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    कनकपाल - पँवार वंश

    कनकपाल (867–918 अनुमानित): गढ़वाल में चाँदपुरगढ़ के पराक्रमी और प्रतापी गढ़पति। मूल निवासः धार (गुजरात)। इतिहासकारों ने कनकपाल को गढ़वाल में 927 वषों तक एकछत्र राज्य करने वाले पवार राजवंश का आदि पुरुष बताया है। कुछ एक का मत इसके विपरीत है। वे इतिहासकार भौना उर्फ भानुप्रताप को इस वंश का मूल पुरुष मानते हैं। कनकपाल की जीवनावधि, राज्यविधि, गढवाल आगमन की तिथि और उसकी मूलजाति से सम्बन्धित कई और प्रश्न आज भी अप्रमाणित और अनुत्तरित हैं। यह भ्रम तब विश्वास में बदल जाता है, जब इतिहासकार कनकपाल के सम्बन्ध में तो कुछ सामग्री परोसते हैं, किन्तु उसके बाद के 36 राजाओं का कहीं जिक्र तक नहीं करते हैं। 37वें राजा अजयपाल से पंवार राजवंश का वंशवृक्ष बनता है। कुछ लेखकों ने कनकपाल को 'गढ़पति' के स्थान पर 'महाराजा' की पदवी से विभूषित किया है। कुछ लेखकों ने टिहरी राज्य अभिलेखागार में परवर्ती पंवार राजाओं द्वारा तैयार की गई वंशावली को सही ठहराया है, तो कुछ का कहना है कि कनकपाल पंवारवंशी था ही नहीं। कुछ अनुश्रुतियों के सहारे आगे बढ़ रहे हैं, तो कुछ लेखक एक दूसरे की लिखी बात को काटते हुए आगे बढ़ रहे हैं। सारांश यह है कि इस सम्बन्ध में तथ्यों और घटनाओं का पूर्ण घालमेल है। प्रामाणिकता पर धुंध पड़ी है। पुरानी लकीर के ही सहारे आगे बढ़ा जा रहा है। लेखक भी उसी लकीर के सहारे आगे बढ़ रहा है, किन्तु कुछ नई सामग्री के साथ। प्रबुद्ध पाठक स्वयं निर्णय कर लें।


    यह निर्विवाद सत्य है कि कनकपाल का गढ़वाल आना, शंकराचार्य का बद्रीशधाम में आगमन के बाद हुआ। यह नौवीं सदी का काल था। उस समय भौना उर्फ भानुप्रताप जगतगढ़ (बाद में चन्द्रपुरगढ़ और चाँदपुरगढ़ कहलाया) का गढ़पति था। भानुप्रताप चन्द्रवंशी क्षत्रीय था। उसका सम्बन्ध राजा परीक्षित के वंश से होना सिद्ध होता है। आगे बढ़ते हैं और भौना उर्फ भानुप्रताप की खोज करते हैं।


    इसा से लगभग 3130 वर्ष पूर्व, यानी द्वापर युग की समाप्ति के वर्षों में भारतभूमि पर 'जय' नाम का एक महा संग्राम हुआ था जिसे सामान्यतः महाभारत कहा जाता है। इस महा संग्राम में पांडव पक्ष से 15,30,900 और कौरव पक्ष से 24,05,700 वीर पुरुषों ने भाग लिया था। इस महा संग्राम में भाग लेने वाली अठ्ठारह अक्षौहिणी सेना में से मात्र 10 व्यक्ति बचे थे। पांडवों की ओर से 5 पांडव, सात्यकि और कृष्ण तथा कौरवों की ओर से कृपाचार्य, कृत वर्मा तथा अश्वत्थामा। अर्जुन पुत्र अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित (द्वितीय) के राज्यारम्भ काल से कलियुग का आगमन माना जाता है। भानुप्रताप परीक्षित (द्वितीय) का ही वंशधर था। यह वंशवृक्ष इस प्रकार है:- परीक्षित, जन्मेजय, शतानिक (प्रथम), अश्वेघदत्त, निचक्षु, उसना, विचित्ररथ (चित्ररथ), शुचिरथ, वृष्णिमस, सुसेन, सुनीच, नृप (रुचा), चक्षु, नृचक्षु, शुभवल, परिवल्लभ, सुनय, मेघाविन, रिपुंजय (नृपंजय), भृषु (मृदु) या दूर्वा, तिग्मा, वृहदरथ, वसुदान, शतानिर्क, उदयन, अहिनारा या वहिनारा, दण्डपाली, निरामित्र, क्षेमक (क्षेमराज)- वंश समाप्त। अन्तिम राजा क्षेमक जो राज सिंहासन पर बैठा था, को उसके मंत्री विसर्प ने मार डाला और स्वयं राजा बन बैठा। मृतक राजा की गर्भवती विधवा रानी अपने सतीत्व के रक्षार्थ कुछ विश्वासपात्रों के साथ हस्तिनापुर से चलकर बद्रीशधाम पहुंची और वहां रह रहे ऋषियों से आश्रय मांगा। बद्रीकाश्रम में ही रानी का एक पुत्र हुआ। उसका नाम राजपाल था। कालान्तर में यही राजपाल बद्रीकाश्रम क्षेत्र का भूपति बन गया। राजपाल का पुत्र अनंगपाल हुआ। अनंगपाल की मात्र एक कन्या हुई जिसका विवाह उसने एक राजपूत से किया। उस कन्या का एक पुत्र पृथ्वीराज हुआ। अनंगपाल ने उसे ही अपना उत्तराधिकारी बनाया। पृथ्वीराज की कुछ पीढ़ी के बाद भानुप्रताप हुआ। भानुप्रताप की केवल दो कन्याएं हुई। इनमें से एक का विवाह उसने धार (गुजरात) से बद्रीनाथ धाम की यात्रा पर आए 25 वर्षीय युवक कनकपाल से कर दिया। कनकपाल की जाति अविदित है । इतिहासकारों ने उसे पंवारवंशी घोषित कर गढ़वाल के राजवंश का मूल पुरुष मान लिया।


    कनकपाल निश्चित ही कत्यूरी साम्राज्यान्तर्गत एक स्वतंत्र गढ़पति रहा होगा। कनकपाल ने चाँदपुर में एक मजबूत गढ़ी का निर्माण करवाया और छोटी-छोटी कई ठकुराइयों और 64 गढ़पतियों को विजित कर विशाल गढ़वाल राज्य की नींव डाली। अजयपाल गढ़वाल का पहला स्वतंत्र शासक हुआ। कनकपाल के 60 वंशजों ने ई. सन 888 से 13 फरवरी, 1948 तक गढ़वाल पर राज्य किया। इन 60 राजाओं की नामावली इस प्रकार है:-


    कनकपाल, श्यामपाल, पाण्डुपाल, अभिगतपाल, संगतपाल, रतनपाल, शालिपाल, विधिपाल, मदनपाल, भक्तिपाल, जयचन्द्रपाल, पृथ्वीपाल, मदनसिंह पाल, अगस्तपाल, सुरतिपाल, जयसिंहपाल, सत्यपाल, आनन्दपाल, विभोगपाल, शुभयानपाल, विक्रमपाल, विचित्रपाल, हंसपाल, सोनपाल, कान्तिपाल, कामदेवपाल, सुलक्षणपाल, सुदक्षणपाल, अनन्तपाल, पूर्वदेवपाल, अभयदेवपाल, जयरामदेवपाल, आशलदेवपाल, जगतपाल, जीतपाल, आनन्दपाल, अजयपाल, विजयपाल, सहजपाल, बहादुरशाह, मानशाह, श्यामशाह, महीपतिशाह, पृथ्वीपतिशाह, मेदिनीशाह, फतेहशाह, उपेन्द्रशाह, प्रदीपशाह, ललितशाह, जयकृतशाह, प्रदुम्नशाह, सुदर्शनशाह, भवानीशाह, प्रतापशाह, कीर्तिशाह, नरेन्द्रशाह और मानवेन्द्रशाह।

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