जन रूथरफोर्ड, कम्पनी सेनानायक लार्ड लेक, बोर्ड आफ रेवेन्यू के कमिश्नर सर जे. एडवर्ड कोलब्रुक तथा लेफ्टिनेंट वेब, रेपर एवं मूरक्राफ्ट से भी मिला। अनुकूल परिस्थिति देखकर उसने रेजिडेण्ट, डेविड अख्तरलोनी, आर्कीबाल्ड, सी. टी. मेटकाफ, उसके सहायक गार्डनर और फ्रेजर से भी मुलाकात की। उसने कम्पनी सरकार के सेक्रेट्री जौन एडम और गवर्नर जनरल लार्ड हेस्टिंग्ज को भी पत्र लिखे। इन सब प्रयासों का परिणाम यह निकला कि कम्पनी सरकार ने सुदर्शन शाह के साथ ब्रिटिश फौज गढ़राज्य पर अधिकार करने के लिए भेज दी। जब यह समाचार राजधानी श्रीनगर पहुंचा तो गढ़वाली जनता में खुशी की लहर दौड़ गई। जनता को पूर्ण विश्वास हो गया कि अब उन्हें गोरखालियों की दासता से मुक्ति मिल जाएगी और बोलांदा बद्रीनाथ (गढ़नरेश) की छत्रछाया में हम फिर से आ जाएंगे।


    21 अक्टूबर, 1814 को दूनघाटी पर ब्रिटिश अधिकार हो गया था। 24 दिसम्बर 1814 को सिरमौर राज्य और 15 अप्रैल, 1815 को कुमाऊँ की राजधानी अल्मोड़ा पर ब्रिटिश झण्डा लहराने लगा। मई 1815 में ब्रिटिश सेना श्रीनगर पहुंची। जून 1815 में ब्रिटिश सेना मेजर बालडौक, लेफ्टि. मेनरिथ और पांच अन्य यूरोपियन अफसरों के साथ अठूर (टिहरी) पहुंची। उनके पीछे-पीछे सुदर्शन शाह भी अपने विश्वासपात्रों शिवराम, काशीराम और असाडू गुसांई के साथ आगे बढ़ा। ब्रिटिश सेना ने टिहरी में और सुदर्शन शाह ने अठूर मे शिविर डाला। गढ़राज्य से पूरी गोरखाली सेना को भगाकर ब्रिटिश सरकार ने गढ़वाल पर अधिकार कर लिया। अंग्रेजों की राज्य विस्तार की लिप्सा और येनकेन प्रकारेण देशी रजवाड़ों का हड़प करने की नीति का कहर गढ़वाल राज्य पर भी बरपा और गढ़वाल के दो टुकड़े हो गए। राजा सुदर्शन शाह को अलकनन्दा पार का ही इलाका (रवांई परगना छोड़कर) दिया गया। सम्पूर्ण दून क्षेत्र और शेष गढ़वाल को ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधिकार क्षेत्र में ले लिया गया।


    सन् 1816 में किसी समय (शायद फरवरी माह में) टिहरी में भिलंगना नदी के बाएं तटपर सेमल के तप्पड़ (मैदान) में सुदर्शन शाह का राजतिलक हुआ। इस अवसर पर उपस्थित लोगों में सम्भवतः राजगुरू नौटियाल तथा पुरोहित वशिष्ठ पाण्डे के अतिरिक्त राजा के प्रवास के साथी देवी सिंह, मुंशी चुन्नीलाल, कृपाराम पाण्डे या उसके वंशज, रस्वाला (रसोइया) हीरामणी, प्रद्युम्न शाह का चोपदार किशनसिंह, शिवराम, कासीराम, असाडू गुसाई आदि दस पंच, महन्त हरसेवक राम और प्रसाद पुरी आदि प्रमुख लोग रहे होंगे। इस अवसर पर राजा ने राजकाज हेतु निम्न व्यक्तियों को विशिष्ट पदों पर नियुक्त किया- हरिदत्त शर्मा- धर्माधिकारी, दुर्गादत पैन्यूली और धर्मदत्त विजल्वाण- वजीर, ज्वालादत्त बहुगुणा-दीवान, शिवराम सकलानी- मुखत्यार, शंकरदत्त- बड़ी दीवानी का नाजिर, बनीराम, देवीदत्त, कृष्णदत्त खण्डूडी- छोटी दीवानी के नाजिर, गंगादत्त- भागीरथी पार का हाकिम (थानादार), मोतीराम, रामकृष्ण-भिलंगना पार के हाकिम, गंगादत्त, कृष्णदत्त, रवाई तथा उदयपुर के हाकिम (थानादार)। अन्य राज्याधिकारी रामानन्द नौटियाल, लक्ष्मीधर खण्डूरी तथा रामदत्त रतूड़ी। शीघ्र ही राजा ने एक ऊंचे टीले पर एक तिमंजिला 100 कमरों वाला राज प्रासाद बनवाया। इसे अब पुराना दरबार कहा जाता है।


    राजा सुदर्शनशाह बहुत ही सुशील स्वभाव के थे और जल्द ही उन्होंने अपने राज्य को सफलतापूर्वक व्यवस्थित कर दिया। सुदर्शन शाह ने अपने उजड़े राज्य को व्यवस्थित करने के लिए प्रजा पर कर लगाये। जिससे राज्य की आय में बढ़ोत्तरी हो सके। राज्य की आय को बढ़ाने के क्रम में राजा ने पूर्वकाल से चले आ रहे सयाणों (ग्रामीण जनता से राजस्व वसूल करने वाले व्यक्ति को सयाणों कहा जाता था) और कमीणों (इसे कामदार के नाम से जाना जाता था तथा ये राजस्व की राज दरबार तक पहुँचाने के लिए एक साल के लिए नियुक्त किये जाते थे।) को विभिन्न परगनों से बुलाया और उनसे नज़राना (एक प्रकार का कर जो राजा उच्च पद पर नियुक्त व्यक्ति से लेता था, उनके दरबार में उपस्थित होने के एवज़ में) लेकर परम्परागत पदों पर प्रतिष्ठित किया। आर्थिक स्रोत के रूप में वनों को ठेके पर देने की परम्परा की भी शुरूआत की गयी जिसके तहत सुदर्शन शाह के राज्यकाल में विलसन ने 1 अप्रैल सन् 1858 को भरदार, क्वीली, पालकोट, धारकोट के सभी वन तथा बाड़ाहाट, कठूड़ व नाल्ड के वनों का ठेका छः हज़ार रूपये प्रतिवर्ष पर पाँच वर्ष के लिए लिया था। सुदर्शन शाह ने ब्रिटिश सरकार की सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान सहायता भी की। राजा ने अपने 200 सैनिकों को राजपुर की पहाड़ियों पर तब तक तैनात रखा जब तक की संषर्घ खत्म नहीं हो गया। इस सहायता के एवज़ में ब्रिटिश सरकार सुदर्शन शाह को बिजनौर का कुछ क्षेत्र देना चाहती थी, लेकिन राजा उसके बदले देहरादून और ब्रिटिश गढ़वाल चाहते थे। ये बात ज़्यादा आगे न बढ़ सकी क्योंकि सन् 1859 के जून महीने में सुदर्शन शाह का स्वर्गवास हो गया। राज्य की बावत झगड़ा पड़ गया और बिजनौर का प्रश्न वैसे ही गुम हो गया। सुदर्शन शाह ने 45 वर्षों तक राज्य किया। सुदर्शन शाह के शासनकाल में जनता ने दो बार संघर्ष किया। जिसमें पहला संघर्ष सन् 1835 में हुआ, जब जनता के दबाव के आगे ब्रिटिश शासकों ने उपराज्य सकलाना के अत्याचारी मुआफीदार को टिहरी नरेश के अधीन किया। इसके पश्चात दूसरी बार सन् 1851 में बद्री सिंह असवाल के नेतृत्व में 'तिहाड़' (फसल का 1/3 ज़मीदार का) विरोधी आन्दाले न संगठित कर मुआफीदारों के कारिन्दों तथा फौज के साथ जूझने का निश्चय कर अपने विरोध को दर्शाया और तिहाड़ उन्मूलन कर 12 आने वीसी (बीसी नाली भूमि पर 12 आना लगान) का नियम प्रचलित करवाया।


    राजा सुदर्शन शाह योग्य और प्रजा वत्सल शासक थे। 'मेम्बायर्स आफ देहरादून' के लेखक आर. सी. विलियम्स ने लिखा है- "सुदशर्न शाह एक बुद्धिमान शासक थे।" ब्रिटिश सरकार के साथ इनके मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध रहे। वे साहित्य व कला प्रेमी व्यक्ति थे। उन्होंने तंत्र शास्त्र का भी अध्ययन किया था।

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