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    जगत चंद - चंद वंश

    जगत चंद्र का काल चंदों के इतिहास में एक सर्वाधिक उत्कर्ष का काल था। यद्यपि जगत चंद्र ने मात्र बारह वर्षों तक ही शासन किया था, किंतु उपरोक्त अल्पावधि में भी उसने अपने राज्य की जनता के मध्य जो यश प्राप्त किया वह अन्य किसी भी चंद नरेश को नसीब नहीं हुआ था। वह एक ऊँचे दर्जे का मिलनसार व्यक्ति था, और सारी प्रजा उसके प्रति अपार श्रद्धा रखती थी। वह प्रजा के कार्य में प्रभूत रूचि लेता था। देश धन-धान्य से परिपूर्ण था तराई भाबर से 9 लाख रूपये की आय इसी के समय में होती थी। विद्वानों ने उसके काल को कुमाऊँ का स्वर्ण काल कहा है।


    गढ़वाल पर चढ़ाई


    उद्योत चंद व ज्ञानचंद की भांति जगत चंद को भी गढ़वाल से आये दिन चुनौतियां मिल रही थीं। अपने पिता ज्ञानचंद के साथ वह पहले गढ़राज्य के विरूद्ध लड़ चुका था। जगत चंद के बरम (मुवानी) ताम्रपत्र से ज्ञात होता है कि ज्ञानचंद्र के समय वीरेश्वर जोशी वैद्यकुड़ी ने बधानगढ़ की लड़ाई में जासूसी की थी, जिससे राजा को बधानगढ़ फतह करने में सफलता मिली थी। इस बावत ज्ञानचंद ने वीरेश्वर जोशी को रौत में जो अमीन दी थी, उसके ताम्रपत्र किसी अग्नि कांड में जल गये थे। फलतः जगतचंद्र को पिता की मृत्यु के बाद पुनः दूसरा ताम्रपत्र वीरेश्वर जोशी के पुत्रों को देना पड़ा।


    जगतचंद ने अपने राज्याभिषेक के पहले ही वर्ष लोहबागढ़ व बधानगढ़ पर चढ़ाई करके वहां से गढ़सेना को मारभगाया था, क्योंकि ज्ञनचंद्र की मृत्यु के तुरंत बाद गढ़नेरश ने बधानगढ़ को अपने कब्जे में कर लिया था। इन दोनों गढ़ों को फतह करने के बाद वह श्रीनगर की ओर चल पड़ा। श्रीनगर में गढ़नरेश फतेहशाह से इसका भीषण संग्राम हुआ। फलतः फतेहशाह हार मानकर देहरादून की ओर कूच कर गया। यह भी कहा जाता है कि वह देहरादून न जाकर रानीहाट गया था। श्रीनगर पर जगतचंद का अधिकार हो गया उसने इस नगरी की खूब लूट-खसोट की और उसे लगभग वीरान ही कर डाला। श्रीनगर में अपना एक प्रतिनिधि रखने के बाद जगत चंद जब वापस आया, तो फतेहशाह ने इस प्रतिनिधि को मार भगाया, और एक बड़ी सेना लेकर कुमाऊँ की कत्यूर घाटी में आक्रमण कर दिया। गरूड़ा ग्राम (गरूड़) व बैजनाथ घाटी को रौंदने के बाद उसमें गरसार ग्राम को बद्रीनाथ मंदिर को चढ़ा दिया, जिसकी आय से बद्रीनाथ का सत्र चलने लगा।


    जगत चंद ने अपने पूर्वजों की भांति मुगल सम्राट बहादुरशाह को अनेक कीमती पहाड़ी चीजें भेंट की थीं। इनमें घोड़े, चंवर, खांड़े, खुकरी, कस्तूरी, निखीसी, गजगाह व सोने-चांदी के बर्तन आदि प्रमुख चीजें थीं। बदले में दिल्ली पति ने उसे अभयदान दिया था। जगतचंद ने जुआरियों पर भी कर लगाया तथा चेचक से अंत में उसकी दुःखद मृत्यु हुई।


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