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    काफल

    Kafal

    काफल के संबंध में एक रोचक किस्सा है। कोई व्यक्ति सड़क के किनारे बैठकर काफल बेच रहा था। पूर्व प्रांत से आए एक पर्यटक ने उससे पूछा - भैया ये का फल? बेचने वाले ने उत्तर दिया - काफल, पर्यटक ने फिर पूछा - ये का फल? उसने फिर उत्तर दिया - हां काफल। इस बात पर दोनों में तकरार हो गई। फल का नाम पूछने वाला व्यक्ति सोच रहा था कि फल बेचने वाला उसकी कही बात का मजाक उड़ा रहा है। इसका समाधान तीसरे व्यक्ति ने यह कह कर किया कि उस फल का नाम ही 'काफ्ल' है। काफल से संबंधित कुमाऊं में - 'पुर पुतई पुरे पुर' और गढ़वाल में - 'काफल पाको मिलनि चाखो' लोककथाएं प्रसिद्ध हैं।


    काफल उत्तराखंड के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पाया जाने वाला फलदार वृक्ष है। इसके फल दानों के आकार के होते हैं, जो गुच्छे के रूप में लगते हैं। काफल पकने का समय मई माह होता है। पकने पर इसके दाने गहरे लाल रंग के हो जाते हैं। जिनका स्वाद रसीला मीठा और आंशिक खट्टा होता है। बच्चे इसकी टहनियों को हिलाकर अथवा नीचे की ओर झुकी टहनी से काफल के पके दाने निकालते हैं। अधिक काफल तोड़कर लाने के लिए टोकरी का प्रयोग किया जाता है। थैला या पोटली में रखकर काफल के दाने पिचक जाते हैं। जिससे उनका स्वाद फीका हो जाता है। काफल प्रातकाल में तोड़े जाते हैं।


    पेड़-पौधों की भी अलग-अलग प्रकति और स्वभाव होता है। भेंवल का पेड़ गांव तथा घर के आसपास, जबकि काफल का पेड़ गांव की बस्ती से दूर उगता है। इसको किसी के द्वारा न तो रोपा जाता है और न देखभाल की जाती है। एक तरह से इसे जंगली वृक्ष ही कहा जाएगा। पशु चुगाने वाले गांव के अपने मित्रों के साथ चरागाहों में दिनभर पेड़ों पर चढ़कर हमने बहुत सारे काफल खाए हैं। काफल से अपनी जेबें भरकर घर भी लाया करते थे।

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